राजनीति / संसद | अवधेश झा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 मई 2026
संसद की स्थायी समितियों की भूमिका और उनकी गरिमा को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव अब और तेज होता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में मुख्य सचेतक जयराम रमेश ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विशेषाधिकार हनन नोटिस दाखिल कर बड़ा राजनीतिक और संसदीय विवाद खड़ा कर दिया है। जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि शिक्षा मंत्री ने संसद की स्थायी समिति को लेकर “अपमानजनक” और “असंवैधानिक” टिप्पणी की है, जिससे न केवल संसद की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है बल्कि संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना को भी कमजोर करने की कोशिश हुई है।पूरा विवाद 15 मई को हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से शुरू हुआ, जिसमें पत्रकारों ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) और उससे जुड़े विवादों पर सरकार से सवाल पूछा था। खासतौर पर संसदीय स्थायी समिति की उन सिफारिशों पर सवाल किया गया, जिनमें एनटीए की कार्यप्रणाली और परीक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई थीं। इस दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कथित तौर पर कहा कि वह “संसदीय स्थायी समिति के रेड फ्लैग्स पर टिप्पणी नहीं करेंगे” और यह भी कहा कि समिति में विपक्ष के सदस्य होते हैं, इसलिए “वे चीजें एक खास तरीके से लिखते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि वह इस विषय पर केवल हाई लेवल कमेटी ऑफ एक्सपर्ट्स या राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट पर बात करेंगे, न कि संसद की स्थायी समिति की टिप्पणियों पर।
इसी बयान को आधार बनाते हुए जयराम रमेश ने राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन नोटिस दायर किया है। उन्होंने अपने नोटिस में कहा कि धर्मेंद्र प्रधान ने जानबूझकर संसद की स्थायी समिति की गरिमा और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। जयराम रमेश का आरोप है कि मंत्री का यह बयान केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि संसदीय संस्थाओं को कमजोर करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि स्थायी समितियां संसद की सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्थाओं में से एक होती हैं, जहां विभिन्न दलों के सांसद मिलकर नीतियों और कानूनों की गहन समीक्षा करते हैं। ऐसे में किसी मंत्री द्वारा उनकी सिफारिशों को राजनीतिक चश्मे से देखने की बात कहना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अपमान है।
कांग्रेस और विपक्षी दलों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में संसद की संस्थाओं को लगातार कमजोर करने की कोशिश हुई है। उनका आरोप है कि सरकार कई बार संसदीय समितियों की रिपोर्टों और सिफारिशों को नजरअंदाज करती रही है, खासकर तब जब उनमें सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए गए हों। विपक्ष का दावा है कि एनटीए और परीक्षा प्रणाली को लेकर सामने आए विवादों के बावजूद सरकार आलोचनाओं को गंभीरता से लेने के बजाय उन्हें राजनीतिक हमला बताकर खारिज कर रही है।
दूसरी ओर बीजेपी और सरकार के समर्थकों का कहना है कि धर्मेंद्र प्रधान के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। उनका तर्क है कि मंत्री केवल यह कहना चाहते थे कि सरकार विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर निर्णय ले रही है। बीजेपी नेताओं का दावा है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देकर संसद के भीतर नया टकराव पैदा करना चाहती है, जबकि सरकार शिक्षा सुधार और परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए लगातार काम कर रही है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश में NEET पेपर लीक, NTA की विश्वसनीयता और परीक्षा व्यवस्था को लेकर पहले से ही गंभीर बहस चल रही है। विपक्ष लगातार सरकार पर आरोप लगा रहा है कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही खत्म होती जा रही है और संसदीय निगरानी तंत्र को कमजोर किया जा रहा है। ऐसे में संसद की स्थायी समिति को लेकर दिया गया यह बयान राजनीतिक रूप से और भी संवेदनशील बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं रहेगा। यह आने वाले मानसून सत्र में संसद के भीतर बड़ा मुद्दा बन सकता है, जहां विपक्ष सरकार को संसदीय संस्थाओं के सम्मान और जवाबदेही के सवाल पर घेरने की तैयारी कर रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि राज्यसभा के सभापति इस विशेषाधिकार नोटिस पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या इस मामले में शिक्षा मंत्री से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा।




