राष्ट्रीय सुरक्षा / पूर्वोत्तर / भू-राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 19 मई 2026
पश्चिम बंगाल की नई बीजेपी सरकार द्वारा सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी “चिकन नेक” क्षेत्र में लगभग 120 एकड़ जमीन केंद्र सरकार को सौंपने का फैसला केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की बदलती सामरिक और भू-राजनीतिक रणनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है। मुख्यमंत्री शिवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में लिया गया यह फैसला ऐसे समय आया है जब चीन के साथ सीमा तनाव, बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियां, पूर्वोत्तर की सुरक्षा चुनौतियां और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा भारत की सुरक्षा नीति को नए ढंग से आकार दे रही हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ इस कदम को “रणनीतिक पुनर्संरचना” के रूप में देख रहे हैं।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आम भाषा में “चिकन नेक” कहा जाता है, भारत के लिए केवल एक भूभाग नहीं बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों की जीवनरेखा है। यह संकरा गलियारा भारत के मुख्य भूभाग को असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय और सिक्किम से जोड़ता है। कई जगह इसकी चौड़ाई मात्र 20 से 22 किलोमीटर तक सिमट जाती है। इसके एक तरफ नेपाल, दूसरी तरफ बांग्लादेश, ऊपर भूटान और अपेक्षाकृत कम दूरी पर चीन की सीमा मौजूद है। यही वजह है कि किसी भी सैन्य, कूटनीतिक या भू-राजनीतिक संकट की स्थिति में यह क्षेत्र भारत के लिए सबसे संवेदनशील सामरिक बिंदुओं में गिना जाता है।
विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि यदि भविष्य में किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष या सीमाई तनाव की स्थिति उत्पन्न होती है, तो “चिकन नेक” भारत की सबसे बड़ी सामरिक कमजोरी भी बन सकता है। चीन के साथ 2020 के बाद से लगातार बढ़े तनाव, डोकलाम संकट की स्मृतियां और तिब्बत क्षेत्र में चीन की आक्रामक सैन्य तैयारियों ने इस कॉरिडोर के महत्व को और बढ़ा दिया है। यही कारण है कि भारतीय सेना, सीमा सड़क संगठन और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान पिछले कई वर्षों से इस क्षेत्र में लॉजिस्टिक्स, कनेक्टिविटी और सैन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर देते रहे हैं।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह फैसला महत्वपूर्ण है। रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र सरकार लंबे समय से this क्षेत्र में जमीन हस्तांतरण चाहती थी, लेकिन पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस सरकार के दौरान यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। अब सत्ता परिवर्तन के बाद नई बीजेपी सरकार ने तेजी दिखाते हुए इस दिशा में कदम बढ़ाया है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि राज्य और केंद्र के बीच सुरक्षा मामलों पर समन्वय अब पहले की तुलना में अधिक मजबूत हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवेंदु अधिकारी सरकार खुद को “राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खड़ी सरकार” के रूप में स्थापित करना चाहती है और यह फैसला उसी बड़े राजनीतिक संदेश का हिस्सा है।
हालांकि सरकार ने अभी आधिकारिक रूप से यह स्पष्ट नहीं किया है कि 120 एकड़ जमीन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाएगा, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का अनुमान है कि यहां सैन्य लॉजिस्टिक्स हब, रक्षा प्रतिष्ठान, रणनीतिक वेयरहाउस, एयर सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, इंटेलिजेंस सुविधाएं या मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट नेटवर्क विकसित किए जा सकते हैं। यह भी संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में पूर्वोत्तर राज्यों के लिए सैन्य आपूर्ति और त्वरित तैनाती को अधिक प्रभावी बनाने के लिए इस क्षेत्र को “राष्ट्रीय सुरक्षा कॉरिडोर” के रूप में विकसित किया जाए।
इस पूरे घटनाक्रम को केवल सैन्य नजरिए से देखना भी अधूरा होगा। “चिकन नेक” भारत की आर्थिक और कनेक्टिविटी रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। पूर्वोत्तर में व्यापार, पर्यटन, ऊर्जा, सीमा व्यापार और एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ाव के लिए यही मार्ग सबसे अहम है। यदि यह क्षेत्र मजबूत होता है, तो केवल सैन्य सुरक्षा ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर का आर्थिक एकीकरण भी तेज हो सकता है। यही कारण है कि केंद्र लंबे समय से रेल, सड़क, डिजिटल नेटवर्क और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर को इस क्षेत्र में विस्तार देने पर काम कर रहा है।
चीन और बांग्लादेश से जुड़े भू-राजनीतिक समीकरणों के कारण इस फैसले का अंतरराष्ट्रीय महत्व भी है। चीन लंबे समय से भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को सामरिक दबाव के बिंदु के रूप में देखता रहा है। वहीं बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति और सीमा सुरक्षा के बदलते हालात भी भारत के लिए संवेदनशील बने हुए हैं। ऐसे में “चिकन नेक” क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सामरिक मजबूती भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा नीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है।
साफ है कि यह केवल 120 एकड़ जमीन का मामला नहीं है। यह भारत की उस बड़ी रणनीतिक सोच का हिस्सा है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, पूर्वोत्तर कनेक्टिविटी और चीन को लेकर दीर्घकालिक तैयारी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई दे रही है। आने वाले समय में यह फैसला पूर्वोत्तर और भारत की सुरक्षा संरचना दोनों के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकता है।




