राष्ट्रीय / अर्थव्यवस्था / रोजगार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 अगस्त 2026
हम जिस रोजगार संकट की चेतावनी दे रहे थे, आंकड़े उसी खतरे की ओर कर रहे इशारा
देश के युवाओं के सामने रोजगार का सवाल एक बार फिर गंभीर रूप से खड़ा हो गया है। सामने आए कॉरपोरेट हायरिंग आंकड़ों के मुताबिक देश की शीर्ष 11 बड़ी कंपनियों में से 9 कंपनियों में 2025-26 के दौरान नई भर्तियां 2023-24 के मुकाबले घटी हैं। इन कंपनियों में कुल नई हायरिंग लगभग 4,35,066 से घटकर 3,15,768 रह गई—यानी करीब 1.19 लाख कम नौकरियां और लगभग 27% की गिरावट। यह आंकड़ा इसलिए ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि बड़ी कंपनियों को संगठित क्षेत्र में रोजगार पैदा करने की क्षमता का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यदि अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है, कारोबार विस्तार कर रहा है और निवेश बढ़ रहा है, तो स्वाभाविक सवाल है—उस वृद्धि का पर्याप्त हिस्सा नई नौकरियों में क्यों नहीं बदल रहा?
रिलायंस में 1.90 लाख से घटकर 1 लाख नई हायरिंग
तस्वीर में दिए आंकड़ों के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज में 2023-24 में करीब 1.70 लाख नई भर्तियां हुई थीं, जो 2024-25 में बढ़कर करीब 1.90 लाख पहुंचीं, लेकिन 2025-26 में यह संख्या घटकर करीब 1 लाख रह गई। यानी एक वर्ष में नई हायरिंग में लगभग 90 हजार की कमी दिखाई देती है। HDFC बैंक में भी नई भर्तियां 2023-24 के 89,115 से घटकर 2025-26 में 45,902 रह गईं। ऐसे आंकड़े बताते हैं कि बड़ी कंपनियां कारोबार चलाने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए पहले जितनी तेजी से अतिरिक्त कर्मचारी जोड़ने के बजाय अब लागत, तकनीक और मौजूदा कार्यबल की उत्पादकता पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
भारती एयरटेल से टाटा स्टील तक, कई दिग्गजों में गिरावट
यह गिरावट किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं दिखाई देती। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारती एयरटेल में नई हायरिंग 5,956 से घटकर 3,751, अदाणी पोर्ट्स में 354 से 235 और टाटा स्टील में 3,898 से घटकर 1,326 रह गई। हालांकि तस्वीर पूरी तरह एकतरफा भी नहीं है। Power Grid और SBI जैसी कुछ कंपनियों में 2023-24 की तुलना में 2025-26 में हायरिंग बढ़ती दिखाई देती है। इसलिए इसे हर कंपनी या पूरी अर्थव्यवस्था में समान गिरावट कहना सही नहीं होगा, लेकिन 11 में से 9 बड़ी कंपनियों में भर्ती घटना निश्चित रूप से गंभीर संकेत है।
AI और ऑटोमेशन ने बदल दिया नौकरी का गणित
रोजगार संकट को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना भी पूरी तस्वीर नहीं बताएगा। कॉरपोरेट दुनिया तेजी से AI और ऑटोमेशन की ओर बढ़ रही है। तस्वीर में दिए सर्वेक्षण के अनुसार 72% भारतीय कंपनियों के HR अधिकारियों का मानना है कि अगले दो-तीन वर्षों में AI नियमित कामों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाएगा और नौकरियों का स्वरूप बदलेगा। टेक्नोलॉजी-आईटी में AI का उपयोग 62%, HR प्रबंधन में 41%, ऑपरेशंस में 37%, कस्टमर सपोर्ट में 32% और वित्त विभाग में 21% बताया गया है। इसका अर्थ यह है कि वही उत्पादन और सेवाएं भविष्य में अपेक्षाकृत कम कर्मचारियों के साथ संभव हो सकती हैं।
उत्पादकता बढ़ी तो रोजगार क्यों नहीं? यही है सबसे बड़ा सवाल
AI और ऑटोमेशन के जरिए उत्पादकता बढ़ना अपने आप में नकारात्मक नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब तकनीकी प्रगति और आर्थिक विकास के साथ पर्याप्त नई तरह की नौकरियां पैदा नहीं होतीं। उपलब्ध सर्वे में 36% कंपनियों ने ऑटोमेशन से उत्पादकता में मध्यम सुधार और 32% ने बड़ा सुधार बताया। यही आधुनिक अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है—यदि कंपनियां कम कर्मचारियों के साथ अधिक उत्पादन करने लगेंगी तो करोड़ों नए युवाओं को रोजगार कौन देगा? सरकार के लिए अब GDP और निवेश के आंकड़ों के साथ यह बताना भी उतना ही जरूरी है कि विकास कितना रोजगार पैदा कर रहा है।
बड़ी कंपनियों का यह हाल तो MSME में क्या हो रहा होगा?
यहीं रोजगार संकट का दूसरा और ज्यादा व्यापक सवाल सामने आता है। बड़ी सूचीबद्ध कंपनियां भारतीय रोजगार बाजार का केवल एक हिस्सा हैं। देश के विशाल कार्यबल को रोजगार देने में MSME और असंगठित क्षेत्र की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यदि बड़ी और वित्तीय रूप से मजबूत कंपनियां नई भर्ती में सावधानी बरत रही हैं तो छोटे कारोबारों, सूक्ष्म उद्योगों और मध्यम उद्यमों की रोजगार क्षमता का भी गंभीर आकलन जरूरी है। विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि सरकार की आर्थिक नीतियों का असमान प्रभाव छोटे कारोबारों पर पड़ा है। सरकार को इस राजनीतिक आरोप का जवाब व्यापक, क्षेत्रवार और नियमित रोजगार आंकड़ों से देना चाहिए।
मोदी सरकार पर विपक्ष का हमला—“समस्या स्वीकार करने को तैयार नहीं”
इन आंकड़ों को लेकर मोदी सरकार पर राजनीतिक हमला भी तेज होना तय है। सरकार के आलोचकों का कहना है कि वे जिस रोजगार संकट की लगातार चेतावनी देते रहे हैं, कॉरपोरेट हायरिंग के ये आंकड़े उसी चिंता को मजबूत करते हैं। उनका आरोप है कि सरकार रोजगार की वास्तविक स्थिति पर जवाब देने के बजाय उपलब्धियों और बड़े आर्थिक आंकड़ों की ब्रांडिंग पर अधिक जोर देती है। आलोचकों के शब्दों में, युवाओं को प्रचार, सोशल मीडिया की रील या हेडलाइन नहीं बल्कि स्थायी और सम्मानजनक रोजगार चाहिए। हालांकि बड़ी कंपनियों की हायरिंग में गिरावट को अकेले सरकार की नीतियों का परिणाम साबित करने के लिए व्यापक रोजगार, निवेश, क्षेत्रीय मांग और तकनीकी बदलाव के आंकड़ों को भी साथ देखना जरूरी है।
रोजगार का संकट सिर्फ ‘कितनी नौकरियां’ नहीं, ‘कैसी नौकरियां’ का भी
भारत के सामने अब चुनौती केवल नौकरियों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। AI और ऑटोमेशन के दौर में यह भी तय करना होगा कि युवाओं को किस प्रकार के कौशल दिए जाएं ताकि तकनीक उनका रोजगार छीनने के बजाय नए अवसर पैदा करे। यदि नियमित और दोहराव वाले काम मशीनें संभालती हैं, तो डेटा, AI, उन्नत विनिर्माण, स्वास्थ्य, हरित ऊर्जा, डिजाइन, रिसर्च, लॉजिस्टिक्स और आधुनिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नए रोजगार तैयार करने होंगे। Skill India, Make in India और डिजिटल अर्थव्यवस्था की सफलता की असली परीक्षा अंततः इस बात से होगी कि वे कितने गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करते हैं।
27% की गिरावट सिर्फ आंकड़ा नहीं, सरकार के सामने चेतावनी
शीर्ष 11 कंपनियों की नई हायरिंग में करीब 27% की गिरावट को पूरे भारतीय रोजगार बाजार का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। यह उस समय आया संकेत है जब भारत के पास विशाल युवा आबादी है और हर वर्ष बड़ी संख्या में नए लोग नौकरी के बाजार में प्रवेश करते हैं। ऐसे देश में jobless या job-poor growth का जोखिम केवल आर्थिक समस्या नहीं, सामाजिक चुनौती भी बन सकता है।
सरकार और विपक्ष दोनों को रोजगार को राजनीतिक नारे से आगे ले जाना होगा। सवाल सीधा है—अर्थव्यवस्था बढ़ रही है तो नौकरियां उसी अनुपात में क्यों नहीं बढ़ रहीं? कंपनियों की उत्पादकता बढ़ रही है तो उस समृद्धि में युवाओं की हिस्सेदारी कैसे बढ़ेगी? और AI के दौर में आज का छात्र कल किस नौकरी के लिए तैयार हो? देश के युवा को जवाब चाहिए। क्योंकि युवा को खुश करने के लिए रील नहीं, रोजगार चाहिए; हेडलाइन नहीं, हायरिंग चाहिए।




