महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 29 नवंबर 2025
प्राकृतिक ढाल टूटी—सरकारी फैसले ने अरावली को खतरे में डाला
दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली अरावली पर्वतमाला भारत के प्राकृतिक भूगोल की सबसे पुरानी और सबसे संवेदनशील शृंखला मानी जाती है। सदियों से यह पर्वत-शृंखला न केवल उत्तरी भारत को रेगिस्तानी विस्तार से बचाती रही है, बल्कि धूल और रेत के पूर्वी प्रवाह को रोककर दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता को संतुलित रखने में एक महत्वपूर्ण ‘प्राकृतिक ढाल’ के रूप में काम करती रही है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में अवैध खनन, अनियंत्रित निर्माण, और नियमों की खुलेआम अवहेलना ने अरावली को लगभग बर्बाद कर दिया है। अब, भारतीय पर्यावरण शासन की दिशा को लेकर पहले से ही उठ रहे सवालों के बीच, अरावली शृंखला को एक और गंभीर चोट पहुंचाने वाला फैसला सामने आया है—एक ऐसा फैसला, जो केवल पर्यावरणीय आपदा ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हवा को और विषैला बनाने वाली बड़ी भूल भी साबित हो सकता है।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पर्यावरण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अरावली हिल्स की एक नई परिभाषा सुझाई है। इस परिभाषा के तहत अब केवल वही भूमि अरावली मानी जाएगी जिसकी ऊंचाई अपने आसपास के भूभाग से 100 मीटर या अधिक हो। यह सुनने में तकनीकी लगे, पर इसके प्रभाव बेहद विनाशकारी हैं—इसका अर्थ है कि अरावली की 90% पहाड़ियां, जो अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाली हैं लेकिन पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, अब ‘अरावली’ की श्रेणी से बाहर हो जाएंगी। वन सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (FSI) ने सरकार को पहले ही चेतावनी दी थी कि कम ऊंचाई वाली अरावली भी रेतीले तूफानों और धूल के पूर्वी प्रवाह को रोकने के लिए अनिवार्य है। लेकिन मंत्रालय ने इस वैज्ञानिक सलाह को दरकिनार कर दिया, और सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे स्वीकृति दे दी। इस तरह का निर्णय न केवल पर्यावरणीय समझ का अभाव दर्शाता है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया में वैज्ञानिक तथ्यों की अवहेलना को भी उजागर करता है।
इस नई परिभाषा का सबसे भयावह परिणाम यह है कि अरावली के संरक्षित क्षेत्र को लगभग मिटा दिया जाएगा, जिससे खनन, रियल एस्टेट और निर्माण गतिविधियों के लिए रास्ता खुल जाएगा। राजस्थान के चित्तौड़गढ़, कोटा, बूंदी, और सवाई माधोपुर जैसे जिलों की अनेक पर्वत-श्रृंखलाएं—जिन पर वर्षों से अरावली के संरक्षण का नियम लागू था—अब इस परिभाषा के अनुसार अरावली नहीं मानी जाएंगी। इससे अवैध और कानूनी दोनों तरह की खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। वन आवरण घटेगा, मिट्टी का क्षरण बढ़ेगा, और अंततः दिल्ली-एनसीआर की हवा में धूल और PM2.5 जैसे प्रदूषक और अधिक बढ़ेंगे। यही कारण है कि FSI ने मंत्रालय को लिखित में चेताया था कि 100 मीटर की तय ऊंचाई एक वैज्ञानिक मानक नहीं है—यह केवल एक मनमाना प्रशासनिक निर्णय है जो वास्तविक भूगोल और पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में नहीं रखता।
इस फैसले से एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ऐसा ‘प्रावधान’ दिया है जो वास्तव में संरक्षण की जगह विनाश को वैधता देगा? सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में सरकार से अरावली की एक समान परिभाषा मांगी थी, ताकि खनन माफिया की मनमानी पर रोक लगाई जा सके। लेकिन मंत्रालय ने इस मांग को एक ऐसे तकनीकी सूत्र में बदल दिया, जो असल समस्या का समाधान करने के बजाय उल्टा अरावली को ही नक्शे से मिटाने जैसा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अरावली की यह नई परिभाषा लागू होती है तो आने वाले वर्षों में उत्तर-पश्चिम भारत का रेगिस्तानीकरण तेज़ हो सकता है। राजस्थान से आने वाली धूल, जिसने हर सर्दी में दिल्ली की हवा को जहरीला बनाना शुरू कर दिया है, उसे रोकने वाली प्राकृतिक बाधा लगभग नष्ट हो जाएगी।
पर्यावरणविदों और FSI के पूर्व अफसरों ने भी इस निर्णय पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अरावली की ऊंचाई को एक निर्धारित संख्या से नापना वैज्ञानिक रूप से गलत है, क्योंकि पहाड़ की वास्तविक ऊंचाई आसपास के सतह के औसत से मापी जाती है, न कि समुद्र तल से। मंत्रालय के प्रस्तुत आंकड़े इस वैज्ञानिक सिद्धांत को नज़रअंदाज़ करते हैं और इस तरह तकनीकी भाषा में एक ऐसी व्याख्या पेश करते हैं जो वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत है। पूर्व FSI निदेशक अनुप सिंह ने कहा कि “अरावली की रक्षा के लिए जो दिशा-निर्देश वर्षों की मेहनत से बने थे, उन्हें इस नई व्याख्या से खत्म कर दिया जाएगा।” यह वक्तव्य इस बात का प्रमाण है कि सरकारी तंत्र में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों की आवाज़ को कितनी महत्वहीनता से देखा जा रहा है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह फैसला तब आ रहा है जब दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण के कारण ‘गैस चेंबर’ बन चुका है, और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक यह स्वीकार कर चुके हैं कि प्रदूषण में सुबह की सैर से उनकी तबियत बिगड़ गई। ऐसे समय में सरकार की प्राथमिकता प्रदूषण रोकने के लिए प्राकृतिक ढालों को मजबूत करने की होनी चाहिए थी। लेकिन स्थिति ठीक उलट है—जहां प्रदूषण हर साल असहनीय होता जा रहा है, वहीं सरकार उन पहाड़ियों को ही हटाने में लगी है, जो प्रदूषण को रोकने का काम करती हैं। यही कारण है कि कई पर्यावरण विशेषज्ञ कह रहे हैं—“द रोड टू हेल इज पाव्ड विद गुड इंटेंशन्स”—यानी ‘नियत चाहे जो हो, नतीजा विनाशकारी होगा।’
यह पूरा प्रकरण इस बात का सटीक उदाहरण है कि गलत नीतिगत फैसले किस तरह एक पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी, उसकी हवा, उसके पानी और उसके लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। और यह केवल पर्यावरण की खबर नहीं—यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और भविष्य की पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा है।




