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फेक न्यूज की फैक्ट्री चलाने वालों का मीडिया को ज्ञान! चोरी भी खुद, चोर-चोर का शोर भी खुद

जो चैनल दिन-रात सरकार के गुणगान में जुटे हैं, जो विपक्ष से सवाल पूछते हैं और सत्ता से सवाल करने से बचते हैं, उन्हें गाइडलाइन का पाठ पढ़ा रही है सरकार। सवाल है—नियम सबके लिए बराबर कब होंगे?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026

जिस सरकार के समर्थक चैनलों पर दिन-रात विपक्ष को कठघरे में खड़ा किया जाता हो, जहां सत्ता से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से जवाब मांगे जाते हों और जहां सरकार की हर नाकामी का ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ने की कोशिश होती हो, उसी सरकार का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय अब टीवी चैनलों को ‘राष्ट्रविरोधी सोच’ और सांप्रदायिक तनाव से बचने की सलाह दे रहा है।

वाह! क्या बात है! इसे कहते हैं—खुद ही कठघरे में खड़े होकर दूसरों को कटघरे में खड़ा करने की राजनीति।

मंत्रालय की एडवाइजरी कहती है कि समाचार चैनल सांप्रदायिक वैमनस्य या राष्ट्रविरोधी रवैये को बढ़ावा न दें, अपमानजनक और भड़काऊ टिप्पणियों पर सुधारात्मक कार्रवाई करें और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें। इन बातों से किसे आपत्ति हो सकती है? मीडिया का काम सच दिखाना है, समाज में नफरत फैलाना नहीं। खबरों के नाम पर झूठ परोसना और अफवाहों को तथ्य बनाकर पेश करना भी पत्रकारिता नहीं है।

लेकिन असली सवाल यही है—यह नसीहत सिर्फ मीडिया के लिए है या सत्ता में बैठे लोगों पर भी लागू होगी?

सरकार का गुणगान ही क्या अब पत्रकारिता है?

भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह सत्ता से सवाल पूछने के बजाय सरकार का पक्ष रखने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाता है। आलोचक ऐसे चैनलों को ‘गोदी मीडिया’ कहते हैं। यह शब्द उस पत्रकारिता पर उठते सवालों का प्रतीक बन गया है, जिसमें सरकार से जवाब मांगने के बजाय विपक्ष को जवाबदेह ठहराने पर ज्यादा जोर दिखाई देता है।

महंगाई बढ़े तो विपक्ष से सवाल। बेरोजगारी पर चर्चा हो तो विपक्ष की पुरानी सरकारों का हिसाब। किसी सरकारी योजना में खामी सामने आए तो बहस का रुख विपक्ष की नाकामियों की तरफ मोड़ने की कोशिश। और जब सरकार से सीधे सवाल पूछने की बारी आए, तो कई बार बहस का मुद्दा ही बदल जाता है।

क्या यही पत्रकारिता है?

सरकार की उपलब्धियां दिखाना गलत नहीं है। विपक्ष की गलतियों को उजागर करना भी मीडिया की जिम्मेदारी है। लेकिन सरकार की नाकामियों पर पर्दा डालना, सत्ता से असहज सवालों को नजरअंदाज करना और हर मुद्दे पर विपक्ष को ही दोषी ठहराना निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं हो सकती।

पत्रकारिता का धर्म सत्ता की चापलूसी करना नहीं, उससे सवाल पूछना है। सत्ता चाहे किसी भी पार्टी की हो, पत्रकार का काम जनता के हित में सच सामने लाना है।

फेक न्यूज पर नियम, लेकिन शुरुआत कहां से होगी?

फेक न्यूज लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। गलत जानकारी समाज में तनाव पैदा कर सकती है, किसी समुदाय को निशाना बना सकती है और जनता को गुमराह कर सकती है। इसलिए फेक न्यूज पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन कार्रवाई का आधार राजनीतिक सुविधा नहीं, तथ्य और कानून होने चाहिए।

अगर कोई टीवी चैनल गलत खबर चलाता है, तो उससे जवाब मांगा जाना चाहिए। कोई पत्रकार बिना प्रमाण के गंभीर आरोप लगाता है, तो उसे अपने दावे का आधार बताना चाहिए। एआई से तैयार वीडियो या तस्वीर को असली बताकर प्रसारित किया जाता है, तो उसकी जांच होनी चाहिए और गलती सामने आने पर सुधार भी होना चाहिए।

लेकिन यही कसौटी सरकार, सत्ताधारी दल, विपक्ष और उनके समर्थकों पर भी लागू होनी चाहिए।

अगर किसी मंत्री या सत्ताधारी नेता का दावा गलत साबित होता है, तो क्या उतनी ही तेजी से जवाबदेही तय होगी? क्या सरकार के समर्थन में फैलने वाली भ्रामक जानकारी पर भी वैसी ही कार्रवाई होगी, जैसी विपक्ष के किसी बयान को लेकर होती है? क्या सरकारी प्रचार तंत्र से जुड़े दावों की भी स्वतंत्र जांच होगी?

या फेक न्यूज की परिभाषा भी राजनीतिक पहचान देखकर तय की जाएगी?

इन सवालों का जवाब दिए बिना मीडिया को नैतिकता का पाठ पढ़ाना अधूरा है।

‘राष्ट्रविरोधी’ कौन तय करेगा?

एडवाइजरी में ‘राष्ट्रविरोधी रवैये’ को बढ़ावा देने वाली सामग्री से बचने की बात कही गई है। देश की एकता और सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की आलोचना को राष्ट्रविरोधी मान लेने की प्रवृत्ति भी उतनी ही खतरनाक हो सकती है।

सरकार और देश एक नहीं हैं। सरकार की आलोचना देश का विरोध नहीं है। प्रधानमंत्री, मंत्री, सरकारी नीतियों और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है। किसी नीति से असहमति जताना, सरकारी दावे की जांच करना या किसी फैसले के खिलाफ प्रदर्शन करना अपने आप में राष्ट्रविरोधी गतिविधि नहीं है।

इसलिए ‘राष्ट्रविरोधी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल स्पष्ट तथ्यों और कानूनी आधार पर होना चाहिए, न कि राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए।

मीडिया का काम देशभक्ति के प्रमाणपत्र बांटना नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच करना, सवाल पूछना और जनता को सही जानकारी देना है। जो पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता है, वह अपने आप देश का विरोधी नहीं हो जाता। और जो चैनल दिन-रात सरकार की तारीफ करता है, उसकी हर खबर अपने आप सच नहीं हो जाती।

सांप्रदायिक तनाव पर कार्रवाई हो, लेकिन चुनिंदा नहीं

धार्मिक नफरत फैलाने वाली खबरों, अपमानजनक टिप्पणियों और भड़काऊ बहसों पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए। किसी चैनल पर एक समुदाय के खिलाफ टिप्पणी हो या दूसरे के खिलाफ, कार्रवाई का आधार एक ही होना चाहिए।

इसी तरह, किसी राजनीतिक दल के नेता की भड़काऊ टिप्पणी हो या किसी दूसरे दल के नेता की, जांच राजनीतिक पहचान देखकर नहीं होनी चाहिए।

अगर सरकार वास्तव में सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा करना चाहती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून का इस्तेमाल आलोचकों को चुप कराने के बजाय शांति और जवाबदेही कायम करने के लिए हो।

नफरत फैलाने वाला बयान केवल इसलिए स्वीकार्य नहीं हो सकता कि उसे सत्ता का समर्थन हासिल है। और किसी तथ्यपूर्ण आलोचना को केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता कि वह सरकार को असहज करती है।

आईना मीडिया को दिखेगा या सत्ता को भी?

मीडिया को नियमों का पालन करना चाहिए। उसे फेक न्यूज, नफरत और भ्रामक प्रचार से दूर रहना चाहिए। लेकिन सरकार को भी यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र में मीडिया उसका प्रचार विभाग नहीं, बल्कि जनता की आंख और कान है।

पत्रकारिता का मूल्यांकन इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कौन-सा चैनल सरकार की तारीफ करता है और कौन उसकी आलोचना। असली कसौटी यह है कि किसने तथ्य दिखाए, किसने गलत जानकारी सुधारी और किसने जनता के सवालों को ईमानदारी से उठाया।

सरकार की एडवाइजरी तभी सार्थक होगी, जब वह सिर्फ कागज पर जारी निर्देश बनकर न रह जाए। मीडिया संस्थानों से लेकर राजनीतिक दलों और सरकारी तंत्र तक, जवाबदेही का एक समान मानक होना चाहिए। नियमों का इस्तेमाल निष्पक्षता से हो, न कि आलोचना करने वालों पर दबाव बनाने के लिए।

आखिर फेक न्यूज के खिलाफ लड़ाई में सबसे जरूरी चीज केवल नियम बनाना नहीं, बल्कि उनका निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना है।

और लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यही है—जो दूसरों को सच बोलने की नसीहत दे रहा है, क्या वह खुद भी हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार है?

खुद चोरी और दूसरे को चोर कहने की राजनीति से न मीडिया सुधरेगा, न लोकतंत्र मजबूत होगा। सच की कसौटी सबके लिए एक होनी चाहिए—सत्ता के लिए भी, मीडिया के लिए भी और विपक्ष के लिए भी।

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