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जामिया के रजिस्ट्रार की कुर्सी पर बड़ा संकट? मज़हर आसिफ के खास महताब आलम रिजवी के खिलाफ पुलिस में गंभीर शिकायतें—क्या वीसी पर भी गिरेगी गाज?

UGC पात्रता से लेकर अनुभव और CV तक पर गंभीर सवाल; शिकायतकर्ता ने Associate Professor नियुक्ति, Professor पदोन्नति और Registrar बनने की पूरी प्रक्रिया की आपराधिक जांच की मांग

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 अगस्त 2026

रजिस्ट्रार की कुर्सी तक पहुंचा विवाद, पुलिस शिकायत ने बढ़ाई हलचल

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के Registrar प्रो. एम.डी. महताब आलम रिजवी की नियुक्ति और उनके पूरे शैक्षणिक-प्रशासनिक करियर पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 17 जुलाई 2026 को दिल्ली के Jamia Nagar Police Station के SHO को दी गई विस्तृत शिकायत में रिजवी के खिलाफ FIR दर्ज कर आपराधिक जांच शुरू करने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता भूपेंद्र पाल सिंह चमार, जिन्होंने खुद को World Dalit Council के International President और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के alumnus के रूप में पेश किया है, ने आरोप लगाया है कि रिजवी की Associate Professor के रूप में नियुक्ति, Professor के रूप में पदोन्नति और बाद में Registrar पद पर नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं की आशंका है। शिकायत में कथित तौर पर महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने, गलत जानकारी प्रस्तुत करने, रिकॉर्ड में हेरफेर, फर्जी या गलत दस्तावेजों के इस्तेमाल, आपराधिक साजिश और आधिकारिक पद के दुरुपयोग जैसे आरोपों की जांच मांगी गई है। ये फिलहाल शिकायत में लगाए गए आरोप हैं, जो अभी किसी न्यायिक या पुलिस जांच में सिद्ध नहीं हुए हैं।

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सवाल सिर्फ Registrar की कुर्सी का नहीं, पूरी नियुक्ति श्रृंखला का है

शिकायत का सबसे गंभीर पहलू यह है कि शिकायतकर्ता ने केवल वर्तमान Registrar पद की नियुक्ति पर सवाल नहीं उठाया। उन्होंने रिजवी की Associate Professor नियुक्ति से शुरू होकर Professor पदोन्नति और फिर Registrar पद तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है। तर्क साफ है—अगर शुरुआती नियुक्ति के समय पात्रता या अनुभव को लेकर कोई महत्वपूर्ण तथ्य गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था, तो उस नियुक्ति के आधार पर मिली बाद की पदोन्नतियों और जिम्मेदारियों की भी समीक्षा जरूरी हो सकती है। इसीलिए शिकायत में Screening Committee, Selection Committee, Executive Council और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े अन्य अधिकारियों की भूमिका की भी जांच मांगी गई है। अगर पुलिस आगे बढ़ती है तो जांच का दायरा सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित रहने के बजाय उस पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया तक फैल सकता है जिसने एक उम्मीदवार को Associate Professor से Professor और फिर Registrar तक पहुंचाया।

UGC पात्रता पर सबसे बड़ा सवाल—क्या अनुभव वास्तव में नियमों के मुताबिक मान्य था?

शिकायत में सबसे ज्यादा जोर UGC की पात्रता शर्तों और आवश्यक teaching/research experience पर है। विवाद यह नहीं कि रिजवी ने अपने करियर में कहीं काम किया था या नहीं। असली सवाल यह है कि जो अनुभव उन्होंने Associate Professor पद के लिए प्रस्तुत किया, क्या वह उस समय लागू UGC नियमों के तहत निर्धारित अनुभव की श्रेणी में आता था? किसी संस्थान में research करना, किसी सरकारी या स्वायत्त संस्था में काम करना या किसी विश्वविद्यालय से जुड़ा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह अनुभव किसी विशेष शैक्षणिक पद की पात्रता के लिए स्वतः स्वीकार्य है। पद की प्रकृति, नियुक्ति की शर्तें, वास्तविक कार्य, सेवा अवधि और उस समय लागू UGC नियमों का मिलान करना जरूरी होगा। शिकायतकर्ता ने मूल दस्तावेजों की जांच और संबंधित संस्थानों से स्वतंत्र सत्यापन की मांग की है।

MP-IDSA का अनुभव क्यों बना सबसे अहम सवाल?

शिकायत में Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses (MP-IDSA) में रिजवी के कथित अनुभव को जांच के केंद्र में रखा गया है। सवाल यह है कि रिजवी वहां किस पद पर नियुक्त थे, उनका वास्तविक काम क्या था, जिम्मेदारियां teaching से संबंधित थीं या research से, नियुक्ति और सेवा की वास्तविक अवधि क्या थी और क्या उस अनुभव को Associate Professor की पात्रता के लिए UGC नियमों के तहत गिना जा सकता था। अगर पुलिस जांच करती है तो appointment order, designation, job description, service record, relieving documents और संबंधित संस्थान के प्रमाणपत्रों की तुलना इस विवाद की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है। किसी पद का नाम और उस पद पर किया गया वास्तविक कार्य—दोनों हमेशा एक ही चीज नहीं होते।

RTI से मिले दस्तावेजों के आधार पर उठाए गए सवाल

शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि उसके आरोप RTI के जरिए प्राप्त दस्तावेजों, आधिकारिक रिकॉर्ड और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री पर आधारित हैं। शिकायत में MP-IDSA और अन्य संस्थानों से संबंधित जानकारी का उल्लेख है और यह सवाल उठाया गया है कि रिजवी की कथित सेवा अवधि तथा जिम्मेदारियां उस अनुभव से कितनी मेल खाती हैं जिसे बाद में शैक्षणिक नियुक्ति में इस्तेमाल किया गया। अगर ये दस्तावेज वास्तव में आधिकारिक रिकॉर्ड से प्राप्त हुए हैं, तो उनका महत्व इस बात में होगा कि उन्हें रिजवी की मूल नियुक्ति फाइल और उस समय जमा किए गए दस्तावेजों से मिलाया जाए।

इथियोपिया के अनुभव पर भी उठी जांच की मांग

शिकायत में State Civil Services University, Ethiopia से जुड़े रिजवी के कथित अनुभव को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रोजगार की अवधि, सेवा की निरंतरता और अनुभव की प्रकृति को सत्यापित करने की मांग की गई है। मुख्य सवाल यह है कि अगर इस अनुभव को Associate Professor की पात्रता के लिए गिना गया था, तो क्या वह उस समय लागू UGC नियमों के तहत स्वीकार्य था। इसका जवाब केवल आरोप या बचाव से नहीं निकलेगा। संबंधित विश्वविद्यालय के मूल रिकॉर्ड, नियुक्ति पत्र, सेवा प्रमाणपत्र, कार्य की प्रकृति और उस समय लागू UGC नियमों का तुलनात्मक परीक्षण जरूरी होगा।

CV के अलग-अलग संस्करणों ने विवाद को और गहरा किया

शिकायत में जामिया की वेबसाइट पर उपलब्ध रिजवी के अलग-अलग Curriculum Vitae में कथित असंगतियों का उल्लेख है। शिकायतकर्ता का दावा है कि अलग-अलग संस्करणों में qualifications, experience और service particulars को लेकर अंतर दिखाई देता है। अगर किसी व्यक्ति के CV के विभिन्न आधिकारिक संस्करणों में महत्वपूर्ण तथ्य अलग-अलग दिखाई देते हैं, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि बदलाव किस कारण से हुआ—सामान्य प्रशासनिक अपडेट, पुराने विवरण में सुधार, वेबसाइट पर रिकॉर्ड अपडेट या कोई महत्वपूर्ण qualification/experience अलग तरीके से प्रस्तुत किया गया। इन सवालों का जवाब केवल वर्तमान CV देखकर नहीं दिया जा सकता। पुराने डिजिटल रिकॉर्ड, archived pages और मूल नियुक्ति दस्तावेजों की जरूरत होगी।

‘Suppression’ और ‘Misrepresentation’ के आरोप कितने गंभीर हैं?

शिकायत में suppression of material facts और misrepresentation जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। इसका मतलब है कि शिकायतकर्ता केवल तकनीकी पात्रता विवाद की बात नहीं कर रहा, बल्कि यह आरोप लगा रहा है कि अगर कोई महत्वपूर्ण जानकारी जानबूझकर छिपाई या गलत तरीके से प्रस्तुत की गई, तो मामला सामान्य service dispute से आगे जाकर आपराधिक जांच का विषय बन सकता है। लेकिन किसी शिकायत में ऐसे शब्द लिखे जाने मात्र से यह सिद्ध नहीं होता कि जानबूझकर तथ्य छिपाए गए थे। पुलिस को मूल रिकॉर्ड, दस्तावेजों की तारीख, उनके स्रोत और संबंधित अधिकारियों के बयान की जांच करनी होगी।

2017 की Associate Professor नियुक्ति पर भी उठे सवाल

शिकायत में जामिया के Executive Council के रिकॉर्ड का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि 2017 में Nelson Mandela Centre for Peace and Conflict Resolution में Associate Professor पद के लिए रिजवी के चयन को मंजूरी दी गई थी। सवाल यह है कि उस समय उनकी पात्रता किस आधार पर तय हुई, Selection Committee के सामने कौन-कौन से दस्तावेज रखे गए और उन दस्तावेजों का सत्यापन किस तरह किया गया। यही नियुक्ति पूरी शिकायत में महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आती है। अगर शुरुआती नियुक्ति की पात्रता पर ही कोई गंभीर कानूनी सवाल खड़ा होता है तो बाद की पदोन्नति और नियुक्तियों की समीक्षा की मांग स्वाभाविक रूप से उठ सकती है।

Professor पदोन्नति भी अब सवालों के घेरे में

Associate Professor नियुक्ति के बाद रिजवी को Career Advancement Scheme के तहत Professor पद पर पदोन्नत किया गया। शिकायतकर्ता ने इस पदोन्नति को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की है। तर्क यह है कि अगर शुरुआती नियुक्ति की बुनियादी पात्रता में गंभीर गड़बड़ी साबित होती है, तो उसके आधार पर हुई बाद की पदोन्नति की वैधता की भी समीक्षा होनी चाहिए। जांच में यह देखना होगा कि Professor पदोन्नति के समय कौन-से नियम लागू थे, कौन-से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए, मूल्यांकन किस आधार पर हुआ और संबंधित समिति ने किस प्रक्रिया का पालन किया।

Registrar की कुर्सी तक पहुंचते-पहुंचते मामला और संवेदनशील हो गया

विवाद की गंभीरता इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि रिजवी अब जामिया मिल्लिया इस्लामिया के Registrar हैं। Registrar का पद केवल प्रशासनिक designation नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय के statutory और प्रशासनिक ढांचे में बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से जुड़ा हुआ पद है। भर्ती और पदोन्नति, प्रशासनिक रिकॉर्ड, विभिन्न परिषदों की कार्यवाही, सेवा संबंधी मामले, आधिकारिक दस्तावेज और अनेक वैधानिक प्रक्रियाएं Registrar’s Office से जुड़ी होती हैं। ऐसे में अगर किसी वर्तमान Registrar की पिछली नियुक्तियों, पात्रता और पदोन्नति पर विस्तृत पुलिस शिकायत सामने आती है तो विश्वविद्यालय की प्रशासनिक पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही पर भी सवाल उठते हैं।

मजहर आसिफ का नाम क्यों चर्चा में आया? सवालिया निशान बना हुआ है

इस पूरे मामले में सबसे संवेदनशील सवाल है—क्या वीसी पर भी गिरेगी गाज? मौजूदा प्रशासनिक ढांचे में प्रो. मजहर आसिफ Vice-Chancellor और प्रो. एम.डी. महताब आलम रिजवी Registrar हैं। दोनों के बीच वर्षों से काफी दोस्ताना संबंध बताए जाते हैं। जामिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक और नियुक्ति संबंधी फैसलों में दोनों की साझा भूमिका और आपसी तालमेल की चर्चा लंबे समय से होती रही है। शिकायत में लगाए गए आरोपों की पृष्ठभूमि में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि अगर रिजवी की नियुक्ति श्रृंखला में कोई गंभीर अनियमितता सामने आती है, तो क्या उस प्रक्रिया में वीसी की भूमिका भी जांच का विषय बन सकती है?

अभी किसी आरोप को सिद्ध नहीं माना जा सकता। लेकिन अगर भविष्य की जांच में यह सामने आता है कि किसी नियुक्ति या निर्णय में वीसी की व्यक्तिगत भूमिका थी, उन्होंने किसी दस्तावेज को मंजूरी दी, किसी प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया या उन्हें किसी अनियमितता की जानकारी थी, तो उनकी भूमिका भी कानूनी रूप से जांच का विषय बन सकती है। इसलिए फिलहाल “वीसी पर गाज” को एक खुला सवाल ही माना जाना चाहिए—खासकर तब जब रजिस्ट्रार और वीसी के बीच लंबे समय से घनिष्ठ संबंध और साझा निर्णय-प्रक्रिया की बातें कही जाती रही हैं।

शिकायत में चयन समितियों और अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में

शिकायतकर्ता ने केवल रिजवी के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं की है। शिकायत में Screening Committee, Selection Committee, Executive Council और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच मांगी गई है। सवाल यह है कि उम्मीदवार की पात्रता और अनुभव की जांच किस स्तर पर हुई? क्या दस्तावेजों का स्वतंत्र सत्यापन किया गया? क्या समितियों के सामने पूरी जानकारी थी? अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक था तो शिकायत में उठाए गए सवालों का जवाब रिकॉर्ड से दिया जा सकता है। लेकिन अगर किसी अधिकारी को कथित विसंगतियों की जानकारी थी और फिर भी प्रक्रिया आगे बढ़ी, तो जिम्मेदारी का प्रश्न अलग रूप ले सकता है।

56 पन्नों के Annexures—शिकायत सिर्फ आरोप नहीं, दस्तावेजों पर भी टिकी होने का दावा

पुलिस को दी गई शिकायत के अंतिम हिस्से में Annexures के कुल 56 पृष्ठ होने का उल्लेख है। शिकायत में original application forms, experience certificates, official correspondence, digital records, website archives, Selection Committee proceedings, Executive Council proceedings, service books और electronic communications जैसे रिकॉर्डों को जांच के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। अगर ये सभी दस्तावेज वास्तव में संलग्न हैं, तो अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही होगा कि इन दस्तावेजों का मूल रिकॉर्ड से मिलान किया जाए।

रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की आशंका—जांच में डिजिटल फॉरेंसिक भी अहम हो सकता है

शिकायतकर्ता ने भर्ती प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग भी की है। शिकायत में यह आशंका जताई गई है कि रिकॉर्ड में बदलाव, deletion या tampering होने पर जांच प्रभावित हो सकती है। अगर जांच आगे बढ़ती है तो पुराने CV versions, website archives, email correspondence और अन्य electronic records का forensic verification यह पता लगाने में मदद कर सकता है कि किसी दस्तावेज में वास्तव में बदलाव हुआ था या नहीं।

FIR की मांग—लेकिन अभी FIR होना बाकी है

शिकायतकर्ता ने Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के तहत लागू प्रावधानों में FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने की मांग की है। शिकायत में cheating, forgery, forged documents, falsification of records, criminal conspiracy और अन्य संभावित अपराधों का उल्लेख है। लेकिन पुलिस में शिकायत दर्ज होना और FIR दर्ज होना एक ही बात नहीं है, और FIR दर्ज होना भी अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं है।

अब गेंद Jamia Nagar Police Station के पाले में

17 जुलाई को दी गई शिकायत के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि Jamia Nagar Police Station आगे क्या कदम उठाता है। क्या पुलिस शिकायत की जांच करेगी? क्या FIR दर्ज होगी? क्या जामिया से मूल नियुक्ति फाइलें मांगी जाएंगी? क्या MP-IDSA और Ethiopia के अनुभवों का स्वतंत्र सत्यापन कराया जाएगा? क्या अलग-अलग CV versions की forensic तुलना होगी? और क्या नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों—तथा संभवतः उच्च प्रशासनिक स्तर—से पूछताछ की जाएगी? इन सभी सवालों का जवाब पुलिस की अगली कार्रवाई से ही मिलेगा।

अगर आरोप सही निकले तो मामला बहुत दूर तक जा सकता है

अगर स्वतंत्र जांच में यह साबित होता है कि किसी उम्मीदवार ने जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए, गलत जानकारी दी या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया, तो मामला गंभीर आपराधिक रूप ले सकता है। लेकिन अगर जांच में यह सामने आता है कि सभी दस्तावेज वास्तविक थे, अनुभव नियमों के तहत स्वीकार्य था और CV में अंतर सामान्य प्रशासनिक कारणों से हुआ, तो शिकायत में लगाए गए कई आरोप कमजोर पड़ सकते हैं। इसलिए इस समय सबसे जरूरी चीज है—मूल रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच।

और अगर अधिकारियों की भूमिका सामने आई तो?

अगर जांच में यह सामने आता है कि नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल किसी अधिकारी ने जानबूझकर गलत जानकारी को नजरअंदाज किया या कथित रूप से नियमों को दरकिनार करते हुए प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, तो मामला केवल रिजवी तक सीमित नहीं रहेगा। शिकायत में पहले से ही उन अधिकारियों और समितियों की भूमिका की जांच की मांग की गई है जिन्होंने नियुक्ति, पदोन्नति या अनुमोदन की प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। ऐसे में जांच का केंद्र व्यक्ति से बढ़कर पूरे निर्णय-तंत्र पर जा सकता है—खासकर तब जब रजिस्ट्रार और वीसी के बीच लंबे समय से घनिष्ठ संबंध और साझा फैसले लेने की व्यवस्था की बातें कही जाती रही हैं।

जामिया की साख भी दांव पर

यह विवाद केवल महताब आलम रिजवी की व्यक्तिगत नियुक्ति का सवाल नहीं है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है और ऐसे संस्थान में वरिष्ठ शैक्षणिक तथा प्रशासनिक पदों की नियुक्ति की पारदर्शिता सीधे संस्थान की विश्वसनीयता से जुड़ती है। अगर आरोप गलत हैं तो विश्वविद्यालय और संबंधित अधिकारी दस्तावेजों के जरिए उन्हें खारिज कर सकते हैं। लेकिन अगर आरोपों में तथ्य निकलते हैं तो कार्रवाई केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; नियुक्ति प्रक्रिया में मौजूद कमियों और जिम्मेदार अधिकारियों—तथा उच्च प्रशासनिक स्तर—की भूमिका की भी समीक्षा जरूरी होगी।

अब असली लड़ाई बयानबाजी की नहीं, दस्तावेजों की होगी

इस पूरे मामले में सबसे निर्णायक भूमिका मूल नियुक्ति फाइल की होगी। Associate Professor पद के लिए दिया गया आवेदन, उस समय का CV, qualification certificates, experience certificates, Selection Committee की कार्यवाही, Executive Council के minutes, Professor पदोन्नति की फाइल और Registrar नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज—इन सभी को एक साथ रखकर देखा जाना होगा। अगर रिकॉर्ड आपस में मेल खाते हैं तो शिकायत के कई आरोपों का आधार कमजोर हो सकता है। लेकिन अगर मूल दस्तावेजों और बाद में प्रस्तुत विवरणों में गंभीर और जानबूझकर किए गए अंतर सामने आते हैं, तो मामला कहीं अधिक गंभीर हो सकता है।

मजहर आसिफ पर कार्रवाई का सवाल—अभी भविष्य की जांच पर निर्भर, लेकिन सवाल बना हुआ है

जहां तक Vice-Chancellor मजहर आसिफ की भूमिका का सवाल है, फिलहाल उपलब्ध शिकायत के आधार पर उनके खिलाफ किसी अपराध या षड्यंत्र का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों के वर्षों से दोस्ताना संबंध और जामिया से जुड़े सारे महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी साझा भूमिका की चर्चा को देखते हुए, अगर किसी जांच में यह सामने आता है कि उनके स्तर पर किसी नियुक्ति या प्रशासनिक निर्णय में ऐसी भूमिका थी जो कानून या विश्वविद्यालय के नियमों के उल्लंघन से जुड़ती है, तब उनकी भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। फिलहाल इसे एक खुला और महत्वपूर्ण सवाल ही माना जाना चाहिए।

रिजवी की कुर्सी बचेगी या दस्तावेज खोलेंगे पूरा राज?

अब इस पूरे मामले की सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के पीछे कितनी ठोस दस्तावेजी ताकत है। फिलहाल एक विस्तृत पुलिस शिकायत मौजूद है, उसमें गंभीर आरोप हैं, 56 पन्नों के Annexures का उल्लेख है और नियुक्ति की पूरी श्रृंखला की जांच की मांग की गई है। लेकिन अभी न FIR को अंतिम रूप मिला है, न पुलिस जांच का निष्कर्ष सामने आया है और न ही आरोप अदालत में सिद्ध हुए हैं।

इसलिए इस समय सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि रिजवी दोषी हैं या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होगी—और उस जांच में उच्च प्रशासनिक स्तर तक की भूमिका भी कितनी गहराई से देखी जाएगी?

अंतिम सवाल—क्या जामिया जवाब देगा या पुलिस खोलेगी नियुक्ति की पूरी फाइल?

महताब आलम रिजवी के खिलाफ दी गई शिकायत ने जामिया के प्रशासन के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। Associate Professor की नियुक्ति से लेकर Professor पदोन्नति और फिर Registrar की कुर्सी तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया अब शिकायतकर्ता की मांग के मुताबिक जांच के दायरे में लाने की मांग की जा रही है। UGC पात्रता, MP-IDSA का अनुभव, Ethiopia का अनुभव, CV में कथित अंतर, चयन समितियों की भूमिका और आधिकारिक रिकॉर्ड—शिकायत में एक-एक कड़ी पर सवाल उठाए गए हैं।

अब फैसला आरोप नहीं, दस्तावेज करेंगे।

अगर दस्तावेज शिकायत को गलत साबित करते हैं तो विवाद वहीं कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन अगर दस्तावेजों की जांच में गंभीर विसंगतियां, जानबूझकर गलत जानकारी या आपराधिक कृत्य के प्रमाण सामने आते हैं, तो मामला केवल Registrar की कुर्सी तक सीमित नहीं रहेगा। तब सवाल होगा—जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति की थी या उस पूरी व्यवस्था की, जिसमें रजिस्ट्रार और वीसी मिलकर जामिया से जुड़े सारे फैसले लेते आए हैं?

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