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दस साल बाद का भारत: क्या मोदी-शाह क्षेत्रीय राजनीति का अध्याय बंद कर देंगे?

ओपिनियन | प्रशांत टंडन, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | 19 जून 2026

भारतीय राजनीति को समझने की सबसे बड़ी गलती यह है कि हम उसे सिर्फ आज की सुर्खियों में पढ़ते हैं। किसी नेता की जीत, किसी दल की हार, किसी सांसद की बगावत या किसी सरकार की लोकप्रियता को हम अंतिम सत्य मान लेते हैं। जबकि राजनीति का वास्तविक मूल्यांकन वर्षों के पैमाने पर होता है। अगर आज से दस साल आगे, यानी 2035 के भारत की कल्पना की जाए, तो संभव है कि इतिहासकार इस दौर को उस समय के रूप में दर्ज करें जब नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भारतीय राजनीति का पूरा भूगोल बदल दिया।

महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) के भीतर ताजा उठापटक और सांसदों के संभावित टूटने की खबरें कोई अलग-थलग घटना नहीं हैं। यह उस लंबी प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक ताकत लगातार क्षीण होती दिखाई दे रही है। हाल के घटनाक्रमों में शिवसेना (यूबीटी) के कई सांसदों के अलग होने की अटकलों ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारतीय राजनीति अब क्षेत्रीय दलों से निकलकर एक राष्ट्रीय केंद्रीकरण की ओर बढ़ रही है।

1990 के दशक से लेकर 2014 तक भारतीय राजनीति गठबंधनों, क्षेत्रीय क्षत्रपों और राज्य आधारित दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही। दिल्ली में सरकारें बनती थीं, लेकिन उनकी चाबी चेन्नई, पटना, मुंबई, कोलकाता, लखनऊ और भुवनेश्वर में बैठी पार्टियों के पास होती थी। आज तस्वीर बदल रही है। बीजेपी केवल चुनाव नहीं जीत रही, बल्कि वह विपक्ष की पूरी संरचना को पुनर्गठित कर रही है। कई क्षेत्रीय दल या तो टूट चुके हैं, या सत्ता समीकरणों में अपना पुराना प्रभाव खो चुके हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना का विभाजन, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष और राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की घटती निर्णायक भूमिका इसी बदलाव की ओर संकेत करती है।

मोदी और शाह की राजनीतिक शैली का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे चुनाव को सिर्फ चुनाव नहीं मानते। उनके लिए राजनीति एक सतत संगठनात्मक विस्तार की प्रक्रिया है। बीजेपी का लक्ष्य केवल सत्ता में बने रहना नहीं, बल्कि ऐसा राजनीतिक ढांचा तैयार करना है जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर उसका कोई गंभीर प्रतिद्वंद्वी न बचे। यही कारण है कि बीजेपी ने उन राज्यों में भी अपना विस्तार किया जहां कभी उसकी उपस्थिति सीमित थी।

लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। बीजेपी की वर्तमान शक्ति केवल संगठन या विचारधारा से नहीं आती। उसके पास सत्ता का लाभ, संसाधनों की प्रचुरता, मजबूत मीडिया उपस्थिति और अत्यंत प्रभावी चुनावी मशीनरी है। विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जाता है। इन आरोपों की सत्यता पर बहस हो सकती है, लेकिन यह निर्विवाद है कि बीजेपी आज भारतीय राजनीति की सबसे शक्तिशाली चुनावी मशीन बन चुकी है।

फिर भी इतिहास हमें सावधान करता है। कभी कांग्रेस भी ऐसी ही अजेय दिखाई देती थी। 1984 में उसके पास लोकसभा में अभूतपूर्व बहुमत था। तब भी बहुतों को लगता था कि कांग्रेस का प्रभुत्व स्थायी है। लेकिन कुछ वर्षों बाद वही पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और लंबे संघर्ष के दौर में प्रवेश कर गई। फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस सत्ता से बाहर होने के बावजूद जीवित रही क्योंकि उसके पास ऐतिहासिक जड़ें, वैचारिक पहचान और सामाजिक आधार था।

यहीं बीजेपी के भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न छिपा है। क्या बीजेपी भी सत्ता से बाहर रहने की स्थिति में उतनी ही मजबूत रह पाएगी? क्या उसका मौजूदा ढांचा बिना सत्ता के उसी ऊर्जा से काम करेगा? यह सवाल अभी काल्पनिक लग सकता है, लेकिन राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न वही होते हैं जिनका उत्तर तत्काल दिखाई नहीं देता।

2030 के दशक का भारत आज के भारत से अलग होगा। नई पीढ़ी की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। रोजगार, शिक्षा, तकनीकी अवसर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, डिजिटल अधिकार और जीवन की गुणवत्ता जैसे मुद्दे राजनीति के केंद्र में आ रहे हैं। आने वाली पीढ़ी संभवतः वैसी राजनीति को स्वीकार न करे जो केवल भावनात्मक ध्रुवीकरण पर आधारित हो। उसे परिणाम चाहिए होंगे, अवसर चाहिए होंगे और जवाबदेही चाहिए होगी।

इसलिए आज जो लोग बीजेपी की हर जीत को स्थायी मान रहे हैं और जो लोग उसकी हर हार की प्रतीक्षा कर रहे हैं, दोनों को इतिहास के लंबे फ्रेम में देखने की जरूरत है। संभव है कि अगले दस वर्षों में कई क्षेत्रीय दल केवल नाममात्र रह जाएं। यह भी संभव है कि उनके स्थान पर नए राजनीतिक आंदोलन जन्म लें। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि वह कभी स्थिर नहीं रहता।

आज की घटनाओं को केवल आज की राजनीति मत समझिए। महाराष्ट्र से लेकर बंगाल तक और बिहार से लेकर दिल्ली तक जो कुछ हो रहा है, वह केवल दल-बदल या चुनावी रणनीति नहीं है। यह भारतीय राजनीति के पुनर्गठन की प्रक्रिया है। और इतिहास में वही दौर सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं जब सरकारें नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था बदल रही होती है।

दस साल बाद जब हम पीछे मुड़कर देखेंगे, तब शायद समझ पाएंगे कि 2026 की ये घटनाएं केवल खबरें नहीं थीं, बल्कि एक नए राजनीतिक युग की प्रस्तावना थीं। सवाल यह नहीं है कि आज कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है। सवाल यह है कि 2035 का भारत किस राजनीतिक ढांचे में सांस ले रहा होगा। और शायद उसी सवाल का जवाब आने वाले दशक की सबसे बड़ी राजनीतिक कहानी लिखेगा।

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