अंतरराष्ट्रीय विशेष | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 मई 2026
सत्ता अविश्वास भी लाती है : अमेरिका-चीन के बीच बढ़ता संघर्ष और अविश्वास
ट्रंप दौर के ‘गिफ्ट विवाद’ से खुलीं दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति संघर्ष की परतें
दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियां — अमेरिका और चीन — आज केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि तकनीक, सुरक्षा, सैन्य ताकत, साइबर नियंत्रण और वैश्विक प्रभाव को लेकर ऐसी रणनीतिक जंग में उलझ चुकी हैं जिसने पूरी दुनिया की राजनीति का संतुलन बदल दिया है। दोनों देशों के बीच अविश्वास का स्तर इतना बढ़ चुका है कि अब हर तकनीकी उपकरण, हर डिजिटल प्लेटफॉर्म और हर रणनीतिक समझौते को शक की नजर से देखा जाने लगा है। इसी बढ़ते अविश्वास की एक बेहद चर्चित और प्रतीकात्मक घटना डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान सामने आई थी, जब दावा किया गया कि चीन से मिले कई महंगे इलेक्ट्रॉनिक गिफ्ट्स, हाई-एंड मोबाइल फोन और हाईटेक गैजेट्स को अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने तोड़कर नष्ट कर दिया और डस्टबिन में फेंक दिया। वजह थी — जासूसी और डेटा चोरी का डर। उस समय अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां इतनी सतर्क हो गई थीं कि खबरें सामने आईं कि ट्रंप के साथ चीन से जुड़ा कोई भी इलेक्ट्रॉनिक सामान तक नहीं जाने दिया गया। यह केवल राष्ट्रपति सुरक्षा का सामान्य प्रोटोकॉल नहीं था, बल्कि उस गहरे अविश्वास का संकेत था जो धीरे-धीरे अमेरिका और चीन के रिश्तों की असली पहचान बन चुका है। दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक शक्ति अमेरिका को डर था कि चीन तकनीक के जरिए संवेदनशील सूचनाएं हासिल कर सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा पहुंचा सकता है। यही कारण है कि अमेरिका ने चीन को केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि रणनीतिक खतरे के रूप में देखना शुरू कर दिया।
दरअसल, अमेरिका लंबे समय से चीन पर साइबर जासूसी, डेटा चोरी और टेक्नोलॉजी आधारित निगरानी के आरोप लगाता रहा है। अमेरिकी एजेंसियों का दावा है कि चीन केवल व्यापारिक विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि वह टेक कंपनियों, डिजिटल नेटवर्क और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए वैश्विक स्तर पर डेटा और संवेदनशील जानकारियां इकट्ठा करने की कोशिश करता है। यही वजह है कि Huawei, ZTE और TikTok जैसी चीनी कंपनियां वर्षों से अमेरिकी जांच, प्रतिबंध और राजनीतिक बहस के केंद्र में रही हैं। अमेरिका का आरोप है कि ये कंपनियां चीनी सरकार के प्रभाव में काम करती हैं और इनके जरिए अमेरिकी नागरिकों तथा संस्थाओं के डेटा तक पहुंच बनाई जा सकती है। हालांकि चीन लगातार इन आरोपों को खारिज करता रहा है और इसे अमेरिका की राजनीतिक और आर्थिक रणनीति करार देता है।
लेकिन अमेरिका और चीन के बीच यह टकराव केवल तकनीकी या साइबर सुरक्षा तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध, सेमीकंडक्टर तकनीक पर नियंत्रण, दक्षिण चीन सागर में सैन्य तनाव, ताइवान मुद्दा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों को और अधिक जटिल बना दिया है। एक समय था जब अमेरिका चीन को केवल “उभरती अर्थव्यवस्था” के रूप में देखता था, लेकिन आज वही चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 5G नेटवर्क, इलेक्ट्रिक वाहन, सुपरकंप्यूटिंग और अंतरिक्ष कार्यक्रम जैसे क्षेत्रों में तेजी से अमेरिका को चुनौती दे रहा है। यही कारण है कि अमेरिका अब चीन को केवल व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अपनी वैश्विक सत्ता और प्रभाव के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानने लगा है।
डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में यह संघर्ष सबसे ज्यादा खुलकर सामने आया। ट्रंप प्रशासन ने चीन पर भारी टैरिफ लगाए, कई चीनी टेक कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए और सार्वजनिक रूप से चीन को अमेरिका के लिए “रणनीतिक खतरा” बताया। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया। हालांकि बाद में अमेरिका में सत्ता बदली, लेकिन चीन को लेकर अमेरिकी नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। राष्ट्रपति जो बाइडेन के दौर में भी चीन के खिलाफ तकनीकी प्रतिबंध, इंडो-पैसिफिक रणनीति और सुरक्षा चिंताएं जारी रहीं। इससे साफ संकेत मिला कि अमेरिका में चीन को लेकर बढ़ती चिंता केवल किसी एक राष्ट्रपति की सोच नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का स्थायी हिस्सा बन चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच यह प्रतिस्पर्धा और अधिक तीखी हो सकती है। इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था, सप्लाई चेन, डिजिटल सुरक्षा, सैन्य गठबंधनों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई देगा। कई देशों के सामने यह चुनौती बढ़ती जा रही है कि वे इन दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें।
स्पष्ट है कि ट्रंप दौर का “गिफ्ट विवाद” केवल कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का मामला नहीं था। वह उस गहरे अविश्वास का प्रतीक था जिसने आज अमेरिका-चीन संबंधों को परिभाषित करना शुरू कर दिया है। यह केवल दो देशों की कहानी नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी सत्ता, तकनीक और प्रभाव की जंग की कहानी बन चुकी है — जहां भरोसे की जगह शक और सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है।



