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सुप्रीम कोर्ट में भूकंप खतरे पर सुनवाई : न्यायालय ने पूछ लिया—तो क्या सबको चांद पर बसा दें?

एबीसी डेस्क 12 दिसंबर 2025

देश की 75 प्रतिशत आबादी भूकंप के खतरे वाले क्षेत्रों में रहने को मजबूर है—इस मुद्दे पर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बेहद स्पष्ट और सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सिर्फ खतरे का आंकड़ा बता देने से समाधान नहीं निकल सकता और न ही यह व्यावहारिक है कि पूरी आबादी को किसी सुरक्षित जगह, जैसे चांद पर, बसाने की बात की जाए। अदालत की यह टिप्पणी सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर संकेत है कि आपदा प्रबंधन केवल कागज़ी योजना न होकर ज़मीनी कार्रवाई में दिखाई देना चाहिए।

 

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि देश का बड़ा भूभाग भूकंप संभावित ज़ोन में आता है और लाखों लोगों की जान हर समय जोखिम में रहती है। इसलिए सरकार को तुरंत ठोस कदम उठाने चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि “अगर हम हर जोखिम वाली जगह से लोगों को हटाने लगेंगे, तो फिर क्या सभी को चाँद पर बसा दें?” अदालत ने साफ कहा कि जोखिम की जानकारी होना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी ज्यादा ज़रूरी है उसकी वैज्ञानिक और प्रशासनिक तैयारी—जैसे मजबूत ढांचे, जागरूकता और समय पर बचाव तंत्र।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह भूकंप सुरक्षा से जुड़े अपने मौजूदा कानूनों, नियमों और नीतियों की विस्तृत जानकारी अदालत को दे। अदालत ने यह भी कहा कि देश में इमारतों का निर्माण अक्सर सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज करके किया जाता है, जो भूकंप के दौरान सबसे बड़ी त्रासदी की वजह बन सकता है। इसलिए सरकार और स्थानीय निकायों को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्माण नियमों का सख्ती से पालन हो और पुराने, कमजोर ढांचों की जांच व मरम्मत समय-समय पर होती रहे।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं पर पूरी तरह नियंत्रण संभव नहीं है, लेकिन सही तैयारी और मजबूत व्यवस्था से इसके नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी देश में आपदा प्रबंधन की हकीकत पर एक बड़ा आईना है, जिसमें दिखता है कि चेतावनियों, सर्वेक्षणों और रिपोर्टों से आगे बढ़कर अब ठोस नीति, विज्ञान आधारित निर्माण, और जनजागरूकता पर केंद्रित काम की आवश्यकता है।

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