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नॉन बायोलॉजिकल विश्वगुरु का चमत्कार: भारत–चीन बराबरी से ‘बेमानी तुलना’ तक पहुँचा”

नई दिल्ली 17 नवंबर 2025

एक दशक में बदली दुनिया: 2011 में भारत–चीन मुकाबला था बराबरी का, आज तुलना तक बेमानी हो गई… यही तो तथाकथित विश्वगुरु महामानव नॉन-बायोलॉजिकल नेता का कमाल है।

2011 का समय याद कीजिए—भारत और चीन को समान तराजू पर तौला जाता था। दोनों उभरती अर्थव्यवस्थाएँ थीं, दोनों का भविष्य उज्ज्वल माना जाता था, और दुनिया बहस करती थी कि आने वाली सदी का नेतृत्व कौन करेगा। TIME मैगज़ीन का कवर दो एशियाई दिग्गजों को एक दूसरे के सामने खड़ा दिखाता था—मानो दोनों एक ही रेस में दौड़ रहे हों। भारत के पास लोकतांत्रिक ऊर्जा, युवा शक्ति, प्रतिभा और सुधारों की गति थी। चीन के पास उत्पादन क्षमता, नीति निरंतरता और निर्णायक शासन। उस समय आने वाला दशक भारत के लिए अवसरों से भरा था—भारत वाकई विश्व अर्थव्यवस्था का बड़ा दावेदार दिखता था।

लेकिन फिर दुनिया बदली—और भारत की दिशा भी। चीन आगे निकल गया, इतना आगे कि अब अमेरिका और यूरोप उसके लिए नीतियाँ बनाते हैं; सप्लाई चेन से लेकर तकनीक, इन्फ्रास्ट्रक्चर, एआई और भू-रणनीति तक, चीन आज एक निर्णायक वैश्विक शक्ति है। वहीं भारत—जिससे कभी उम्मीद थी कि वह चीन की बराबरी करेगा—नीतिगत अस्थिरता, बढ़ती बेरोजगारी, सामाजिक ध्रुवीकरण, कमज़ोर विनिर्माण, शिक्षा-स्वास्थ्य में गिरावट और तर्कहीन प्राथमिकताओं के बीच भटकता चला गया।

और इस पूरी कहानी का सबसे विडंबनापूर्ण हिस्सा है वह “नई कथा” जो देश में गढ़ी गई—जहाँ तथ्यों से ज्यादा कल्पना को बढ़ावा दिया गया। जब असल प्रदर्शन गिरता गया, तब प्रचार बढ़ता गया। जब अर्थव्यवस्था सवाल पूछने लगी, तब नारे गूंजने लगे—“विश्वगुरु”, “महामानव”, “अद्वितीय नेतृत्व”, “नॉन बायोलॉजिकल प्रतिभा”, “जन्मजात विज़नरी”, इत्यादि। पर वास्तविकता कहीं अधिक कठोर है—जो देश एक समय चीन के साथ वैश्विक आर्थिक दौड़ में समान स्तर पर खड़ा था, वह अब तुलना के लायक भी नहीं बचा। चीन आज महाशक्ति है और भारत आज भी उस बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक नीति की तलाश में है जो उसे इस दौड़ में बनाए रख सकती थी।

दुनिया में भारत–चीन तुलना का ख़त्म हो जाना सिर्फ आर्थिक घटना नहीं, यह एक राजनीतिक व्यवस्था की प्राथमिकताओं, दृष्टिहीन योजनाओं और प्रचार-प्रधान शासन शैली का परिणाम है।

अगर 2011 में भारत–चीन बराबर थे और 2025 में तुलना तक बेकार हो गई, तो यह संयोग नहीं—यह उस नेतृत्व का “चमत्कार” है जिसने विकास को कथा में बदल दिया, और कथा को ही उपलब्धि मान लिया।

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