ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026
किसी भी देश का भविष्य उसकी युवा आबादी तय करती है। अर्थशास्त्री इसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहते हैं। जब किसी देश में कामकाजी उम्र के युवाओं की संख्या सबसे अधिक होती है, तब वही समय उसकी अर्थव्यवस्था, उद्योग, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक शक्ति बनने का सबसे बड़ा अवसर होता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि हर देश इस अवसर का लाभ नहीं उठा पाता। कुछ देश इसी ताकत के दम पर महाशक्ति बन जाते हैं, जबकि कुछ इतिहास का सबसे बड़ा मौका गंवा बैठते हैं।
भारत के पास भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक अवसर था। 2014 के आसपास भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश बन चुका था। विभिन्न अनुमानों के अनुसार उस समय भारत में लगभग 37 करोड़ युवा थे, जबकि चीन में यह संख्या लगभग 27 करोड़ थी। यानी मानव संसाधन के मामले में भारत के पास स्पष्ट बढ़त थी।
लेकिन सवाल यह है कि इस युवा शक्ति का उपयोग किस दिशा में किया गया?
सरकार के आलोचकों का कहना है कि इसी दौरान चीन ने अपने युवाओं को कौशल विकास, उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा उत्पादन और आधुनिक विनिर्माण उद्योगों में लगाया। नतीजा यह हुआ कि आज चीन दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक और तकनीकी ताकतों में शामिल है और अनेक क्षेत्रों में अमेरिका को चुनौती दे रहा है।
आलोचकों का आरोप है कि भारत में इस दौरान शिक्षा, रोजगार, वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक विकास की तुलना में राजनीतिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया प्रचार, धार्मिक विवाद और प्रतीकात्मक मुद्दे अधिक चर्चा में रहे। उनका कहना है कि करोड़ों युवाओं की ऊर्जा रोजगार, नवाचार और उत्पादन की दिशा में लगाने के बजाय उन्हें ऐसे मुद्दों में उलझा दिया गया, जिनसे देश की आर्थिक क्षमता नहीं बढ़ती।
यही कारण है कि आज भारत और चीन की तुलना बार-बार होती है। एक देश तकनीक, उद्योग और निर्यात में लगातार आगे बढ़ रहा है, जबकि दूसरा अब भी रोजगार, कौशल विकास और शिक्षा जैसे बुनियादी सवालों से जूझ रहा है।
फिल्म “दीवार” का मशहूर संवाद आज भी प्रासंगिक लगता है—”हम दोनों एक ही जगह से चले थे, आज मैं कहाँ पहुँच गया और तुम कहाँ रह गए।” आलोचक मानते हैं कि भारत और चीन की कहानी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है।
हालांकि केंद्र सरकार इस आकलन से पूरी तरह असहमत है। सरकार का कहना है कि स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और नई शिक्षा नीति जैसी पहलों के माध्यम से युवाओं के लिए नए अवसर बनाए गए हैं। सरकार यह भी दावा करती है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक स्टार्टअप इकोसिस्टम में उसकी मजबूत पहचान बनी है।
इसके बावजूद बहस जारी है कि क्या भारत अपनी युवा आबादी की पूरी क्षमता का उपयोग कर पाया? क्या देश पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार, विश्वस्तरीय अनुसंधान और तकनीकी नेतृत्व विकसित कर सका? या फिर उसने अपने इतिहास का सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय अवसर खो दिया?
आलोचक यहां तक कहते हैं कि यदि यही स्थिति बनी रही तो भारत आने वाले वर्षों में विकास की वैश्विक दौड़ में बहुत पीछे छूट सकता है। वहीं सरकार और उसके समर्थकों का कहना है कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसके परिणाम आने वाले वर्षों में और स्पष्ट होंगे।
इस बहस का अंतिम फैसला राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, अनुसंधान, तकनीकी नवाचार, उत्पादकता और प्रति व्यक्ति आय जैसे संकेतक करेंगे। वही बताएंगे कि भारत ने अपनी सबसे बड़ी युवा ताकत का सही इस्तेमाल किया या इतिहास का सबसे बड़ा अवसर गंवा दिया।




