ओपिनियन | राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नयी दिल्ली | 22 अक्टूबर 2026
धुआं उठ रहा है, लेकिन आग कहां है?
‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन की चर्चा को केवल राजनीतिक कल्पना कहकर खारिज करना आसान है। लेकिन जब अमेरिका में जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करने, रोकी गई फाइलों और सरकारी जवाबदेही को लेकर नई कानूनी लड़ाई चल रही हो, तो सवालों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
अमेरिका के 17 राज्यों के डेमोक्रेटिक अटॉर्नी जनरल ने कांग्रेस के नेताओं से Epstein Files Transparency Act II पारित करने की अपील की है। 15 अक्टूबर को भेजे गए पत्र में उन्होंने मांग की कि राज्य के जांच अधिकारियों और पीड़ितों को जरूरी रिकॉर्ड तक पहुंच मिले तथा दस्तावेजों को गलत तरीके से रोकने के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुले।
अमेरिकी कांग्रेस में नए कानून की कोशिश
रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2026 के मिडटर्म चुनावों के बाद सांसद कैपिटल हिल लौटेंगे, तब इस प्रस्ताव पर मतदान की संभावना है। रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी ने दावा किया है कि विधेयक पर मतदान कराने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने में केवल दो हस्ताक्षर कम हैं।
अमेरिकी न्याय विभाग ने पहले स्पष्ट किया था कि सार्वजनिक नहीं किए गए दस्तावेजों में कुछ डुप्लिकेट रिकॉर्ड, मामले से असंबंधित सामग्री और कानूनी विशेषाधिकारों के तहत रोकी गई फाइलें शामिल थीं। इनमें वकील-मुवक्किल गोपनीयता और सरकारी निर्णय प्रक्रिया से जुड़े विशेषाधिकार भी शामिल हैं।
लेकिन सवाल यही है कि किन दस्तावेजों को किस आधार पर रोका गया? क्या हर रोक का पर्याप्त कानूनी औचित्य है? क्या सार्वजनिक जवाबदेही के लिए जरूरी सामग्री भी गोपनीयता की आड़ में बाहर रखी गई? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया से ही मिलेगा।
क्या भारत से भी कोई नाम जुड़ा है?
यह सवाल स्वाभाविक है कि एपस्टीन से संबंधित सार्वजनिक या अप्रकाशित रिकॉर्ड में भारत से जुड़े किन लोगों का उल्लेख है। लेकिन किसी का नाम किसी दस्तावेज में होना, किसी तस्वीर में दिखाई देना और किसी अपराध में शामिल होना—तीनों अलग-अलग बातें हैं। किसी व्यक्ति के खिलाफ निष्कर्ष निकालने के लिए संदर्भ और प्रमाण जरूरी हैं।
केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और एपस्टीन की तस्वीरों को लेकर भारत में राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ है। पुरी ने पहले कहा था कि एपस्टीन से उनकी मुलाकात अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े पेशेवर संदर्भ में हुई थी। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने इस स्पष्टीकरण पर सवाल उठाए हैं।
इसलिए असली सवाल केवल तस्वीरों का नहीं, बल्कि मुलाकातों के संदर्भ, समय और उपलब्ध दस्तावेजों का है। किसी भी आरोप की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।
राहुल गांधी के सवाल और संजय राउत का संकेत
राहुल गांधी ने इस विवाद के संदर्भ में बीजेपी और आरएसएस से सवाल पूछे हैं। उन्होंने पूछा कि क्या एपस्टीन से जुड़े मामलों का इस्तेमाल किसी को ब्लैकमेल करने के लिए किया जा सकता है। यह उनका राजनीतिक सवाल है; इसे किसी भारतीय नेता के ब्लैकमेल होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने भी हरदीप पुरी और एपस्टीन की तस्वीरें साझा करते हुए संकेत दिया कि यह केवल शुरुआत हो सकती है और सत्ता परिवर्तन की राजनीति में कुछ बड़े घटनाक्रम सामने आ सकते हैं।
राउत के बयान ने अटकलों को हवा दी है, लेकिन उनके संकेतों से किसी कथित अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक योजना की पुष्टि नहीं होती। यह जानना जरूरी है कि उनके दावे का आधार क्या है और क्या उनके पास कोई अतिरिक्त दस्तावेज या जानकारी है।
जवाबदेही जरूरी, निष्कर्ष प्रमाणों के बाद
एपस्टीन प्रकरण केवल अमेरिका का मामला नहीं रह गया है। यह सत्ता, प्रभावशाली लोगों, संस्थागत पारदर्शिता और पीड़ितों को न्याय दिलाने से जुड़े व्यापक सवाल उठाता है। भारत में भी सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को अपने संपर्कों और सार्वजनिक विवादों पर सवालों का जवाब देना चाहिए।
लेकिन ‘रिजीम चेंज’ की पटकथा तैयार होने का निष्कर्ष निकालने से पहले ठोस प्रमाण जरूरी हैं। धुआं दिखाई देना जांच की वजह हो सकता है, आग लगने का अंतिम प्रमाण नहीं।
अब निगाह इस बात पर है कि अमेरिकी कांग्रेस में प्रस्ताव का क्या होता है, न्याय विभाग रोकी गई फाइलों पर कितनी पारदर्शिता दिखाता है और भारत में उठे सवालों पर संबंधित लोग क्या जवाब देते हैं। लोकतंत्र में न अंधविश्वास उचित है, न बिना प्रमाण फैसला सुनाना—जरूरी है तथ्य, निष्पक्ष जांच और जवाबदेही।


