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“12 दिन में चौथी बार महंगा पेट्रोल-डीजल: अब महंगाई हर रसोई तक पहुंचेगी”

ओपिनियन / व्यापार / अर्थव्यवस्था और जनजीवन | ABC NATIONAL NEWS | 23 मई 2026

“सखी सैयाँ तो खूब ही कमात हैं… महंगाई डायन खाए जात है…”

आज यह गीत केवल फिल्मी लाइन नहीं, बल्कि देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों की सच्चाई बन चुका है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 12 दिनों के भीतर चौथी बार हुई बढ़ोतरी ने साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में महंगाई की आग केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि हर घर की रसोई तक पहुंचेगी। पहले 3 रुपये, फिर 1 रुपया, उसके बाद 91 पैसे और अब पेट्रोल 87 पैसे तथा डीजल 91 पैसे प्रति लीटर महंगा। यानी कुछ ही दिनों में ईंधन की कीमतों में लगातार ऐसी बढ़ोतरी हुई है जिसने आम आदमी का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है।

सरकार और तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का हवाला दे रही हैं, लेकिन आम जनता के लिए सवाल सीधा है—जब भी तेल महंगा होता है तो सबसे ज्यादा बोझ जनता पर ही क्यों डाला जाता है? और जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक कच्चे तेल के दाम कम थे और सरकार ने लगभग 39 लाख करोड़ रुपए का मुनाफा हासिल किया था तो उसका फायदा जनता को दिया था जो अब बोझ जनता पर डाल रही है सरकार।

असल असर अब दिखेगा।

पेट्रोल-डीजल केवल गाड़ियों का ईंधन नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की धड़कन है। डीजल महंगा होते ही सबसे पहले माल ढुलाई महंगी होती है। ट्रक ऑपरेटर किराया बढ़ाते हैं, परिवहन कंपनियां दाम बढ़ाती हैं और उसका सीधा असर बाजार पर पड़ता है।

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इस बीच अब आटा महंगा, चावल महंगा, दूध महंगा, ब्रेड महंगी, तेल और दालें महंगी, फल-सब्जियां महंगी, ऑनलाइन डिलीवरी महंगी, बस और ऑटो का किराया महंगा हो चुका है। यानी महंगाई अब धीरे-धीरे नहीं, बल्कि लहर की तरह हर घर और हर रसोई में प्रवेश कर रही है।

रसोई का बजट सबसे तेजी से बिगड़ रहा है। गृहिणियां हर दिन बाजार में बदलते दाम देखकर परेशान हैं। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के परिवार अब खाने-पीने की चीजों में कटौती करने को मजबूर होते दिख रहे हैं।

सबसे ज्यादा मार उस वर्ग पर पड़ती है जो पहले ही EMI, स्कूल फीस, किराया और स्वास्थ्य खर्चों के दबाव में जी रहा है। मध्यम वर्ग की आय उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही जितनी तेजी से जीवन-यापन की लागत बढ़ रही है। गरीब वर्ग के लिए तो यह स्थिति और भयावह है, क्योंकि उसकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और परिवहन पर ही खर्च होता है।

विडंबना यह है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन आम आदमी लगातार महंगाई और बेरोजगारी के दोहरे दबाव में फंसता जा रहा है। युवाओं के सामने नौकरी का संकट है और जो काम कर रहे हैं, उनकी कमाई महंगाई खा रही है।

ईंधन मूल्य वृद्धि का एक बड़ा राजनीतिक पक्ष भी है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता होता है, तब टैक्स बढ़ाकर राहत जनता तक नहीं पहुंचने दी जाती। लेकिन जैसे ही वैश्विक संकट आता है, पूरा बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाता है। सवाल यह भी है कि क्या सरकारों के पास कोई दीर्घकालिक वैकल्पिक ऊर्जा नीति है, जिससे जनता को बार-बार ऐसे झटके न झेलने पड़ें?

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विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अब तेजी से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, सोलर एनर्जी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट आधारित मॉडल की ओर बढ़ना होगा। वरना हर अंतरराष्ट्रीय संकट का पहला असर भारतीय रसोई और जेब पर ही पड़ता रहेगा।

आज जरूरत केवल आंकड़ों की नहीं, संवेदनशील आर्थिक नीति की है। क्योंकि महंगाई केवल अर्थव्यवस्था का विषय नहीं होती—यह सीधे आम आदमी की जिंदगी, उसकी थाली और उसके भविष्य से जुड़ा सवाल बन जाती है।

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