राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | श्रीनगर | 13 अगस्त 2026
1990 के हत्याकांड पर 36 साल बाद फिर शिकंजा
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के सबसे भयावह दौर से जुड़े एक पुराने कश्मीरी पंडित हत्याकांड की फाइल एक बार फिर खुल गई है। जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्पेशल सेल ने बुधवार, 12 अगस्त 2026 को 1990 में कश्मीरी पंडित लेखक सरवानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल की हत्या से जुड़े मामले की दोबारा जांच शुरू करते हुए कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया। अधिकारियों के मुताबिक दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के डोरू इलाके में कई ठिकानों पर छापेमारी की गई। यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब स्वतंत्रता दिवस से पहले जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई है और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को लेकर कथित आतंकी धमकियों की भी खबरें सामने आई हैं। करीब साढ़े तीन दशक पुराने इस मामले को दोबारा जांच के घेरे में लाना इस बात का संकेत है कि सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद के दौर में हुए पुराने गंभीर अपराधों की कड़ियां फिर से खंगालने की कोशिश कर रही हैं।
लेखक सरवानंद कौल प्रेमी और बेटे की बेरहमी से हत्या
इस मामले के केंद्र में कश्मीरी पंडित लेखक सरवानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे वीरेंद्र कौल की हत्या है। उपलब्ध FIR के अनुसार दोनों के शव 1990 में अनंतनाग के कोकरनाग इलाके में एक पेड़ से लटके हुए पाए गए थे। यह घटना उस दौर की भयावह तस्वीर पेश करती है जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और लक्षित हिंसा ने आम नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के भीतर गहरा भय पैदा कर दिया था। प्रेमी एक लेखक के रूप में भी जाने जाते थे और उनके साथ उनके बेटे की हत्या ने इस घटना को और भी गंभीर बना दिया था। अब इतने वर्षों बाद पुलिस द्वारा मामले की पुनः जांच शुरू किए जाने से यह उम्मीद जगी है कि पुराने रिकॉर्ड, संदिग्धों और घटना से जुड़े अन्य पहलुओं की नए सिरे से पड़ताल की जा सकती है।
कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी, आतंक संदिग्ध निशाने पर
जम्मू-कश्मीर पुलिस की विशेष इकाई ने केवल पुराने हत्याकांड की फाइल नहीं खोली, बल्कि आतंकवाद से जुड़े संदिग्धों के ठिकानों पर भी तलाशी अभियान चलाया। अधिकारियों के अनुसार दक्षिण कश्मीर के डोरू क्षेत्र में कई स्थानों पर सुरक्षा एजेंसियों ने पहुंचकर तलाशी ली। इन कार्रवाइयों का व्यापक संदर्भ स्वतंत्रता दिवस से पहले जम्मू-कश्मीर में बढ़ाई गई सुरक्षा और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े संभावित खतरों से भी जुड़ा है। सुरक्षा एजेंसियां किसी भी संभावित आतंकी नेटवर्क, पुराने संपर्कों और संदिग्ध गतिविधियों को लेकर सतर्क हैं। ऐसे माहौल में पुराने हत्याकांड की जांच को फिर सक्रिय करना सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नजरिए से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
पुरानी फाइल, लेकिन जांच का फोकस नया हो सकता है
करीब 36 वर्ष पुराने मामले की पुनः जांच अपने आप में आसान काम नहीं होगा। इतने लंबे समय के बाद घटनास्थल से जुड़े भौतिक साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों की उपलब्धता और उस समय के दस्तावेजों की स्थिति जांच की दिशा को प्रभावित कर सकती है। लेकिन दूसरी ओर पुलिस के पास पुराने FIR रिकॉर्ड, केस डायरी, बयान, खुफिया सूचनाएं और उस समय की जांच से जुड़े दस्तावेज हो सकते हैं। आधुनिक जांच तकनीकों और पुराने रिकॉर्ड को एक साथ जोड़कर पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि उस हत्याकांड के पीछे कौन लोग थे, हत्या की परिस्थितियां क्या थीं और क्या घटना से जुड़े किसी संदिग्ध या नेटवर्क के बारे में बाद में कोई नई जानकारी सामने आई।
स्वतंत्रता दिवस से पहले कार्रवाई ने बढ़ाई अहमियत
यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब जम्मू-कश्मीर में 15 अगस्त को लेकर सुरक्षा व्यवस्था विशेष रूप से कड़ी की जा रही है। हाल के दिनों में आतंकवादी खतरे और संदिग्ध गतिविधियों को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने कई इलाकों में निगरानी बढ़ाई है। ऐसे समय में अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े पुराने हत्याकांड की जांच दोबारा शुरू होना सुरक्षा एजेंसियों की व्यापक रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। हालांकि पुलिस ने इस कार्रवाई और पुराने मामले की जांच के बीच सभी पहलुओं को लेकर विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि सुरक्षा एजेंसियां पुराने आतंकवादी मामलों को भी नजरअंदाज नहीं कर रही हैं।
कश्मीरी पंडितों के पलायन और आतंक के दौर की दर्दनाक याद
1990 का दौर जम्मू-कश्मीर के आधुनिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में गिना जाता है। आतंकवादी हिंसा, धमकियों और लक्षित हत्याओं के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित परिवारों को घाटी छोड़कर जम्मू और देश के अन्य हिस्सों में जाना पड़ा। उस दौर में हुई हत्याओं और विस्थापन की घटनाएं आज भी कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए गहरे दर्द और न्याय की मांग से जुड़ी हुई हैं। प्रेमी और उनके बेटे की हत्या का मामला भी उसी हिंसक दौर की एक गंभीर घटना है। ऐसे मामलों की दोबारा जांच से केवल एक आपराधिक मामले की परतें ही नहीं खुल सकतीं, बल्कि उस दौर की घटनाओं को लेकर उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड को भी नए सिरे से जांचने का अवसर मिल सकता है।
सवाल बड़ा है—इतने वर्षों बाद कौन-कौन सी कड़ियां जुड़ेंगी?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पुलिस को इस पुराने मामले में नई जांच के लिए कौन-सी नई जानकारी या परिस्थितियां मिली हैं। क्या किसी पुराने संदिग्ध की पहचान दोबारा सामने आई है? क्या किसी आतंकवादी नेटवर्क से जुड़े नए दस्तावेज मिले हैं? क्या पुराने मामलों की जांच में सामने आए नामों को वर्तमान सुरक्षा मामलों से जोड़कर देखा जा रहा है? या फिर पुलिस व्यापक स्तर पर 1990 के लंबित मामलों की समीक्षा कर रही है? फिलहाल इन सवालों के स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आए हैं। लेकिन कई स्थानों पर हुई तलाशी यह संकेत जरूर देती है कि एजेंसियां मामले को केवल कागजी समीक्षा तक सीमित नहीं रखना चाहतीं।
पुराने संदिग्धों और नेटवर्क की भूमिका पर फिर नजर
आतंकवाद से जुड़े पुराने मामलों की जांच में केवल सीधे आरोपियों को तलाशना ही पर्याप्त नहीं होता। जांच एजेंसियों के लिए यह भी महत्वपूर्ण होता है कि घटना के पीछे किस नेटवर्क ने काम किया, हथियार और रसद कहां से आई, स्थानीय स्तर पर किस तरह मदद मिली और घटना के बाद आरोपियों को संरक्षण या भागने में किसने सहायता की। यदि 1990 के इस हत्याकांड में ऐसी कोई कड़ी अब उपलब्ध दस्तावेजों या नई सूचना के आधार पर सामने आती है, तो पुलिस उसके आधार पर जांच को आगे बढ़ा सकती है। हालांकि किसी भी व्यक्ति को केवल पुराने आरोप या संदिग्ध संपर्क के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता; उसके खिलाफ ठोस साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया जरूरी होगी।
न्याय की तलाश में पुरानी फाइलों का खुलना कितना महत्वपूर्ण?
कश्मीरी पंडित हत्याकांड जैसे पुराने मामलों की जांच का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे दशकों पुराने अपराध हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की प्रक्रिया का अधूरा रह जाना अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है। यदि किसी मामले में अपराधियों की पहचान और जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती, तो पीड़ित परिवारों के लिए उस घटना का अध्याय कभी पूरी तरह बंद नहीं होता। इसलिए यदि पुलिस के पास पुराने मामलों में नई जांच के लिए पर्याप्त आधार है, तो निष्पक्ष और कानून के अनुसार जांच आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने दोहरी चुनौती
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों के सामने इस समय दोहरी चुनौती है—एक तरफ मौजूदा आतंकी नेटवर्क और संभावित हमलों से निपटना, तो दूसरी तरफ पुराने मामलों की जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाना। पुराने मामलों को फिर खोलने के लिए दस्तावेजों का संरक्षण, गवाहों की पहचान, पुराने रिकॉर्ड का सत्यापन और उपलब्ध नई जानकारी की विश्वसनीयता की जांच जरूरी होगी। यदि जांच में कोई ठोस नई कड़ी मिलती है तो उसका इस्तेमाल आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए किया जा सकता है।
क्या खुलेगा 1990 के आतंक का पूरा सच?
सरवानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे की हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। 1990 में पेड़ से लटके मिले पिता-पुत्र के शवों की भयावह घटना की जांच अब दशकों बाद फिर सक्रिय की जा रही है। पुलिस की ताजा कार्रवाई ने इस पुराने मामले से जुड़े कई सवालों को फिर सामने ला दिया है। क्या जांच किसी ऐसे व्यक्ति या नेटवर्क तक पहुंच पाएगी जो उस समय कानून की पकड़ से बाहर रह गया था? क्या पुराने दस्तावेजों में ऐसी कोई कड़ी मौजूद है जिसे अब नए तरीके से पढ़ा जा सकता है? और क्या पीड़ित परिवार को इतने वर्षों बाद न्याय की दिशा में कोई ठोस प्रगति दिखाई देगी?
फाइल खुली है, अब नजर जांच के अगले कदम पर
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की विशेष इकाई ने 1990 के दोहरे हत्याकांड की पुनः जांच शुरू कर दी है और अनंतनाग के डोरू समेत कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाया गया है। यह कार्रवाई एक गंभीर पुराने अपराध की जांच को फिर सक्रिय करने का संकेत है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि पुलिस किस निष्कर्ष तक पहुंची है या किसी व्यक्ति की भूमिका स्थापित हो गई है। आगे की जांच, बरामदगी, दस्तावेजों और पूछताछ से ही तस्वीर साफ होगी।
36 साल पुरानी फाइल फिर खुल चुकी है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि 1990 में सरवानंद कौल प्रेमी और उनके बेटे के साथ क्या हुआ था—सवाल यह भी है कि उस खौफनाक हत्याकांड के पीछे कौन था और क्या इतने वर्षों बाद कानून उन तक पहुंच पाएगा?




