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मैं इस तरह के व्यवहार को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करूंगा… : शिवसेना विवाद पर नेताओं की बयानबाजी से नाराज हुए CJI सूर्यकांत

विधिक/राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 मई 2026

सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को उस समय तीखा माहौल देखने को मिला जब भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने शिवसेना चुनाव चिन्ह विवाद मामले में नेताओं और पक्षकारों की सार्वजनिक बयानबाजी पर कड़ी नाराजगी जाहिर की। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि एक तरफ कोर्ट से तारीख मांगी जाती है और दूसरी तरफ मीडिया में जाकर यह आरोप लगाया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं कर रहा। मुख्य न्यायाधीश ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा, “मैं इस तरह के व्यवहार को चुपचाप बर्दाश्त नहीं करूंगा। अपने शब्दों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करें।” सुप्रीम कोर्ट में उद्धव ठाकरे गुट की उस याचिका पर सुनवाई हो रही थी जिसमें चुनाव आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे गुट को “असली शिवसेना” के रूप में मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी गई है। इसके साथ ही महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष द्वारा शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित न करने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका भी सूचीबद्ध थी। सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश वकीलों ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की, जिसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

सीजेआई सूर्यकांत ने साफ कहा कि अदालत की प्रक्रिया को लेकर सार्वजनिक मंचों और मीडिया में गैर-जिम्मेदाराना बयान देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि जब भी मामला सूचीबद्ध होता है, पक्षकार खुद तारीख मांगते हैं और बाद में मीडिया में जाकर यह नैरेटिव बनाया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट सुनवाई नहीं कर रहा। अदालत ने इस प्रवृत्ति को न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक दबाव बनाने की कोशिश बताया।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “सबसे पहले अपने लोगों को मीडिया में जाकर बयान देने से रोकिए। आप यहां आकर समय मांगते हैं और फिर बाहर जाकर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं कर रहा। यह दोहरा रवैया स्वीकार नहीं किया जा सकता।” अदालत की इस टिप्पणी को केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं बल्कि राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए सीधा संदेश माना जा रहा है कि अदालतों को राजनीतिक मंच की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

यूबीटी गुट की ओर से वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने कहा कि वे अदालत की सुविधा के अनुसार बहस के लिए तैयार हैं। इस पर भी मुख्य न्यायाधीश ने तीखा जवाब देते हुए कहा, “आप बहस नहीं करना चाहते, आप बयान देना चाहते हैं।” अदालत की इस टिप्पणी ने साफ कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक बयानबाजी और न्यायिक प्रक्रिया को मिलाने की कोशिशों से नाराज है।

इसके बाद वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने मामले को जुलाई के आखिरी सप्ताह में सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया। हालांकि मुख्य न्यायाधीश ने दोहराया कि अदालत की असली चिंता मामले की लंबितता नहीं बल्कि उसे लेकर नेताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से की जा रही टिप्पणियां हैं। अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक मामलों पर राजनीतिक दबाव या मीडिया ट्रायल जैसी स्थिति स्वीकार नहीं की जाएगी।

यह मामला केवल शिवसेना विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े राजनीतिक और संवैधानिक मामलों में अदालतों को लेकर नेताओं की सार्वजनिक टिप्पणियां बढ़ी हैं। कभी फैसलों पर सवाल उठाए जाते हैं, तो कभी सुनवाई में देरी को राजनीतिक मुद्दा बना दिया जाता है। ऐसे माहौल में सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

इसी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने देश में फर्जी डिग्री धारक वकीलों के बढ़ते मामलों पर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सीबीआई को दिल्ली समेत कई जगहों पर एलएलबी डिग्रियों की जांच करनी चाहिए। अदालत की इस टिप्पणी ने न्यायिक व्यवस्था और कानूनी पेशे की विश्वसनीयता को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है।

राजनीतिक हलकों में सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना विवाद अब केवल कानूनी लड़ाई नहीं रह गया है, बल्कि यह सत्ता, पार्टी पहचान और राजनीतिक वैधता की लड़ाई बन चुका है। उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे दोनों गुट लगातार खुद को “असली शिवसेना” साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में अदालत की हर टिप्पणी राजनीतिक असर पैदा करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने आज जिस तरह सख्त रुख दिखाया, वह केवल एक मामले की नाराजगी नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक माहौल को लेकर चिंता का संकेत है। लोकतंत्र में अदालतें अंतिम संवैधानिक संस्थाएं मानी जाती हैं और यदि उन पर सार्वजनिक दबाव बनाने की संस्कृति बढ़ती है, तो इससे न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेहद स्पष्ट शब्दों में संदेश दिया कि अदालत की गरिमा और प्रक्रिया से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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