ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 जून 2026
भारतीय राजनीति में बहुमत हमेशा सत्ता की सबसे बड़ी ताकत माना गया है। लेकिन जब बहुमत पर्याप्त न लगे और लक्ष्य संविधान संशोधन और राजनीतिक पुनर्संरचना के लिए आवश्यक संख्या बन जाए, तब राजनीति का चरित्र बदलने लगता है। आज राजनीतिक गलियारों में चर्चा 272 या 300 की नहीं, बल्कि 363 सांसदों की है। यह वह संख्या है जो लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के आसपास मानी जाती है और बड़े संवैधानिक तथा राजनीतिक बदलावों का रास्ता खोल सकती है।विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी केवल चुनाव जीतने की राजनीति नहीं कर रही, बल्कि 2029 के लिए एक व्यापक राजनीतिक अभियान चला रही है, जिसका अंतिम लक्ष्य लोकसभा में 363 सांसदों का आंकड़ा हासिल करना है। बीजेपी इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे अपने बढ़ते जनाधार और संगठनात्मक क्षमता का परिणाम बताती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश में जो कुछ हो रहा है, वह केवल राजनीतिक विस्तार है या उससे कहीं अधिक?
पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर एक अलग कहानी कहती दिखाई देती है। पहले आम आदमी पार्टी में लगातार टूट और दबाव की चर्चाएं हुईं। फिर तृणमूल कांग्रेस में बड़े पैमाने पर बगावत और सांसदों के अलग होने की घटनाएं सामने आईं। अब राजनीतिक विश्लेषकों की नजर उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी पर है। समाजवादी पार्टी के 37 सांसद लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकतों में गिने जाते हैं। ऐसे में विपक्ष को आशंका है कि आने वाले वर्षों में इन दलों पर भी राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
इस पूरे राजनीतिक अभियान के केंद्र में डिलिमिटेशन (परिसीमन) का प्रश्न भी मौजूद है। परिसीमन केवल सीटों के पुनर्निर्धारण की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह आने वाले दशकों के लिए राजनीतिक शक्ति का भूगोल तय करता है। कौन सा राज्य कितना प्रभावशाली होगा, किस क्षेत्र की कितनी सीटें होंगी और राष्ट्रीय राजनीति का संतुलन किस दिशा में झुकेगा—इन सबका निर्धारण डिलिमिटेशन से होता है।
यही कारण है कि विपक्ष को डर है कि 2029 से पहले संसद में असाधारण बहुमत हासिल करने की कोशिशों के पीछे केवल सरकार बनाने की इच्छा नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति का स्थायी ढांचा तैयार करने की रणनीति भी हो सकती है। यदि लोकसभा में 363 सांसदों का आंकड़ा हासिल हो जाता है, तो डिलिमिटेशन से जुड़े निर्णयों पर राजनीतिक प्रभाव और भी अधिक बढ़ सकता है।
लोकतंत्र में केवल चुनाव जीतना महत्वपूर्ण नहीं होता। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि चुनावी मैदान बराबरी का बना रहे। यदि जनता के मन में यह धारणा बनने लगे कि संस्थाएं, संसाधन और राजनीतिक प्रक्रियाएं एक ही दिशा में काम कर रही हैं, तो लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता परिवर्तन की संभावना में होती है। जब यह संभावना कमजोर पड़ती दिखे, तब चिंता स्वाभाविक है।
आज विपक्ष चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों, नौकरशाही और अन्य संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहा है। सरकार का कहना है कि संस्थाएं पूरी तरह स्वतंत्र हैं और विपक्ष अपनी राजनीतिक विफलताओं को छिपाने के लिए ऐसे आरोप लगा रहा है। लेकिन लोकतंत्र के लिए यह स्वयं में चिंताजनक स्थिति है कि संस्थाओं की निष्पक्षता ही राजनीतिक बहस का विषय बन चुकी है।
राजनीतिक दल टूटते रहे हैं और आगे भी टूटेंगे। यह लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब लगभग हर बड़ी टूट का राजनीतिक लाभ एक ही दल को मिलता दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या यह केवल राजनीतिक आकर्षण है, या फिर सत्ता का प्रभाव इतना व्यापक हो चुका है कि विपक्षी दलों का अस्तित्व ही चुनौती बन गया है?
2029 अभी दूर है, लेकिन उसकी लड़ाई शुरू हो चुकी है। बीजेपी अपने राजनीतिक विस्तार को राष्ट्रीय स्थिरता और मजबूत नेतृत्व का प्रमाण बताती है। वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक संतुलन और संघीय ढांचे के लिए खतरा मानता है। इन दोनों दावों के बीच सबसे महत्वपूर्ण भूमिका जनता की है, क्योंकि अंततः लोकतंत्र का भविष्य किसी पार्टी कार्यालय, सरकारी एजेंसी या अदालत में नहीं, बल्कि मतदाता के मन में तय होता है।
आख़िरकार सवाल केवल 363 सांसदों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र इतनी मजबूती रखता है कि किसी भी दल की अपार शक्ति के बीच भी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, संस्थागत स्वतंत्रता, संघीय संतुलन और प्रभावी विपक्ष को सुरक्षित रख सके?
क्योंकि इतिहास बताता है कि लोकतंत्र तब कमजोर नहीं होता जब कोई दल बहुत शक्तिशाली हो जाता है। लोकतंत्र तब कमजोर होता है जब बाकी सभी संस्थाएं और राजनीतिक विकल्प बहुत कमजोर हो जाते हैं। तब बहुमत केवल संख्या नहीं रहता, व्यवस्था का स्वरूप बन जाता है।




