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BRICS में बढ़ती दरारें या बदलाव का दौर? नए सदस्य, ईरान-UAE तनाव और वैश्विक राजनीति के बीच नई परीक्षा

अंतरराष्ट्रीय | आलोक रंजन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 मई 2026

BRICS समूह अब केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का मंच नहीं रह गया है, बल्कि तेजी से बदलती वैश्विक राजनीति के बीच एक जटिल और प्रभावशाली भू-राजनीतिक गठबंधन के रूप में उभर रहा है। हालांकि नए सदस्य देशों के शामिल होने के साथ संगठन की ताकत बढ़ी है, लेकिन इसके भीतर मतभेद भी अब अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली में आयोजित BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा ने स्वीकार किया कि नए सदस्यों और अलग-अलग रणनीतिक हितों के कारण मतभेद स्वाभाविक हैं और उन्हें सुलझने में समय लगेगा। दिल्ली में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक का समापन बिना संयुक्त बयान के हुआ। इसके बजाय 63 पैराग्राफ वाला “चेयर स्टेटमेंट” जारी किया गया, जिसमें भारत की कई पहलों, फिलिस्तीन मुद्दे और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन का उल्लेख किया गया। लेकिन पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को लेकर ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच मतभेद सामने आ गए, जिन पर सहमति नहीं बन सकी।

ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा ने एक विशेष बातचीत में कहा कि BRICS लगातार विकसित हो रहा संगठन है और नए सदस्य जुड़ने के बाद विचारों में विविधता बढ़ना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि “अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-अलग राष्ट्रीय हित होते हैं। इन मतभेदों को खत्म होने में समय लगेगा, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि BRICS कमजोर हो रहा है।”

विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS अब अपने सबसे महत्वपूर्ण संक्रमण काल से गुजर रहा है। पहले जहां यह समूह मुख्य रूप से आर्थिक सहयोग और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की बात करता था, वहीं अब इसमें पश्चिम एशिया, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार, डॉलर निर्भरता और सुरक्षा मुद्दे भी प्रमुख एजेंडा बन चुके हैं। नए सदस्य देशों के शामिल होने के बाद संगठन की भौगोलिक और राजनीतिक विविधता काफी बढ़ गई है।

ईरान-UAE तनाव को लेकर बनी असहमति को आने वाले सितंबर में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के लिए भी चुनौती माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में 28 फरवरी 2026 से जारी युद्ध ने सदस्य देशों के बीच रणनीतिक प्राथमिकताओं का अंतर उजागर कर दिया है। एक ओर ईरान चाहता है कि BRICS खुलकर उसके पक्ष में आवाज उठाए, वहीं खाड़ी देशों के अपने आर्थिक और सुरक्षा हित हैं।

इसके बावजूद BRICS देशों ने फिलिस्तीन के लिए “स्वतंत्र राज्य” के समर्थन को दोहराया और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने भी बैठक के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज मजबूत करने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया।

ब्राजील के विदेश मंत्री ने कहा कि BRICS की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह पश्चिमी शक्तियों के विकल्प के रूप में उभर रहा है। उन्होंने माना कि अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों और क्षेत्रीय हितों के बावजूद सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय संवाद की आवश्यकता पहले से ज्यादा बढ़ गई है।

भारत के लिए भी BRICS का महत्व लगातार बढ़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा के बीच भारत “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में BRICS भारत को एक ऐसा मंच देता है जहां वह पश्चिम और पूर्व—दोनों के बीच संतुलन बनाकर अपनी वैश्विक भूमिका मजबूत कर सकता है।

हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब “विस्तार बनाम एकजुटता” की है। जितने अधिक सदस्य जुड़ेंगे, उतने अधिक हित और मतभेद सामने आएंगे। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में BRICS की सफलता केवल उसके विस्तार से नहीं, बल्कि आंतरिक सहमति और साझा रणनीति बनाने की क्षमता से तय होगी।

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