ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 19 जून 2026
भारतीय राजनीति में चुनाव केवल जनता के बीच नहीं लड़े जाते, बल्कि राजनीतिक दलों और उनके सहयोगियों के बीच भरोसे की परीक्षा भी होते हैं। पिछले दो वर्षों में राज्यसभा चुनावों के दौरान जो तस्वीर सामने आई है, उसने INDIA गठबंधन की एक गंभीर कमजोरी को उजागर कर दिया है—क्रॉस वोटिंग। यह अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न बनता जा रहा है।
2024 में हिमाचल प्रदेश से इसकी सबसे नाटकीय शुरुआत हुई। कांग्रेस के छह विधायकों की क्रॉस वोटिंग ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी को राज्यसभा चुनाव में हरा दिया। यह केवल एक सीट की हार नहीं थी, बल्कि उस राजनीतिक संदेश की हार थी कि विपक्ष एकजुट होकर बीजेपी का मुकाबला कर सकता है।
उसी वर्ष उत्तर प्रदेश में भी समाजवादी पार्टी के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग ने बीजेपी को अतिरिक्त फायदा पहुंचाया। विपक्षी एकता की बातें मंचों पर होती रहीं, लेकिन मतदान के समय समीकरण बदल गए। राजनीतिक दलों ने सार्वजनिक रूप से गठबंधन का झंडा उठाया, मगर निजी हितों और स्थानीय समीकरणों ने अलग कहानी लिख दी।
2026 में भी हालात नहीं बदले। बिहार में विपक्षी महागठबंधन के भीतर क्रॉस वोटिंग और अनुपस्थिति ने एनडीए की स्थिति मजबूत कर दी। ओडिशा में क्रॉस वोटिंग के कारण बीजेपी को अतिरिक्त राज्यसभा सीट मिली। हरियाणा में कांग्रेस को अपने ही विधायकों पर कार्रवाई करनी पड़ी। झारखंड में क्रॉस वोटिंग ने एनडीए समर्थित उम्मीदवार प्रीमनाथवानी की राह आसान कर दी।
सवाल यह नहीं है कि क्रॉस वोटिंग क्यों हुई। भारतीय राजनीति में यह हमेशा से होती रही है। असली सवाल यह है कि बार-बार एक जैसी घटनाओं के बावजूद INDIA गठबंधन कोई सबक क्यों नहीं ले रहा?
दरअसल, INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी समस्या वैचारिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। गठबंधन के अधिकांश दल बीजेपी को हराने के लिए साथ तो आए हैं, लेकिन उनके राजनीतिक हित अलग-अलग हैं। कई राज्यों में यही दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी हैं। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर की एकता अक्सर राज्य स्तर की महत्वाकांक्षाओं के सामने कमजोर पड़ जाती है।
राहुल गांधी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति की यह अंतर्विरोधी संरचना है। यदि सहयोगी दल राज्यसभा जैसे अपेक्षाकृत नियंत्रित चुनावों में भी एकजुट नहीं रह सकते, तो 2029 के लोकसभा चुनाव जैसी विशाल राजनीतिक लड़ाई में भरोसे का संकट और गहरा हो सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत केवल उसका संगठन नहीं है, बल्कि उसके सहयोगियों और विधायकों के बीच अनुशासन बनाए रखने की क्षमता है। दूसरी ओर, INDIA गठबंधन अभी तक एक साझा राजनीतिक दृष्टि और संगठनात्मक अनुशासन विकसित नहीं कर पाया है। परिणाम यह है कि जब भी निर्णायक मतदान का समय आता है, व्यक्तिगत हित और स्थानीय समीकरण राष्ट्रीय रणनीति पर भारी पड़ जाते हैं।
राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों में युवाओं, छात्रों, किसानों और सामाजिक मुद्दों के माध्यम से एक वैकल्पिक राजनीतिक विमर्श खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन केवल जनसभाओं और अभियानों से सत्ता परिवर्तन नहीं होता। इसके लिए मजबूत संगठन, विश्वसनीय सहयोगी और स्पष्ट राजनीतिक नेतृत्व भी जरूरी होता है।
आज शायद राहुल गांधी के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या 2029 की लड़ाई गठबंधन की बैसाखियों पर लड़ी जा सकती है? या फिर कांग्रेस को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत को पुनर्निर्मित करने पर अधिक ध्यान देना चाहिए?
इतिहास बताता है कि गठबंधन तब तक प्रभावी रहते हैं, जब तक उनके घटक दल साझा लक्ष्य को अपने तात्कालिक हितों से ऊपर रखते हैं। INDIA गठबंधन के सामने चुनौती यही है। हर बार जब एकजुटता दिखाने का अवसर आया, कई सहयोगी दलों ने अपने क्षेत्रीय हितों को प्राथमिकता दी। इसका राजनीतिक लाभ सीधे बीजेपी को मिला।
राज्यसभा चुनावों की यह श्रृंखला केवल कुछ सीटों का गणित नहीं है। यह विपक्षी राजनीति के भीतर मौजूद भरोसे के संकट का संकेत है। यदि इस संकट का समाधान नहीं निकाला गया, तो 2029 में भी विपक्ष वही गलती दोहरा सकता है जो वह पिछले कई वर्षों से करता आया है—बीजेपी को हराने की रणनीति बनाना, लेकिन अपने ही सहयोगियों को साथ रखने में असफल रहना।
राजनीति में संदेश अक्सर परिणामों से बड़ा होता है। और राज्यसभा चुनावों से निकलने वाला संदेश साफ है—INDIA गठबंधन को बीजेपी से पहले अपने भीतर की कमजोरियों से लड़ना होगा। राहुल गांधी के लिए शायद यही वह क्षण है जब उन्हें केवल अभियान नहीं, बल्कि संगठन और नेतृत्व के स्तर पर भी कुछ कठिन और निर्णायक फैसले लेने होंगे।



