अंतरराष्ट्रीय/अमेरिका-ईरान/पश्चिम एशिया | ABC NATIONAL NEWS | 11 अगस्त 2026
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल युद्ध और परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा है। मुआवजे की मांग ने दोनों देशों के बीच संभावित बातचीत को भी बेहद कठिन बना दिया है। ईरान ने अमेरिका से युद्ध में हुए नुकसान के लिए करीब 300 अरब डॉलर के मुआवजे की मांग रखी है। इसके साथ ही तेहरान ने करीब 100 अरब डॉलर की जमी हुई ईरानी संपत्तियों को जारी करने, प्रतिबंध हटाने और सैन्य दबाव समाप्त करने जैसी शर्तें भी रखी हैं। ईरान ने इन मांगों को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोलने से जोड़ दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को ईरान की मुआवजे की मांग को खारिज करते हुए पलटवार किया और कहा कि अगर मुआवजे की बात होगी तो अमेरिका भी ईरान से उन लोगों की मौत और चोटों का हिसाब मांगेगा, जिनके लिए वह ईरान को जिम्मेदार मानता है।
ट्रंप का पलटवार—‘हम भी मुआवजा मांगेंगे’
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ईरान की मांग को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ईरान युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा मांग रहा है, लेकिन भविष्य की बातचीत में अमेरिका भी अपना दावा रखेगा। ट्रंप ने ईरान पर विभिन्न हमलों और संघर्षों में लोगों की मौत तथा घायल होने के लिए जिम्मेदारी का आरोप लगाया। उन्होंने विशेष रूप से अमेरिकी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी और अन्य घटनाओं का उल्लेख किया। सुलेमानी की 2020 में बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले में हत्या हुई थी, जिसका आदेश ट्रंप ने दिया था। ट्रंप ने ईरानी सरकार पर पिछले दशकों में प्रदर्शनकारियों के दमन का भी आरोप लगाया और दावा किया कि हालिया पांच महीने के संघर्ष में 52,000 लोग मारे गए हैं। हालांकि, ऐसे दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करना जरूरी है और युद्ध में हताहतों के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावे सामने आते रहे हैं।
ईरान की शर्तें क्यों महत्वपूर्ण हैं?
ईरान ने अमेरिका के सामने केवल आर्थिक मुआवजे की मांग नहीं रखी है। तेहरान चाहता है कि युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की जाए, उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं, भविष्य में सैन्य कार्रवाई की धमकी समाप्त हो और विदेशों में जमी ईरानी संपत्तियों को वापस उपलब्ध कराया जाए। इसके अलावा ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोलने के सवाल को इन शर्तों से जोड़ दिया है। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। यहां लंबे समय तक व्यवधान रहने से तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति, समुद्री परिवहन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के लिए होर्मुज का सामान्य संचालन केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक चिंता बन गया है।
होर्मुज पर टकराव से बढ़ी वैश्विक चिंता
ईरान के इस रुख ने अमेरिका के सामने एक कठिन स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान परमाणु हथियारों की दिशा में आगे न बढ़े और क्षेत्र में अमेरिकी तथा उसके सहयोगी देशों के हित सुरक्षित रहें। दूसरी तरफ तेहरान युद्ध के बाद अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा है कि जब तक अमेरिका उसकी सभी शर्तों को स्वीकार नहीं करता, तब तक होर्मुज युद्ध का क्षेत्र बना रहेगा। इसका सीधा असर समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है और पहले से अस्थिर ऊर्जा बाजारों में और उथल-पुथल पैदा हो सकती है।
अमेरिका के लिए भी आसान नहीं रास्ता
ट्रंप ने ईरान को मुआवजा देने की मांग साफ तौर पर ठुकरा दी है। लेकिन केवल मांग खारिज कर देने से संकट समाप्त नहीं होगा। यदि होर्मुज में जहाजों की आवाजाही बाधित रहती है तो तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ सकता है। अमेरिका पर भी अपने सैन्य संसाधनों, सहयोगी देशों की सुरक्षा और ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने का दबाव बढ़ेगा। ट्रंप ने ईरान के खिलाफ फिर बड़े सैन्य अभियान की चेतावनी दी है, लेकिन सैन्य विकल्प जितना लंबा चलेगा, उतना ही क्षेत्रीय अस्थिरता और आर्थिक नुकसान बढ़ने का खतरा रहेगा।
बातचीत ही सबसे कठिन, लेकिन जरूरी रास्ता
इस संकट का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका और ईरान अपनी अधिकतम मांगों से पीछे हटकर किसी समझौते तक पहुंच सकते हैं। ईरान के लिए युद्ध क्षति, प्रतिबंध और जमी हुई संपत्तियां संप्रभुता और आर्थिक अस्तित्व से जुड़ी मांगें हैं, जबकि अमेरिका के लिए परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा प्रमुख मुद्दे हैं। दोनों पक्ष यदि अपनी-अपनी शर्तों को अंतिम मानते रहे तो बातचीत शुरू होना भी मुश्किल होगा।
फिलहाल 300 अरब डॉलर का मुआवजा बनाम ईरान से अमेरिकी मुआवजे की मांग दोनों देशों के बीच बढ़ती खाई को दिखाती है। होर्मुज इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील केंद्र बन चुका है। आने वाले दिनों में यह तय करेगा कि दोनों देश बातचीत की मेज पर लौटते हैं या फिर पश्चिम एशिया एक और लंबे टकराव की ओर बढ़ता है।




