अंतरराष्ट्रीय / भारत-वियतनाम / रक्षा कूटनीति | ABC NATIONAL NEWS | हनोई / नई दिल्ली | 19 मई 2026
भारत और वियतनाम ने एक बार फिर यह स्पष्ट संकेत दिया है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच दोनों देश अपनी रणनीतिक और रक्षा साझेदारी को नए स्तर पर ले जाने के लिए तैयार हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और वियतनाम के उप प्रधानमंत्री एवं रक्षा मंत्री जनरल फान वान जियांग के बीच हनोई में हुई उच्चस्तरीय बैठक में समुद्री सुरक्षा, रक्षा उद्योग, साइबर सुरक्षा, सैन्य प्रशिक्षण और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे अहम मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता बनाए रखना केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक आवश्यकता बन चुका है।
यह बैठक ऐसे समय हुई है जब दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन की आक्रामक रणनीति, ताइवान संकट, इंडो-पैसिफिक में बढ़ती सैन्य प्रतिस्पर्धा और समुद्री व्यापार मार्गों पर तनाव लगातार बढ़ रहा है। वियतनाम लंबे समय से दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों और सैन्य गतिविधियों को लेकर चिंतित रहा है, जबकि भारत भी “फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक” की अपनी रणनीति के तहत क्षेत्रीय साझेदारियों को मजबूत कर रहा है। यही कारण है कि भारत-वियतनाम रक्षा सहयोग अब केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह व्यापक एशियाई शक्ति संतुलन का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार दोनों देशों ने नियमित रक्षा संवाद, संयुक्त सैन्य अभ्यास, सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों और रक्षा उद्योग सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई है। विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा पर बढ़ता फोकस इस बात का संकेत है कि भारत और वियतनाम दोनों हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सामरिक उपस्थिति को अधिक प्रभावी बनाना चाहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वियतनाम को रक्षा उपकरण, गश्ती नौकाएं और प्रशिक्षण सहायता उपलब्ध कराई है, जबकि दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच सहयोग भी लगातार बढ़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और वियतनाम के संबंध केवल रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश चीन की बढ़ती क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को लेकर समान रणनीतिक चिंताएं साझा करते हैं। दक्षिण चीन सागर में चीन की सैन्य गतिविधियों और कृत्रिम द्वीप निर्माण को लेकर वियतनाम लंबे समय से सतर्क रहा है, जबकि भारत के लिए यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में नई दिल्ली और हनोई के बीच बढ़ती नजदीकियां बीजिंग के लिए भी एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश मानी जा रही हैं।
इस बैठक में साइबर सुरक्षा और रक्षा उद्योग सहयोग पर जोर भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत “आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन” की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ रक्षा निर्यात बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। वियतनाम को भारत का एक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार माना जा रहा है, जो आने वाले समय में भारतीय रक्षा उद्योग के लिए बड़ा सहयोगी बन सकता है। यही कारण है कि रक्षा उत्पादन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और क्षमता निर्माण पर बातचीत को दोनों देशों के रिश्तों का नया आयाम माना जा रहा है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और आसियान देशों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” अब अधिक स्पष्ट सुरक्षा आयाम लेती दिखाई दे रही है। वियतनाम इस नीति का महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत-वियतनाम साझेदारी केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की बड़ी रणनीति का अहम हिस्सा बन सकती है।
साफ है कि हनोई में हुई यह बैठक केवल एक औपचारिक कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। यह उस बदलते एशियाई भू-राजनीतिक परिदृश्य का संकेत है जहां भारत अपने रणनीतिक साझेदारों के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक में नई सुरक्षा संरचना तैयार करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।




