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फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जे की कीमत कौन चुकाएगा?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/ लंदन | 9 सितंबर 2026

यह सिर्फ व्यापार प्रतिबंध नहीं, इजरायल की बस्ती नीति के खिलाफ बदलती दुनिया का बड़ा संदेश है

ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा समेत 12 देशों का वेस्ट बैंक में इजरायली बस्तियों से जुड़े सामान के व्यापार पर प्रतिबंध लगाने या उसका समर्थन करने का फैसला एक सामान्य कारोबारी खबर नहीं है। यह उस अंतरराष्ट्रीय सोच में बदलाव का संकेत है, जिसमें लंबे समय से इजरायल की बस्ती नीति को लेकर चिंता तो जताई जाती रही, लेकिन उसके आर्थिक परिणामों को लेकर ठोस कदम सीमित रहे। अब इन 12 देशों ने कहा है कि वेस्ट बैंक में बस्तियों का विस्तार और फिलिस्तीनियों के खिलाफ बढ़ती हिंसा दो-राष्ट्र समाधान की संभावना को कमजोर कर रही है। ब्रिटेन ने साफ शब्दों में कहा है कि अब केवल अन्याय और पीड़ा की आलोचना करना पर्याप्त नहीं, बल्कि कार्रवाई करनी होगी। यही इस खबर की असली ताकत है—इजरायल के साथ राजनयिक और आर्थिक रिश्ते रखने वाले देश अब उसकी सरकार की हर नीति को आंख बंद करके स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिख रहे।

बस्ती विस्तार आखिर है क्या और विवाद इतना गंभीर क्यों है?

इसे समझना बहुत जरूरी है। 1967 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद इजरायल ने वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लिया। इसके बाद इस क्षेत्र में इजरायली नागरिकों को बसाने की प्रक्रिया लगातार बढ़ती गई और समय के साथ बड़े-बड़े शहरनुमा इलाके, छोटी बस्तियां और आउटपोस्ट विकसित होते गए। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संयुक्त राष्ट्र और अधिकांश अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन इजरायली बस्तियों को अवैध मानते हैं, जबकि इजरायल इस कानूनी व्याख्या को स्वीकार नहीं करता। समस्या केवल इतनी नहीं है कि किसी खाली जमीन पर नई इमारत खड़ी हो रही है। असली सवाल यह है कि फिलिस्तीनी राज्य के लिए जिस जमीन को भविष्य में इस्तेमाल किया जाना है, वह लगातार बस्तियों और उनसे जुड़े ढांचे में बदलती जा रही है। इसी वजह से आलोचकों का कहना है कि बस्ती विस्तार फिलिस्तीन को छोटे-छोटे अलग-अलग हिस्सों में बांटकर एक व्यवहार्य स्वतंत्र राष्ट्र की संभावना को कमजोर कर रहा है।

‘बस्ती उत्पाद’ का मतलब क्या है?

ब्रिटेन जिस बस्ती उत्पादों पर प्रतिबंध की बात कर रहा है, उसका मतलब इजरायल में बने हर सामान से नहीं है। इसका संबंध खास तौर पर कब्जे वाले वेस्ट बैंक में स्थित इजरायली बस्तियों में पैदा या तैयार किए गए उत्पादों से है। इनमें खजूर, अंगूर, शराब, एवोकाडो, आम, जड़ी-बूटियां और दूसरी कृषि उपज जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं। मसलन, यदि वेस्ट बैंक की किसी इजरायली बस्ती में खजूर उगाई गई और उसे यूरोप में बेचा गया, तो वह बस्ती उत्पाद की श्रेणी में आ सकती है। यही वजह है कि ब्रिटेन का फैसला प्रतीकात्मक होने के साथ आर्थिक भी है—संदेश यह है कि जिस जमीन पर बस्तियां अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध मानी जाती हैं, वहां की आर्थिक गतिविधियों को सामान्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लाभ क्यों मिले?

खजूर के एक पेड़ के पीछे छिपी जमीन और पानी की पूरी कहानी

वेस्ट बैंक की जॉर्डन घाटी इस विवाद को समझने का सबसे अच्छा उदाहरण है। यह बेहद उपजाऊ क्षेत्र है और यहां खजूर की खेती बड़े पैमाने पर होती है। एक तरफ इजरायली बस्ती के किसान यूरोप, अमेरिका और दूसरे बाजारों में अपनी उपज बेचते हैं, दूसरी तरफ फिलिस्तीनी किसान पानी की कमी और निर्यात संबंधी बाधाओं से जूझने की बात करते हैं। बीबीसी की रिपोर्ट में एक फिलिस्तीनी किसान ने बताया कि उसके खेतों के पेड़ों को जरूरत के एक-तिहाई से भी कम पानी मिला। फिलिस्तीनी किसानों और अधिकार संगठनों का लंबे समय से आरोप है कि पानी, जमीन और बाजार तक पहुंच के मामले में बस्तियों को फायदा मिलता है और फिलिस्तीनी किसानों के सामने अधिक प्रतिबंध और लागत आती है। अगर इन परिस्थितियों में एक किसान को पर्याप्त पानी तक न मिले और दूसरे को उसी क्षेत्र की जमीन पर बेहतर संसाधन मिलें, तो यह सिर्फ कृषि की समस्या नहीं रह जाती—यह सत्ता, जमीन और संसाधनों के असमान वितरण का सवाल बन जाती है।

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बस्ती विस्तार के साथ हिंसा का सवाल और ज्यादा गंभीर है

वेस्ट बैंक में विवाद केवल निर्माण और व्यापार तक सीमित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों ने इजरायली बसने वालों द्वारा फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा में बढ़ोतरी पर चिंता जताई है। फिलिस्तीनी समुदायों पर हमले, संपत्ति को नुकसान, खेतों और पशुओं को नुकसान पहुंचाने तथा पानी और दूसरी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच बाधित होने के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। कुछ मामलों में फिलिस्तीनी समुदायों के विस्थापन की घटनाएं भी सामने आई हैं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर इजरायली नागरिक या हर इजरायली बस्ती निवासी हिंसा में शामिल नहीं है; आलोचना मुख्य रूप से सरकारी बस्ती नीति, उसके विस्तार और हिंसक बसने वालों को लेकर उठ रहे गंभीर आरोपों की है। किसी पूरे समुदाय को दोषी ठहराने के बजाय नीति और जिम्मेदार व्यक्तियों की जवाबदेही तय करना ही सही रास्ता है।

इजरायल की विस्तारवादी राजनीति पर सवाल उठना जरूरी है

इजरायल की सुरक्षा का अधिकार है, लेकिन क्या फिलिस्तीनियों की सुरक्षा का अधिकार नहीं है? हमास द्वारा 7 अक्टूबर 2023 को इजरायली नागरिकों पर किया गया हमला और बंधक बनाना निंदनीय था और उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन किसी आतंकवादी संगठन के अपराध को इजरायल सरकार की हर सैन्य कार्रवाई, बस्ती विस्तार या फिलिस्तीनी नागरिकों के खिलाफ होने वाले हर कथित उल्लंघन का औचित्य नहीं बनाया जा सकता। एक अपराध दूसरे अपराध को वैध नहीं बना देता। यही वह बुनियादी सिद्धांत है जिसे दुनिया को बनाए रखना होगा। इजरायल को अपने नागरिकों की सुरक्षा चाहिए तो फिलिस्तीनियों को भी अपने बच्चों, घरों, खेतों, पानी और भविष्य की सुरक्षा चाहिए। यदि किसी सरकार की नीतियां लगातार दूसरे समुदाय की जमीन और राजनीतिक भविष्य को सीमित करती हैं, तो उस नीति की आलोचना करना किसी देश या धर्म से नफरत नहीं, बल्कि सत्ता से जवाब मांगना है।

फिलिस्तीन की आवाज दबनी नहीं चाहिए

फिलिस्तीन के सवाल को केवल इजरायल-हमास संघर्ष तक सीमित कर देना भी एक बड़ी भूल है। फिलिस्तीनी जनता की अपनी जमीन, स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकार और आत्मनिर्णय की मांग उससे कहीं पुरानी है। आज वेस्ट बैंक में लाखों फिलिस्तीनी रहते हैं और उनके बीच लगातार बढ़ती बस्तियां भविष्य के स्वतंत्र फिलिस्तीन की भौगोलिक निरंतरता को चुनौती देती हैं। पूर्वी यरुशलम, वेस्ट बैंक और गाजा को लेकर भविष्य की राजनीतिक व्यवस्था का सवाल अभी भी अनसुलझा है। अगर जमीन पर ऐसी परिस्थितियां लगातार बनाई जाती रहीं जिनमें एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य बनाना ही मुश्किल हो जाए, तो फिर दुनिया का दो-राष्ट्र समाधान आखिर किस जमीन पर बनेगा? यह प्रश्न अब केवल फिलिस्तीनियों का नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की विश्वसनीयता का प्रश्न है।

12 देशों का कदम इसलिए बड़ा है क्योंकि निशाना नीति पर है

ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे, पोलैंड, पुर्तगाल, स्पेन और स्वीडन का यह रुख बताता है कि बस्ती नीति को लेकर पश्चिमी देशों के भीतर भी असहजता बढ़ रही है। आर्थिक प्रभाव तत्काल बहुत बड़ा हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन राजनीतिक संदेश बेहद स्पष्ट है—बस्ती विस्तार को सामान्य आर्थिक गतिविधि मानकर हमेशा बाजार उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। खास तौर पर ब्रिटेन का यह कहना कि वेस्ट बैंक पर इजरायली कब्जा अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है, उसकी नीति में महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। इजरायल ने इसके जवाब में ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास बंद करने समेत कई जवाबी कदमों की घोषणा की है। यानी एक व्यापारिक प्रतिबंध अब राजनयिक रिश्तों को भी प्रभावित कर रहा है।

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अब भारत की भूमिका पर भी सवाल उठना चाहिए

भारत की फिलिस्तीन नीति कोई 2014 के बाद शुरू हुई कहानी नहीं है। आजादी के बाद से भारत ने फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों और आत्मनिर्णय के प्रश्न का समर्थन किया। जवाहरलाल नेहरू के दौर से लेकर बाद की सरकारों तक फिलिस्तीन भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। भारत ने 1974 में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को फिलिस्तीनी जनता का प्रतिनिधि मानने वाले शुरुआती देशों में स्थान बनाया और 1988 में फिलिस्तीन राज्य को मान्यता दी। यह भी महत्वपूर्ण है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी फिलिस्तीन के प्रति भारत की पारंपरिक नीति को जारी रखा और फिलिस्तीन को सहायता दी। इसलिए फिलिस्तीन का समर्थन किसी एक पार्टी की निजी राजनीतिक विरासत नहीं, बल्कि लंबे समय तक चली व्यापक भारतीय विदेश नीति का हिस्सा रहा है।

मोदी दौर में इजरायल से दोस्ती बढ़ी, लेकिन फिलिस्तीन खत्म नहीं हुआ

2014 के बाद नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान भारत-इजरायल संबंधों में अभूतपूर्व राजनीतिक दृश्यता और रणनीतिक गहराई आई। 2017 में नरेंद्र मोदी इजरायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने और 2018 में वह फिलिस्तीन भी गए। भारत आज भी आधिकारिक रूप से दो-राष्ट्र समाधान और एक स्वतंत्र, संप्रभु तथा व्यवहार्य फिलिस्तीन के समर्थन की बात करता है। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि 2014 के बाद भारत ने फिलिस्तीन को आधिकारिक रूप से छोड़ दिया। लेकिन यह आलोचना जरूर की जा सकती है कि इजरायल के साथ रक्षा, तकनीक, कृषि और रणनीतिक सहयोग बढ़ने के साथ फिलिस्तीन के सवाल पर भारत की राजनीतिक मुखरता पहले जैसी दिखाई नहीं देती। भारत को इजरायल से दोस्ती रखने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, लेकिन दोस्ती का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि फिलिस्तीन के अधिकारों पर हमारी आवाज धीमी पड़ जाए।

मुस्लिम दूरी की राजनीति वाला आरोप—लेकिन इतिहास को पूरा पढ़ना होगा

यह कहना कि भारत का इजरायल की ओर झुकाव केवल “मुस्लिम से दूरी” की राजनीति का परिणाम है, पूरी तस्वीर नहीं बताता। भारत-इजरायल के पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में नरसिम्हा राव सरकार के समय स्थापित हुए थे और उसके बाद कांग्रेस तथा भाजपा दोनों की सरकारों ने अलग-अलग क्षेत्रों में संबंध मजबूत किए। रक्षा जरूरतें, आतंकवाद-रोधी सहयोग, कृषि तकनीक और रणनीतिक हित इसके महत्वपूर्ण कारण रहे हैं। लेकिन राजनीति का एक दूसरा पहलू भी है—किसी समुदाय से राजनीतिक दूरी बनाने की प्रवृत्ति अगर विदेश नीति की संवेदनशीलता को प्रभावित करे तो वह भारत की पुरानी स्वतंत्र विदेश नीति की आत्मा के लिए नुकसानदेह हो सकती है। भारत को किसी धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हित और अपने संवैधानिक-मूल्य आधारित दृष्टिकोण के आधार पर इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ नीति बनानी चाहिए।

ईरान के मामले में भी भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति याद रखनी होगी

भारत और ईरान का रिश्ता भी केवल वर्तमान भू-राजनीति का रिश्ता नहीं है। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत और व्यापारिक संबंध हैं और आज चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत ने चाबहार के विकास में निवेश किया है क्योंकि यह उसे पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्वपूर्ण रास्ता देता है। ऐसे में अमेरिका और इजरायल के साथ भारत के संबंधों के कारण ईरान के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को कमजोर करना भारत के दीर्घकालीन रणनीतिक हितों के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है। भारत की ताकत हमेशा यही रही है कि वह किसी एक शक्ति-गुट का पिछलग्गू बनने के बजाय सभी से अपने हित और सिद्धांत के आधार पर संबंध रखता है।

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ईरान युद्ध में भी भारत की आवाज नागरिकों के पक्ष में होनी चाहिए

अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष में सैन्य ठिकानों के साथ नागरिक क्षेत्रों पर हमलों और आम लोगों के मारे जाने की खबरें बेहद चिंताजनक हैं। लेकिन यहां भी हमें अतिरंजित या अपुष्ट आंकड़ों से बचना चाहिए। यह कहना कि “लाखों ईरानी मारे जा चुके हैं” या “लाखों करोड़ रुपये नष्ट हो चुके हैं” बिना विश्वसनीय प्रमाण के तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन हजारों लोगों की मौत, बड़े पैमाने पर विनाश और नागरिकों पर पड़ने वाला युद्ध का असर अपने आप में इतना गंभीर है कि भारत को शांति, बातचीत और नागरिकों की सुरक्षा के पक्ष में स्पष्ट आवाज उठानी चाहिए। भारत की विदेश नीति की ताकत इसी स्वतंत्रता में रही है कि वह अमेरिका का मित्र होते हुए भी रूस से संबंध रख सकता है, ईरान से सहयोग कर सकता है और अरब दुनिया से अपने रिश्ते बनाए रख सकता है।

भारत को इजरायल का मित्र नहीं, न्याय का मित्र बनना चाहिए

भारत को इजरायल के साथ अपने संबंधों को खत्म करने की जरूरत नहीं है और न ही ऐसा करना भारत के हित में होगा। लेकिन भारत को यह भी साफ करना चाहिए कि दोस्ती का अर्थ किसी सरकार की हर नीति का समर्थन नहीं होता। इजरायल की सुरक्षा का समर्थन करते हुए फिलिस्तीनी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की मांग की जा सकती है। हमास के आतंकवाद की निंदा करते हुए फिलिस्तीनी राज्य की मांग का समर्थन किया जा सकता है। ईरान से रणनीतिक संबंध रखते हुए अमेरिका से भी दोस्ती रखी जा सकती है। यही स्वतंत्र विदेश नीति है—किसी के खेमे में जाना नहीं, बल्कि हर मुद्दे पर अपने सिद्धांत और राष्ट्रीय हित के आधार पर निर्णय लेना।

फिलिस्तीन के लिए आवाज उठाना किसी धर्म के खिलाफ होना नहीं है

सबसे जरूरी बात यह है कि फिलिस्तीन के समर्थन को यहूदी-विरोध या किसी धार्मिक संघर्ष के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। इजरायल की सरकार की नीतियों की आलोचना दुनिया भर के यहूदियों की आलोचना नहीं है। उसी तरह हमास के आतंकवाद की निंदा करना फिलिस्तीनी जनता की निंदा नहीं है। मुद्दा धर्म का नहीं, इंसाफ का है। एक फिलिस्तीनी बच्चे का जीवन उतना ही मूल्यवान है जितना किसी इजरायली बच्चे का; एक फिलिस्तीनी मां का दर्द उतना ही वास्तविक है जितना किसी इजरायली मां का। अगर दुनिया मानवाधिकार को सार्वभौमिक मानती है तो उसका पैमाना भी सार्वभौमिक होना चाहिए।

आखिर दुनिया कब कहेगी—कब्जा हमेशा नहीं चल सकता?

ब्रिटेन और 11 अन्य देशों का कदम शायद तुरंत वेस्ट बैंक की तस्वीर न बदल दे। शायद इजरायल दूसरे बाजार तलाश ले और शायद बस्ती उत्पादों का व्यापार पूरी तरह रुक भी न पाए। लेकिन इतिहास में कई बार राजनीतिक बदलाव आर्थिक कदमों से पहले शुरू होते हैं। जब देशों का एक समूह यह कहना शुरू कर दे कि बस्ती विस्तार दो-राष्ट्र समाधान को नष्ट कर रहा है और अब केवल बयान नहीं बल्कि कार्रवाई चाहिए, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

फिलिस्तीन के लिए आवाज इसलिए बुलंद करनी होगी क्योंकि एक पूरी जनता को हमेशा विस्थापन, कब्जे, हिंसा और अनिश्चित भविष्य के बीच नहीं छोड़ा जा सकता। इजरायल की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन फिलिस्तीन की आजादी भी जरूरी है। इजरायल के नागरिकों की जिंदगी मूल्यवान है, लेकिन फिलिस्तीनी नागरिकों की जिंदगी भी उतनी ही मूल्यवान है।

और भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वह अपनी उस ऐतिहासिक विदेश नीति की आत्मा को फिर से मजबूत करेगा, जिसने नेहरू से लेकर वाजपेयी तक फिलिस्तीन के अधिकारों का समर्थन किया था, और इजरायल से दोस्ती रखते हुए भी कब्जे और अन्याय के खिलाफ स्वतंत्र आवाज उठाई थी?

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