राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अक्टूबर 2026
किरेन रिजिजू का मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र सरकार की बेचैनी का संकेत माना जा रहा है। आरोप है कि सरकार चाहती है कि गोदी मीडिया एक बार फिर परिसीमन पर अटकलों की पतंग उड़ाने लगे, विपक्ष उस बहस में उलझ जाए और वोट चोरी तथा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े सवाल पीछे छूट जाएं।
लेकिन सवाल है—क्या अब एजेंडा बदलना इतना आसान है?
परिसीमन विधेयक राजनीतिक रूप से मृतप्राय हो चुका है। इसे आगे बढ़ाने की कोशिश हुई तो सरकार के सहयोगी दल कितना साथ देंगे, इस पर भी सवाल हैं। मीडिया में अटकलों का दौर शुरू हो सकता है, लेकिन इससे किसी विधेयक का राजनीतिक भविष्य तय नहीं हो जाता।
जंतर-मंतर से चुनाव आयोग तक पहुंचा युवाओं का गुस्सा
भारत में जेन-ज़ी आंदोलन अब व्यापक रूप लेता दिखाई दे रहा है। पेपर लीक के मुद्दे पर जंतर-मंतर पहुंचे युवा अब वोट चोरी और ज्ञानेश कुमार से जुड़े सवालों पर भी आवाज उठा रहे हैं। संसदीय विपक्ष और युवा आंदोलन के साथ आने को संवैधानिक लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन को मिल रहे समर्थन का दायरा बढ़ने का दावा किया जा रहा है। अब बहस केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही भी इसके केंद्र में है।
चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर सवाल
चुनाव आयोग के भीतर से आ रही खबरों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। दावा किया जा रहा है कि तमाम कोशिशों के बावजूद तीनों चुनाव आयुक्तों की प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हो पाई।
यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं, तो उनका जवाब पारदर्शिता और तथ्यों के साथ दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल बयानों से नहीं, बल्कि उनके कामकाज और जवाबदेही से कायम होती है।
हिंदू-मुसलमान की बहस से क्या बदलेगा एजेंडा?
गोदी मीडिया पर आरोप है कि वह हिंदू-मुसलमान की बहस के जरिए जनमत को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है। लेकिन युवा पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा अब पारंपरिक टेलीविजन मीडिया के बजाय सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों से खबरें हासिल करता है।
इन मंचों ने युवाओं को सवाल उठाने, जानकारी साझा करने और अपनी बात सामने रखने के नए अवसर दिए हैं। ऐसे में केवल बहस का विषय बदल देने से वोट चोरी और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जुड़े सवालों को खत्म करना आसान नहीं होगा।
मोदी-शाह के लिए चार महीने पहले वाली स्थिति में लौटना आसान नहीं
मोदी-शाह की राजनीति के सामने अब चुनौती केवल विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की नहीं, बल्कि युवाओं के बीच उठ रहे सवालों का सामना करने की भी है।
परिसीमन पर नई बहस छेड़कर वोट चोरी के मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश हो सकती है। लेकिन यदि युवा आंदोलन और विपक्ष का साझा दबाव बढ़ता रहा, तो चार महीने पहले वाली राजनीतिक स्थिति में लौटना आसान नहीं होगा।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि सरकार कौन-सा मुद्दा उठाती है। असली सवाल यह है कि जनता किस मुद्दे पर जवाब मांग रही है—और क्या सरकार उन सवालों का जवाब देने को तैयार है?


