अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/इस्लामाबाद | 16 मई 2026
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संघर्ष विराम यानी सीजफायर को लेकर जो बयान दिया है, उसने पूरी दुनिया की कूटनीतिक हलचल को नई दिशा दे दी है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने और सीजफायर को आगे बढ़ाने का फैसला “पाकिस्तान के अनुरोध” और उसके प्रति “सद्भावना” दिखाने के लिए किया। पहली नजर में यह बयान एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी लग सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति को करीब से देखने वाले विशेषज्ञ इसे कहीं ज्यादा बड़ा संकेत मान रहे हैं। सवाल अब यह उठ रहा है कि क्या पाकिस्तान अचानक अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ बनकर उभरा है, या फिर इसके पीछे कोई और बड़ी रणनीतिक कहानी छिपी हुई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने अमेरिका से आग्रह किया था कि वह ईरान के खिलाफ तत्काल सैन्य कार्रवाई रोककर बातचीत को मौका दे। इसके बाद अमेरिका ने सीजफायर को अनिश्चितकाल तक बढ़ाने का फैसला किया। लेकिन ट्रंप ने यह भी साफ कर दिया कि अगर बातचीत असफल रही, तो सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू हो सकती है। यानी यह शांति स्थायी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक विराम भी हो सकता है।
दरअसल यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। फरवरी 2026 में अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद ईरान ने जिस तरह जवाबी सैन्य दबाव बनाया, उसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया। होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट गहराया, तेल की कीमतें उछलीं, समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ और वैश्विक बाजारों में भारी अस्थिरता पैदा हो गई। अमेरिका समझ चुका था कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो उसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और नवंबर के राजनीतिक समीकरणों पर भी पड़ेगा।
यहीं से शुरू होती है असली कूटनीतिक कहानी। ट्रंप का “पाकिस्तान पर एहसान” वाला बयान सिर्फ पाकिस्तान को खुश करने के लिए नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे चीन, खाड़ी देशों और यहां तक कि भारत के लिए भी एक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि दक्षिण एशिया में अब भी उसकी रणनीतिक पकड़ कायम है और पाकिस्तान उसके लिए पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ है। अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी के बाद माना जा रहा था कि पाकिस्तान की उपयोगिता वॉशिंगटन के लिए कम हो गई है, लेकिन अब ट्रंप ने एक झटके में पाकिस्तान को फिर से वैश्विक बातचीत के केंद्र में ला खड़ा किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान भी इस मौके का इस्तेमाल अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने के लिए कर रहा है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और IMF के दबाव के बीच पाकिस्तान लंबे समय से खुद को एक “जिम्मेदार क्षेत्रीय शक्ति” के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है। ईरान-अमेरिका तनाव में मध्यस्थ की भूमिका निभाना उसके लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि की तरह पेश किया जा सकता है। खास बात यह भी है कि पाकिस्तान ने पिछले कुछ महीनों में सऊदी अरब, चीन, ईरान और अमेरिका — सभी से अपने संबंध संतुलित रखने की कोशिश की है।
लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा चीन है। ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच बीजिंग में हुई हालिया मुलाकात में ईरान और होर्मुज का मुद्दा सबसे अहम विषयों में शामिल था। ट्रंप ने दावा किया कि चीन भी चाहता है कि होर्मुज खुला रहे और ईरान परमाणु हथियार न बनाए। हालांकि चीन सार्वजनिक रूप से किसी सैन्य दबाव का समर्थन नहीं कर रहा। असल में चीन इस पूरे संकट को एक अवसर की तरह देख रहा है। अगर अमेरिका पश्चिम एशिया में उलझा रहता है, तो चीन आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर अपनी पकड़ और मजबूत कर सकता है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का यह बयान कहीं न कहीं घरेलू राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। अमेरिका में चुनावी दबाव, बढ़ती महंगाई और तेल की कीमतों ने ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ऐसे में वह यह संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिका केवल युद्ध नहीं कर रहा, बल्कि बातचीत और शांति की दिशा में भी नेतृत्व कर रहा है। पाकिस्तान का नाम लेकर ट्रंप ने मुस्लिम देशों को भी यह संकेत देने की कोशिश की है कि अमेरिका पूरी तरह टकराव की राजनीति नहीं चाहता।
दूसरी तरफ ईरान अब भी अमेरिका पर भरोसा करने को तैयार नहीं दिख रहा। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची साफ कह चुके हैं कि बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब अमेरिका गंभीरता दिखाएगा। ईरान यह भी संकेत दे चुका है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को पूरी तरह छोड़ने वाला नहीं है। यानी सीजफायर के बावजूद तनाव खत्म नहीं हुआ, बल्कि फिलहाल सिर्फ ठंडा पड़ा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह जरूर साफ कर दिया है कि दुनिया की राजनीति तेजी से बदल रही है। अमेरिका अब अकेले फैसले लेने की स्थिति में नहीं दिख रहा। चीन, पाकिस्तान, खाड़ी देश और क्षेत्रीय ताकतें अब वैश्विक संकटों में बड़ी भूमिका निभा रही हैं। ट्रंप का बयान केवल सीजफायर की घोषणा नहीं था, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत भी था। और शायद इसी वजह से कहा जा रहा है — कहीं पर निगाहें हैं, तो कहीं पर असली निशाना।



