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संविधान की मूल संरचना में कोई बदलाव नहीं: ‘एक देश-एक चुनाव’ प्रस्ताव पर लॉ पैनल का स्टैंड

आलोक कुमार । नई दिल्ली 29 नवंबर 2025

नई दिल्ली — भारत में The Constitution (One Hundred and Twenty‑Ninth Amendment) Bill, 2024 के माध्यम से लाए गए “One Nation One Election” यानी केंद्र व राज्यों में एक-साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव पर अब तक चली संवैधानिक व कानूनी बहस में एक अहम मोड़ आ गया है। देश के कानूनी विशेषज्ञों व एक विधि आयोग (लॉ पैनल) ने इस बात पर जोर दिया है कि इस प्रस्ताव से देश के संविधान की मूल संरचना (basic structure) पर कोई आघात नहीं होगा।

समय-सार के अनुसार, केंद्र सरकार ने यह प्रस्ताव प्रस्तुत किया है कि भविष्य में Election Commission of India द्वारा लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही चक्र में कराए जाएँ — अर्थात् “एक देश-एक चुनाव” मॉडल। इसके लिए संशोधित संवैधानिक प्रावधानों के तहत कई धाराओं में बदलाव प्रस्तावित हैं — जैसे कि अनुच्छेद 83, 172 और 327 में संशोधन सहित नई धारा 82A का समावेश।

हालाँकि इस प्रस्ताव ने विपक्ष, संवैधानिक विशेषज्ञ तथा राज्यों की इकाइयों में गहरी चिंताएँ उत्पन्न की हैं। उनके मुताबिक यह मॉडल संघ-राज्य संबंधों, राज्यों की स्वायत्तता, लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा तथा निर्वाचन-प्रक्रिया की समावेशी प्रकृति पर असर डाल सकता है।

ऐसे में इस विवाद के बीच अब यह जानकारी प्रकाश में आई है कि देश के एक लॉ पैनल — अर्थात् Law Commission of India — ने “मूल संरचना को नहीं बदलते” की स्थिति अपनाई है। पैनल की राय के अनुसार, “एक देश-एक चुनाव” प्रस्तावित विधेयक चुनाव-चक्र, समय-सीमा तथा समन्वय के संबंध में बदलाव कर रहा है, न कि संविधान निर्माताओं द्वारा निर्मित संघात्मक, लोकतांत्रिक एवं संस्थागत ढाँचे को बदलने का कार्य।

विश्लेषण करें तो, पैनल ने देखा है कि प्रस्तावित बिल से मतदाता-अधिकार (voting right) समाप्त नहीं होता, राज्यों की विधानसभाओं को चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर नहीं रखा जा रहा, बल्कि उन-की कार्यावधि व चुनाव तिथि समायोजित की जा रही है। इस दृष्टि से पैनल का निष्कर्ष है कि यह “मूलसंरचना पर हमला नहीं” बल्कि “चुनावी पुनर्संयोजन” है।

परंतु यह बात पूरी तरह निर्विवाद नहीं है — विपक्ष तथा कुछ संवैधानिक विद्वानों ने कहा है कि यदि राज्यों की कार्यावधि बदल दी जाए, चुनाव-तिथि समायोजित हो जाए, और केंद्र अथवा निर्वाचन आयोग को अधिक शक्तियाँ मिल जाएँ, तो उस स्थिति में संवैधानिक संतुलन पर दबाव आ सकता है।

अभी स्थिति यह है कि यह विधेयक संसद में विचाराधीन है, और राज्य-स्वीकृति (ratification) तथा राजनीतिक सहमति का प्रश्न बना हुआ है। भावी कार्यवाही में यह देखना होगा कि किन राज्यों के विधानसभाएँ इस प्रस्ताव को स्वीकारती हैं, तथा अदालतों में इस मुद्दे पर किसी चुनौती के संभावना कितनी है।

सम्पूर्ण रूप से देखा जाए तो, “एक देश-एक चुनाव” की दिशा में यह कदम प्रशासनिक रूप से सहजता लाने, चुनाव-संबंधी समय एवं लागत बचाने तथा राज्य-केंद्रीय समन्वय बढ़ाने का प्रयत्न है। लेकिन इसके साथ ही यह आवश्यक होगा कि लोकतंत्र की विविधता, संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता व राज्यों की भूमिका सुरक्षित रहे — तभी इस बदलाव को स्थिर एवं सबके स्वीकार द्वारा लागू किया जा सकेगा।

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