न्यायपालिका / UAPA / दिल्ली दंगे मामला | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 मई 2026
देश के सबसे कठोर आतंकवाद विरोधी कानून UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर बड़ा संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़ा हो गया है। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि यदि किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखा गया हो और मुकदमे में देरी हो रही हो, तब भी क्या उसे जमानत मिल सकती है — इस सवाल पर अब बड़ी संविधान पीठ को विचार करना पड़ सकता है। पुलिस का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग समन्वय पीठों (Coordinate Benches) के फैसलों में विरोधाभास दिखाई दे रहा है और इसी वजह से अब इस मुद्दे पर व्यापक कानूनी स्पष्टता की जरूरत है।
यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब सुप्रीम कोर्ट में 2020 दिल्ली दंगा मामलों के आरोपी अब्दुल खालिद सैफी और तस्लीम अहमद की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 में दोनों को जमानत देने से इनकार कर दिया था, जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने कहा कि UAPA के तहत जमानत पर जो कानूनी रोक है, उसे केवल लंबी कैद और ट्रायल में देरी के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हालिया फैसलों में “निर्दोष मानने के सिद्धांत” को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया गया, जबकि UAPA जैसे विशेष कानून में यह सिद्धांत सीमित हो जाता है।
दरअसल UAPA भारत का वह कानून है जिसमें जमानत मिलना बेहद कठिन माना जाता है। कानून की धारा 43D(5) के तहत यदि अदालत को पहली नजर में आरोप सही प्रतीत होते हैं, तो आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती। यही कारण है कि मानवाधिकार संगठनों, विपक्षी दलों और कई कानूनी विशेषज्ञों ने लंबे समय से आरोप लगाया है कि UAPA “जेल ही सजा” वाले मॉडल में बदलता जा रहा है, जहां मुकदमे पूरे होने से पहले ही आरोपी वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं।
हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट की कुछ पीठों ने यह कहा था कि यदि मुकदमे की सुनवाई अत्यधिक लंबी हो रही हो और आरोपी कई वर्षों से जेल में हो, तो संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए जमानत दी जा सकती है। अदालतों ने यह भी टिप्पणी की थी कि आतंकवाद विरोधी कानून होने का मतलब यह नहीं कि किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक मुकदमे के बिना जेल में रखा जाए। इसी दृष्टिकोण को लेकर अब कानूनी बहस तेज हो गई है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि इस तरह के फैसले UAPA की मूल भावना को कमजोर कर सकते हैं।
यह विवाद केवल एक कानूनी तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बड़ी बहस का हिस्सा बन चुका है। एक तरफ सरकार और जांच एजेंसियां तर्क देती हैं कि आतंकवाद और संगठित हिंसा से निपटने के लिए कठोर कानून जरूरी हैं। दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को वर्षों तक बिना दोष सिद्ध हुए जेल में रखा जाता है, तो यह संविधान के मूल अधिकारों और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ जाता है।
दिल्ली दंगा मामलों, उमर खालिद, शरजील इमाम और कई अन्य UAPA मामलों में लगातार यही सवाल उठता रहा है कि क्या “मुकदमे से पहले लंबी कैद” खुद एक सजा बन चुकी है। आंकड़े बताते हैं कि UAPA मामलों में दोषसिद्धि दर बेहद कम रही है, लेकिन इसके बावजूद आरोपी लंबे समय तक जेल में रहते हैं। यही कारण है कि अदालतों के भीतर भी अब यह बहस गहरी होती जा रही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच रेखा कहां खींची जाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मामला बड़ी संविधान पीठ के पास जाता है, तो आने वाले समय में UAPA के तहत जमानत के सिद्धांतों पर ऐतिहासिक फैसला सामने आ सकता है। यह फैसला केवल दिल्ली दंगा मामलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में चल रहे सैकड़ों UAPA मामलों और भविष्य की कानूनी व्याख्या को प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल इतना साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के भीतर शुरू हुई यह बहस भारत की न्यायिक और संवैधानिक राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में बदलती जा रही है — क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अनिश्चितकाल तक सीमित किया जा सकता है, या संविधान अंततः अदालतों को हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर करेगा?




