ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 मई 2026
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हमेशा यह मानी जाती रही है कि यहां जनता सवाल पूछ सकती है और सत्ता को जवाब देना पड़ता है। संसद का अस्तित्व ही जवाबदेही के लिए है, प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद ही कठिन सवालों का सामना करना है और लोकतंत्र की आत्मा ही इसी बात में बसती है कि जनता मालिक है और सरकार जवाबदेह। लेकिन “न्यू इंडिया” में लगता है जवाबदेही का नया मॉडल तैयार हो चुका है — यहां संकट आते हैं, सवाल उठते हैं, जनता परेशान होती है… और मंत्री गधे के सिंघ की तरह गायब हो जाते हैं। अब राजनीति में इस्तीफे कम और “रणनीतिक मौन” ज्यादा दिखाई देता है। कोई बड़ा विवाद हो जाए तो पहले दौर में सरकार के प्रवक्ता टीवी स्टूडियो में पहुंचते हैं, दूसरे दौर में सोशल मीडिया पर राष्ट्रवाद और उपलब्धियों की बाढ़ ला दी जाती है, और तीसरे दौर तक असली जिम्मेदार चेहरे सार्वजनिक जीवन से ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे उन्हें किसी “डिजिटल अंडरग्राउंड” में भेज दिया गया हो। कैमरे गायब, प्रेस कॉन्फ्रेंस गायब, जवाब गायब — लेकिन जैसे ही विवाद का तापमान थोड़ा कम होता है, वही चेहरे नए उद्घाटन, नई योजनाओं और नई PR फोटोशूट के साथ फिर अवतरित हो जाते हैं।
देश की अर्थव्यवस्था दबाव में हो, रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच जाए, महंगाई रसोई से लेकर पेट्रोल पंप तक जनता की कमर तोड़ दे — लेकिन वित्त मंत्री का सार्वजनिक संवाद बेहद सीमित दिखाई देता है। पहले दौर में कहा जाता है कि “वैश्विक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं”, फिर धीरे-धीरे पूरा मुद्दा टीवी डिबेट और सोशल मीडिया की भीड़ में खो जाता है। जनता पूछती है कि अगर हर संकट के लिए केवल वैश्विक हालात ही जिम्मेदार हैं, तो फिर सरकार की आर्थिक नीतियों की जिम्मेदारी कौन लेगा? लेकिन जवाबदेही की जगह डेटा मैनेजमेंट और इमेज मैनेजमेंट ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है।
NEET पेपर लीक मामला तो इस पूरी राजनीतिक संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है। लाखों छात्र वर्षों तक मेहनत करते हैं। परिवार जमीन बेचते हैं, कर्ज लेते हैं, बच्चों को कोचिंग शहरों में भेजते हैं। छात्र दिन-रात एक करके परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन फिर खबर आती है कि पेपर पहले ही बिक चुका था, व्हाट्सऐप और टेलीग्राम ग्रुपों में घूम रहा था। करोड़ों सपनों पर चोट पड़ती है, लेकिन इस राष्ट्रीय संकट के बीच शिक्षा व्यवस्था के शीर्ष चेहरे जनता के सवालों से लगभग गायब दिखाई देते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, नैतिक जिम्मेदारी नहीं, कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं — सिर्फ जांच एजेंसियों के बयान और तकनीकी शब्दों में लिपटी सफाइयां।
विडंबना देखिए कि आज की राजनीति “इवेंट मैनेजमेंट” में विश्वस्तरीय हो चुकी है, लेकिन “जवाबदेही मैनेजमेंट” में बेहद कमजोर दिखाई देती है। कैमरों के सामने सरकार बेहद आत्मविश्वासी दिखती है, लेकिन कठिन सवालों के सामने अक्सर असहज। ऐसा लगता है कि आधुनिक राजनीति में लोकतंत्र का अर्थ अब संवाद नहीं बल्कि “नैरेटिव कंट्रोल” बनता जा रहा है। अगर बेरोजगारी पर सवाल उठे तो इतिहास की चर्चा शुरू कर दीजिए। अगर पेपर लीक पर गुस्सा बढ़े तो विपक्ष पर हमला कर दीजिए। अगर विदेश नीति पर आलोचना हो तो राष्ट्रहित और गोपनीयता की ढाल सामने रख दीजिए। हर संकट का समाधान जवाब नहीं, बल्कि “डायवर्जन” बनता जा रहा है।
विदेश नीति के मामले में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की रणनीति पर सवाल उठते हैं, पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ता है, या वैश्विक संकटों के बीच भारत की भूमिका पर बहस होती है, तब खुली प्रेस वार्ता और लोकतांत्रिक संवाद कम दिखाई देते हैं। सरकार उपलब्धियों की सूची पेश करती है, लेकिन आलोचनात्मक सवालों पर अक्सर चुप्पी या नियंत्रित प्रतिक्रिया दिखाई देती है। आलोचकों का कहना है कि अब सरकार संवाद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं बल्कि “ब्रांड प्रोटेक्शन” की तरह देखती है।
सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि “डिजिटल इंडिया” में सब कुछ ऑनलाइन हो गया है — राशन, बैंकिंग, वोटर आईडी, टैक्स, शिक्षा, स्वास्थ्य — लेकिन जवाबदेही आज भी “लोडिंग…” में अटकी हुई है। जनता सवाल पूछती है, लेकिन जवाब देने वाले मंत्री अचानक अदृश्य मोड में चले जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे सरकार में कोई नया प्रोटोकॉल लागू हो चुका हो — “संकट बड़ा हो तो कुछ दिन सार्वजनिक रूप से मत दिखो, फिर नया नैरेटिव लेकर लौट आओ।”
पुराने दौर की राजनीति में कम से कम नैतिकता का एक सार्वजनिक दबाव हुआ करता था। किसी बड़े हादसे, घोटाले या प्रशासनिक विफलता के बाद मंत्री इस्तीफा दे देते थे या खुलकर मीडिया के सामने आते थे। अब राजनीति में “नैतिक जिम्मेदारी” की जगह “PR रिकवरी” ने ले ली है। पहले जनता को जवाब दिया जाता था, अब जनता का ध्यान भटकाया जाता है। पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस होती थीं, अब सिर्फ़ एकतरफा वीडियो संदेश और चुने हुए इंटरव्यू दिखाई देते हैं।
यह केवल एक सरकार या एक पार्टी का सवाल नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की बदलती संस्कृति का सवाल है। अगर सत्ता केवल उपलब्धियों का श्रेय ले और विफलताओं पर चुप्पी साध ले, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रचारतंत्र में बदलने लगता है। लोकतंत्र की असली ताकत भाषणों में नहीं, जवाबदेही में होती है। जनता केवल उद्घाटन और विज्ञापन नहीं चाहती, वह यह भी जानना चाहती है कि जब संकट आया तो जिम्मेदार लोग कहां थे।
आज देश का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है — क्या “न्यू इंडिया” में मंत्री केवल कैमरों के लिए मौजूद हैं और संकट के समय गधे के सिंघ की तरह गायब हो जाना ही नई जवाबदेही का मॉडल बन चुका है?




