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NCP में बड़ी टूट की अटकलें : प्रफुल पटेल, तटकरे समेत 22 विधायक बीजेपी में जा सकते हैं — रोहित पवार का दावा

राष्ट्रीय/महाराष्ट्र राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 16 मई 2026

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आने के संकेत मिल रहे हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) शरदचंद्र पवार गुट के वरिष्ठ नेता और विधायक रोहित पवार ने दावा किया है कि अजित पवार गुट के कई बड़े नेता जल्द ही बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। रोहित पवार के अनुसार प्रफुल पटेल, सुनील तटकरे और छगन भुजबल समेत करीब 22 विधायक आगामी चुनाव बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर लड़ सकते हैं।

रोहित पवार के इस बयान ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक गलियारों में इसे अजित पवार के निधन के बाद राकांपा के भीतर बढ़ते असंतोष और नेतृत्व संकट से जोड़कर देखा जा रहा है।

दरअसल, फरवरी 2026 में अजित पवार के निधन के बाद उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को पार्टी की कमान सौंपी गई थी। हालांकि इसके बाद से ही पार्टी के भीतर खींचतान और गुटबाजी की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। प्रफुल पटेल और सुनील तटकरे जैसे वरिष्ठ नेताओं को संगठन में कथित तौर पर किनारे किए जाने की चर्चाओं ने अंदरूनी असंतोष को और बढ़ा दिया।

रोहित पवार ने पुणे में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि “कुल 22 विधायक अजित पवार गुट से और कुछ विधायक शिवसेना (शिंदे गुट) से बीजेपी के संपर्क में हैं। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए पूरी रणनीति तैयार की जा चुकी है।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि पार्टी के कई नेताओं का भविष्य पहले ही तय हो चुका है और केवल औपचारिक घोषणा बाकी है।

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इस बीच सुनील तटकरे की शरद पवार से ‘सिल्वर ओक’ में मुलाकात ने भी सियासी अटकलों को और तेज कर दिया है। रोहित पवार ने इस मुलाकात पर तंज कसते हुए कहा कि “शायद तटकरे साहब को सिल्वर ओक की चाय बहुत पसंद है।” हालांकि तटकरे ने इसे केवल शिष्टाचार मुलाकात बताया।

उधर, सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाले राकांपा गुट ने रोहित पवार के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि संगठन पूरी तरह एकजुट है और विपक्ष भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वास्तव में इतने बड़े स्तर पर विधायकों का झुकाव बीजेपी की ओर होता है, तो महाराष्ट्र की महायुति राजनीति और सीट बंटवारे पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। साथ ही राकांपा के अस्तित्व और नेतृत्व को लेकर भी नए सवाल खड़े हो सकते हैं।

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