दक्षिण भारत / तमिलनाडु राजनीति / गठबंधन संकट | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई | 19 मई 2026
तमिलनाडु की राजनीति में सत्तारूढ़ टीवीके (TVK) सरकार और उसके सहयोगी दलों के बीच बढ़ते मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं। मुख्यमंत्री विजय की सरकार को समर्थन दे रही सीपीएम ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि एआईएडीएमके को गठबंधन या सरकार में शामिल किया गया, तो वामपंथी दल अपने समर्थन पर पुनर्विचार करेगा। यह बयान केवल राजनीतिक नाराजगी नहीं, बल्कि तमिलनाडु की बदलती सत्ता संरचना और भविष्य की गठबंधन राजनीति का बड़ा संकेत माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि विजय सरकार के भीतर “स्थिरता” और “राजनीतिक विस्तार” के बीच टकराव तेज हो चुका है।
सीपीएम का कहना है कि तमिलनाडु की जनता ने इस बार पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के खिलाफ वोट दिया था। पार्टी के मुताबिक, जनता ने डीएमके और एआईएडीएमके दोनों से अलग विकल्प की तलाश में टीवीके को समर्थन दिया। ऐसे में यदि एआईएडीएमके के किसी भी गुट को सत्ता संरचना का हिस्सा बनाया जाता है, तो यह जनता के जनादेश और “स्वच्छ शासन” के दावे के खिलाफ माना जाएगा। वामपंथी दलों का तर्क है कि टीवीके यदि पुराने राजनीतिक चेहरों और दलों के साथ समझौता करती है, तो उसकी “नई राजनीति” की पूरी छवि कमजोर पड़ सकती है।
हालांकि इस पूरे विवाद के पीछे केवल वैचारिक मतभेद नहीं, बल्कि तमिलनाडु की तेजी से बदलती राजनीतिक गणित भी दिखाई दे रही है। राज्य में विजय की एंट्री ने द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक समीकरणों को पहले ही हिला दिया है। डीएमके लगातार दावा कर रही है कि विजय सरकार लंबे समय तक टिक नहीं पाएगी, जबकि बीजेपी राज्य में अपने राजनीतिक विस्तार के अवसर तलाश रही है। ऐसे में टीवीके के सामने सबसे बड़ी चुनौती सत्ता बचाने के लिए संख्या संतुलन बनाए रखना है। यही कारण है कि एआईएडीएमके के कुछ नेताओं और गुटों को लेकर संभावित राजनीतिक बातचीत की अटकलें लगातार सामने आ रही हैं।
सीपीएम ने अपने बयान में यह भी साफ किया कि फिलहाल वह सरकार को इसलिए समर्थन दे रही है क्योंकि राज्य एक और चुनाव के लिए तैयार नहीं है। पार्टी नहीं चाहती कि राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर बीजेपी तमिलनाडु में “पिछले दरवाजे” से अपनी स्थिति मजबूत करे या राज्यपाल शासन जैसी स्थिति पैदा हो। यह बयान इस बात का संकेत भी है कि तमिलनाडु में वामपंथी दल बीजेपी को रोकने की रणनीति को अभी भी प्राथमिक राजनीतिक लक्ष्य मान रहे हैं। लेकिन साथ ही वे विजय सरकार पर दबाव बनाकर अपनी वैचारिक और राजनीतिक दूरी भी बनाए रखना चाहते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने तमिलनाडु की राजनीति को और अधिक अस्थिर और दिलचस्प बना दिया है। एक तरफ टीवीके खुद को “नई राजनीति” और “भ्रष्टाचार मुक्त शासन” के प्रतीक के रूप में पेश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सत्ता संचालन की व्यावहारिक मजबूरियां उसे पुराने राजनीतिक समीकरणों की ओर धकेलती दिखाई दे रही हैं। यही विरोधाभास अब सरकार के भीतर तनाव पैदा कर रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि टीवीके भविष्य में एआईएडीएमके के साथ किसी भी स्तर पर समझौता करती है, तो उसे अपने समर्थकों और सहयोगियों दोनों को संतुष्ट करना बेहद मुश्किल हो सकता है।
तमिलनाडु की राजनीति में यह संकट केवल गठबंधन की गणित तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल को भी सामने लाता है कि क्या “एंटी-एस्टैब्लिशमेंट” राजनीति सत्ता में आने के बाद अपनी वैचारिक पहचान बचा पाती है या धीरे-धीरे उसी पारंपरिक सत्ता संरचना का हिस्सा बन जाती है, जिसके खिलाफ उसने संघर्ष शुरू किया था। विजय सरकार फिलहाल इसी राजनीतिक परीक्षा से गुजरती दिखाई दे रही है।
आने वाले हफ्तों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि टीवीके अपने सहयोगियों को साथ रख पाती है या नहीं, और क्या तमिलनाडु में एक नया राजनीतिक पुनर्संरेखण शुरू होने जा रहा है। फिलहाल इतना साफ है कि सीपीएम की चेतावनी ने विजय सरकार को यह संदेश दे दिया है कि सत्ता में बने रहने की कीमत राजनीतिक संतुलन से कहीं ज्यादा हो सकती है।




