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मिड-डे मील में ‘छिपकली’ का ज़हर! बिहार के मधेपुरा में 70 से ज़्यादा बच्चे बीमार, सिस्टम फेल होने का आरोप

एबीसी नेशनल न्यूज | मधेपुरा | 8 फरवरी 2026

बिहार के मधेपुरा ज़िले से सामने आई घटना ने एक बार फिर मिड-डे मील योजना और सरकारी व्यवस्था की बदहाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी स्कूल में परोसे गए मिड-डे मील के खाने में छिपकली गिरने की वजह से 70 से ज़्यादा बच्चे बीमार पड़ गए। बच्चों को उल्टी, पेट दर्द और चक्कर आने की शिकायत के बाद आनन-फानन में स्थानीय अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जहां कई बच्चों की हालत को लेकर देर तक चिंता बनी रही।

स्थानीय प्रशासन के अनुसार यह मामला मधेपुरा ज़िले के एक सरकारी विद्यालय का है, जहां रोज़ की तरह बच्चों को मिड-डे मील परोसा गया था। खाना खाते ही बच्चों की तबीयत बिगड़ने लगी। बाद में भोजन के बर्तन से छिपकली मिलने की बात सामने आई, जिसके बाद पूरे इलाके में हड़कंप मच गया। अभिभावकों में गुस्सा है और स्कूल प्रशासन पर भारी लापरवाही के आरोप लगाए जा रहे हैं।

मिड-डे मील व्यवस्था पर सवाल, शिक्षा विभाग में हड़कंप

घटना के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है। अधिकारियों ने जांच के आदेश देने की बात कही है, लेकिन सवाल यह है कि जब तक बच्चे बीमार नहीं पड़ते, तब तक कार्रवाई क्यों नहीं होती? मिड-डे मील जैसी योजना, जो गरीब और वंचित बच्चों के पोषण के लिए चलाई जाती है, अगर वही ज़हर बन जाए तो यह सीधे तौर पर शासन और प्रशासन की नाकामी को उजागर करता है।

कांग्रेस का हमला: BJP सरकार में हर स्तर पर सिस्टम फेल

इस घटना को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि BJP सरकार में हर लेवल पर सिस्टम फेल हो चुका है, जिसका खामियाजा आम जनता और मासूम बच्चे भुगत रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यही “सुशासन” है, जहां बच्चों को सुरक्षित और साफ़ खाना तक मुहैया नहीं कराया जा सकता?

नीतीश–मोदी से सीधा सवाल: क्या खुद ऐसा खाना खाएंगे?

घटना के बाद एक सीधा और कड़ा सवाल उठ रहा है— क्या Nitish Kumar और Narendra Modi खुद ऐसा खाना खाएंगे, जो सरकारी स्कूलों में बच्चों को परोसा जा रहा है? अगर नहीं, तो फिर देश और राज्य के सबसे कमजोर वर्ग—स्कूल के बच्चों—को ऐसी लापरवाह व्यवस्था के भरोसे क्यों छोड़ा गया है?

जांच के आश्वासन, लेकिन भरोसा टूटा

हालांकि प्रशासन ने मामले की जांच और दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया है, लेकिन अभिभावकों और स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। हर बार जांच की बात होती है, कुछ दिन शोर मचता है और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।

मधेपुरा की यह घटना सिर्फ़ एक स्कूल या एक ज़िले की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम पर एक बड़ा सवाल है—क्या बच्चों की ज़िंदगी इतनी सस्ती है कि उन्हें जहरीला खाना परोसकर भी जवाबदेही तय नहीं की जाती?

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