ओपिनियन | प्रणव प्रियदर्शी | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 19 मई 2026
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ तस्वीरें केवल कूटनीतिक घटनाएं नहीं होतीं, बल्कि वे बदलती हुई विश्व व्यवस्था के प्रतीक बन जाती हैं। बीजिंग में कुछ ही दिनों के अंतराल पर डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी भी ऐसी ही एक तस्वीर है। यह केवल दो नेताओं की यात्रा नहीं, बल्कि उस बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत है जिसमें चीन अब दुनिया की राजनीति का “साइड प्लेयर” नहीं बल्कि केंद्रीय धुरी बनने की ओर बढ़ रहा है। शीत युद्ध के बाद दुनिया लंबे समय तक अमेरिकी नेतृत्व वाली एकध्रुवीय व्यवस्था के तहत चलती रही। वाशिंगटन वैश्विक कूटनीति, आर्थिक फैसलों और सुरक्षा संरचना का सबसे बड़ा केंद्र था। लेकिन आज पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि बीजिंग उस जगह को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच चुका है। जब अमेरिका और रूस — दोनों के शीर्ष नेता एक ही सप्ताह में चीन पहुंचते हैं, तो यह केवल संयोग नहीं होता। यह संदेश होता है कि अब वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने वाली मेजों में बीजिंग सबसे महत्वपूर्ण कुर्सियों में से एक पर बैठ चुका है।
दिलचस्प बात यह है कि चीन ने यह ताकत केवल सैन्य शक्ति के दम पर नहीं हासिल की। उसने व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन, तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा को अपने भू-राजनीतिक हथियार में बदल दिया। एक समय दुनिया “मेड इन चाइना” को सिर्फ सस्ते उत्पादों के रूप में देखती थी, लेकिन अब वही चीन कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दुर्लभ खनिज, डिजिटल नेटवर्क, 5G, सेमीकंडक्टर और वैश्विक ऊर्जा बाजार में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। यही कारण है कि अमेरिका उसे केवल आर्थिक प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि रणनीतिक चुनौती मानने लगा है।
ट्रंप की चीन यात्रा ने इस बदलते समीकरण को और स्पष्ट कर दिया। अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक समझौते हुए, कृषि खरीद और बोइंग डील जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई, लेकिन असली कहानी व्यापार नहीं थी। असली कहानी यह थी कि अमेरिका अब चीन के साथ “संघर्ष और सहयोग” दोनों की मजबूरी में फंसा दिखाई देता है। वाशिंगटन चीन को रोकना भी चाहता है और उससे अलग भी नहीं हो सकता। यही आज की वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
ताइवान इस पूरी कहानी का सबसे संवेदनशील केंद्र बन चुका है। चीन ताइवान को अपनी संप्रभुता का हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका उसे सामरिक साझेदार की तरह देखता है। ट्रंप के हालिया बयान, जिनमें उन्होंने ताइवान को लेकर अपेक्षाकृत नरम संकेत दिए, ने अमेरिकी राजनीति में भी बेचैनी पैदा कर दी। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों ने साफ कहा कि ताइवान “बर्गेनिंग चिप” नहीं हो सकता। इसका मतलब यह है कि चीन को लेकर अमेरिका के भीतर अब लगभग स्थायी राजनीतिक सहमति बन चुकी है — और यही आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का आधार बनेगी।
इसी बीच पुतिन की बीजिंग यात्रा एक और बड़ा संदेश देती है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरा रूस अब आर्थिक और रणनीतिक रूप से चीन पर पहले से कहीं अधिक निर्भर हो चुका है। रूस के तेल, गैस और ऊर्जा निर्यात का सबसे बड़ा खरीदार चीन बन गया है। “पावर ऑफ साइबेरिया-2” जैसी परियोजनाएं केवल गैस पाइपलाइन नहीं हैं; वे उस नए भू-राजनीतिक गठबंधन की प्रतीक हैं जो पश्चिमी व्यवस्था के विकल्प के रूप में उभर रहा है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि चीन केवल महाशक्तियों तक सीमित नहीं है। दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका में उसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। सिंगापुर जैसे देश चीन के साथ अपने आर्थिक और तकनीकी संबंध गहरे कर रहे हैं। बेल्ट एंड रोड परियोजना, बंदरगाह नेटवर्क, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश मॉडल के जरिए चीन धीरे-धीरे एक समानांतर वैश्विक व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश कर रहा है।
ऊर्जा संकट ने चीन की अहमियत को और बढ़ा दिया है। ईरान-इजरायल तनाव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर बढ़ते खतरे ने दुनिया को यह एहसास कराया है कि ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार पर नियंत्रण आने वाले समय में सबसे बड़ा रणनीतिक हथियार बन सकता है। चीन रूस से रिकॉर्ड तेल खरीद रहा है, ईरान के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है और एशियाई सप्लाई चेन पर पकड़ बना रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि बीजिंग केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि ऊर्जा और भू-राजनीतिक स्थिरता का भी केंद्र बनना चाहता है।
लेकिन इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू भी है। चीन का बढ़ता प्रभाव दुनिया में नई असुरक्षाएं भी पैदा कर रहा है। ताइवान संकट, दक्षिण चीन सागर में सैन्य गतिविधियां, साइबर जासूसी, तकनीकी नियंत्रण और वैश्विक निगरानी मॉडल को लेकर पश्चिमी देशों की चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिका और उसके सहयोगियों को डर है कि यदि चीन का प्रभाव इसी गति से बढ़ता रहा, तो भविष्य की विश्व व्यवस्था अधिक केंद्रीकृत और कम लोकतांत्रिक हो सकती है।
आज दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सवाल केवल यह नहीं है कि चीन कितना शक्तिशाली हो रहा है। असली सवाल यह है कि क्या दुनिया एक नए “बीजिंग-केंद्रित वैश्विक युग” की ओर बढ़ रही है? और यदि ऐसा है, तो क्या अमेरिका इस बदलाव को स्वीकार करेगा या फिर आने वाले वर्षों में दुनिया एक नए शीत युद्ध जैसी प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ेगी?
इतिहास गवाह है कि जब भी वैश्विक शक्ति संतुलन बदलता है, दुनिया लंबे समय तक अस्थिर रहती है। बीजिंग में ट्रंप और पुतिन की मौजूदगी शायद उसी नए दौर की शुरुआती तस्वीर है — एक ऐसा दौर जहां दुनिया की सबसे बड़ी लड़ाई केवल सीमाओं की नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव, तकनीक, ऊर्जा और भविष्य की विश्व व्यवस्था की होगी।




