ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 जून 2026
भारत में अगर कोई व्यक्ति एक छोटा-सा ट्रस्ट बनाना चाहता है तो उसे पंजीकरण कराना पड़ता है। एक एनजीओ चलानी हो तो ऑडिट कराना पड़ता है। किसी धार्मिक या सामाजिक संस्था को दान मिलता है तो आय-व्यय का रिकॉर्ड रखना पड़ता है। सरकार पारदर्शिता की बात करती है, आयकर विभाग जवाब मांगता है और कानून संस्थाओं से जवाबदेही की अपेक्षा करता है।
लेकिन देश के सबसे प्रभावशाली संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर दशकों से एक ऐसा सवाल मौजूद है, जिसका स्पष्ट उत्तर आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया है।
सवाल सीधा है—जब देश की लगभग हर संस्था किसी न किसी कानूनी ढांचे के तहत जवाबदेह है, तो RSS की केंद्रीय संरचना किस प्रकार जवाबदेह है?
यह सवाल नया नहीं है। लेकिन RSS के शताब्दी वर्ष के मौके पर यह बहस फिर तेज हो गई है। वजह भी स्पष्ट है। आज संघ केवल एक वैचारिक संगठन नहीं माना जाता। देश के प्रधानमंत्री, कई केंद्रीय मंत्री, अनेक मुख्यमंत्री और हजारों जनप्रतिनिधि स्वयं को संघ की पृष्ठभूमि से जुड़ा बताते हैं। शिक्षा, सेवा, ग्रामीण विकास, श्रमिक संगठन, छात्र संगठन और सामाजिक गतिविधियों तक उसका व्यापक प्रभाव दिखाई देता है।
यही वह बिंदु है जहां एक लोकतांत्रिक प्रश्न खड़ा होता है। जब किसी संस्था का प्रभाव इतना व्यापक हो, तो क्या उससे पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए?
संघ के समर्थक कहते हैं कि RSS कोई कंपनी, ट्रस्ट या कॉरपोरेट संस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन है। उसकी शाखाएं खुली जगहों पर लगती हैं, उसके कार्यक्रम सार्वजनिक होते हैं और उसकी गतिविधियां किसी से छिपी नहीं हैं। यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण है।
लेकिन आलोचकों का कहना है कि पारदर्शिता केवल गतिविधियों के खुलेपन से नहीं आती। पारदर्शिता का अर्थ यह भी है कि किसी संगठन की वित्तीय संरचना, संसाधनों का स्रोत और प्रशासनिक ढांचा स्पष्ट रूप से समझा जा सके।
संघ से प्रेरित या उससे जुड़े माने जाने वाले अनेक संगठन देशभर में शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विद्या भारती, सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और अन्य अनेक संस्थाएं अपने-अपने कानूनी ढांचे में काम करती हैं। लेकिन आलोचकों का सवाल यह है कि इन सबको जोड़ने वाली व्यापक संरचना की समेकित तस्वीर आखिर कहां उपलब्ध है?
यहीं से “अदृश्य साम्राज्य” की बहस शुरू होती है।
संघ का संगठनात्मक मॉडल हमेशा विकेंद्रीकृत रहा है। समर्थकों के अनुसार यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग ट्रस्ट, समितियां और संस्थाएं अपने-अपने स्तर पर काम करती हैं। लेकिन आलोचक इसी मॉडल को जवाबदेही के दृष्टिकोण से चुनौती देते हैं। उनका तर्क है कि जब संरचना अत्यधिक विकेंद्रीकृत हो जाती है, तो समग्र वित्तीय तस्वीर सार्वजनिक रूप से समझना कठिन हो जाता है।
बहस का दूसरा पहलू और भी दिलचस्प है। संघ से जुड़े कई संगठन विदेशों में भी सक्रिय हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में काम करने वाली संस्थाओं को स्थानीय कानूनों के अनुसार पंजीकरण, वित्तीय विवरण और नियामकीय अनुपालन करना पड़ता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यदि विदेशों में पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन स्वीकार्य है, तो भारत में इसी विषय पर चर्चा असहज क्यों हो जाती है?
दरअसल यह बहस संघ के समर्थन या विरोध की नहीं है। यह बहस लोकतांत्रिक सिद्धांत की है।
क्या किसी भी प्रभावशाली संस्था को केवल इसलिए अलग मानक दिए जा सकते हैं क्योंकि वह सामाजिक या वैचारिक संगठन है? क्या प्रभाव जितना बड़ा होगा, जवाबदेही की अपेक्षा भी उतनी ही बड़ी नहीं होनी चाहिए?
संघ के समर्थक यह भी कहते हैं कि संगठन को मिलने वाली “गुरु दक्षिणा” स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान है और उससे सेवा तथा संगठनात्मक कार्य संचालित होते हैं। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वैच्छिक योगदान भी पारदर्शिता की कसौटी से बाहर नहीं माना जाता। देश की अधिकांश धार्मिक, सामाजिक और सेवा संस्थाएं भी यही तर्क देती हैं, फिर भी उन्हें वित्तीय रिकॉर्ड और कानूनी अनुपालन बनाए रखना पड़ता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रश्न केवल RSS तक सीमित नहीं है। यही सवाल किसी भी बड़े धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक या वैचारिक संगठन से पूछा जाना चाहिए। लोकतंत्र का आधार समान नियम हैं, विशेषाधिकार नहीं।
यदि एक सामान्य नागरिक, एक छोटा ट्रस्ट, एक एनजीओ या एक धार्मिक संस्था कानून के दायरे में आकर अपनी जवाबदेही तय करती है, तो देश की सबसे प्रभावशाली संस्थाओं से भी वही अपेक्षा की जानी चाहिए।
आखिर लोकतंत्र में सम्मान का सबसे मजबूत आधार प्रभाव नहीं, बल्कि पारदर्शिता होता है। और पारदर्शिता का पहला नियम है—जो जितना बड़ा हो, उससे उतने बड़े सवाल पूछे जा सकें।
RSS पर उठ रहे प्रश्नों का अंतिम उत्तर चाहे जो हो, लेकिन इतना निश्चित है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना असहमति नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार है। और जवाबदेही किसी संस्था को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत बनाती है।



