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दहेज: 21वीं सदी में भी बेटियों की जान क्यों ले रहा है समाज?

ओपिनियन / सामाजिक विमर्श | संगीता गोयल | ABC NATIONAL NEWS | 23 मई 2026

भारत चंद्रयान और डिजिटल क्रांति की बात करता है, लेकिन उसी भारत में हर दिन औसतन 15 से ज्यादा बेटियां दहेज की भेंट चढ़ रही हैं। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक विफलता है। NCRB 2024 के आंकड़े बताते हैं कि एक साल में 5737 महिलाओं की मौत दहेज से जुड़े मामलों में दर्ज हुई। सबसे ज्यादा 2038 मौतें उत्तर प्रदेश में हुईं, जबकि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य भी इस भयावह सूची में ऊपर हैं। ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं। इनके पीछे हजारों अधूरे सपने, टूटी हुई जिंदगियां और वे बेटियां हैं जो सम्मान, प्यार और सुरक्षित जीवन का सपना लेकर ससुराल जाती हैं, लेकिन लौटती अर्थी में हैं।

आज सवाल केवल कानून का नहीं, मानसिकता का है।

ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर और पलक रजक जैसे मामलों ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि पढ़ाई, नौकरी और आधुनिकता के बावजूद भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी बेटी को “बोझ” और शादी को “लेन-देन” की व्यवस्था की तरह देखता है। दुखद यह है कि कई बार लड़कियां मरने से पहले संकेत देती हैं। वे फोन पर रोती हैं, मां से घर ले जाने की बात करती हैं, भाई या दोस्त से अपना दर्द साझा करती हैं। लेकिन परिवार अक्सर “समाज क्या कहेगा” के डर में उन्हें वापस उसी आग में धकेल देता है।

हम बेटियों को बचपन से क्या सिखाते हैं?

“घर बचाना”, “समझौता करना”, “थोड़ा एडजस्ट कर लो” — यही शब्द उनकी परवरिश का हिस्सा बन जाते हैं। शायद इसी वजह से हजारों लड़कियां मानसिक प्रताड़ना को “शादी का सामान्य हिस्सा” मानकर चुपचाप सहती रहती हैं, जब तक कि एक दिन उनकी मौत की खबर नहीं आ जाती।

सबसे खतरनाक बात यह है कि दहेज अब केवल गांवों या अशिक्षित समाज की समस्या नहीं रहा। महानगरों, पढ़े-लिखे परिवारों और उच्च आय वर्ग में भी शादी “स्टेटस शो” बनती जा रही है। महंगी कार, फ्लैट, जूलरी, कैश और लग्जरी लाइफस्टाइल को “गिफ्ट” का नाम देकर सामाजिक स्वीकृति दी जा रही है। यानी समाज दहेज को खुलेआम अपराध नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रतीक बना चुका है।

यह भी सोचने वाली बात है कि जिन राज्यों में महिलाओं की शिक्षा और रोजगार बेहतर है, वहां भी दहेज हिंसा पूरी तरह खत्म नहीं हुई। इसका मतलब साफ है कि समस्या केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता और पितृसत्तात्मक मानसिकता की भी है।

हालांकि उम्मीद की तस्वीर भी मौजूद है। NCRB के आंकड़ों के अनुसार हिमाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, मेघालय, लद्दाख और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में दहेज हत्या का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ। यह साबित करता है कि यदि समाज, परिवार और कानून संवेदनशीलता के साथ काम करें, तो बदलाव संभव है।

लेकिन बदलाव केवल कानून से नहीं आएगा।

दहेज निषेध कानून दशकों से मौजूद है, फिर भी मौतें जारी हैं। क्योंकि समाज की सोच नहीं बदली। जब तक दहेज लेने वालों का सामाजिक बहिष्कार नहीं होगा, जब तक शादी को “इवेंट” और “स्टेटस” के बजाय बराबरी के रिश्ते की तरह नहीं देखा जाएगा, तब तक बेटियां इसी तरह मरती रहेंगी।

हमें बेटियों को केवल शादी निभाना नहीं, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना भी सिखाना होगा। परिवारों को यह समझना होगा कि बेटी की जान किसी रिश्ते, समाज या प्रतिष्ठा से ज्यादा कीमती है।

भारत तब आधुनिक नहीं कहलाएगा जब उसके शहर स्मार्ट बनेंगे। भारत तब सचमुच आधुनिक कहलाएगा जब किसी पिता को बेटी की शादी के लिए कर्ज नहीं लेना पड़ेगा, और किसी बेटी को दहेज के कारण अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी।

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