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मिड डे मील में अंडे हटाकर सात्विक भोजन देना वैज्ञानिक नहीं, बच्चों के साथ भेदभाव

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा कोलकाता के मिड-डे मील (PM पोषण) की जिम्मेदारी इस्कॉन (ISKCON) को सौंपे जाने और स्कूलों के भोजन से अंडे, प्याज और लहसुन हटाए जाने के फैसले पर बहस तेज हो गई है। इस बीच सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. सिल्विया कार्पगम ने इसे “राज्य प्रायोजित भेदभाव” (State – sponsored discrimination) करार देते हुए कहा है कि बच्चों के भोजन का फैसला विज्ञान के आधार पर होना चाहिए, न कि धार्मिक या जातिगत मान्यताओं के आधार पर।

फ्रंटलाइन पत्रिका को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में डॉ. कार्पगम ने कहा कि भारत में बच्चों के पोषण को लेकर वैज्ञानिक तथ्यों की जगह धीरे-धीरे जाति और कॉरपोरेट हित हावी होते जा रहे हैं। उनके अनुसार अंडे जैसे पौष्टिक भोजन की जगह सोया, पनीर या अन्य शाकाहारी विकल्प पूरी तरह समान पोषण नहीं दे सकते।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) के शोध बताते हैं कि विविध आहार बच्चों के विकास के लिए सबसे जरूरी है। मछली, अंडा, मांस और अन्य पशु-आधारित खाद्य पदार्थ विटामिन B12, जिंक, आयरन और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनकी जगह केवल सोया या अन्य वनस्पति आधारित खाद्य पदार्थ देने से बच्चों के पोषण पर असर पड़ सकता है।

डॉ. कार्पगम ने यह भी कहा कि सोया एक अत्यधिक प्रोसेस्ड (Ultra-processed) खाद्य पदार्थ है और इसमें ऐसे तत्व होते हैं जो शरीर में कुछ पोषक तत्वों के अवशोषण को कम कर सकते हैं। उनके अनुसार अंडे को अब भी “गोल्ड स्टैंडर्ड प्रोटीन” माना जाता है और उसका पूर्ण विकल्प उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने इस्कॉन और कुछ अन्य संस्थाओं द्वारा प्याज और लहसुन को “तामसिक” बताकर भोजन से हटाने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि यह वैज्ञानिक नहीं बल्कि धार्मिक मान्यताओं पर आधारित निर्णय है। उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि प्याज और लहसुन आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद करते हैं।

सिल्विया कार्पगम के अनुसार भारत में मिड-डे मील योजना का उद्देश्य बच्चों में कुपोषण कम करना और स्कूलों में उनकी नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करना है। ऐसे में किसी विशेष समुदाय की खान-पान संबंधी मान्यताओं को सभी बच्चों पर थोपना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि अधिकांश सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और मुस्लिम समुदायों से आते हैं, जिनकी पारंपरिक भोजन संस्कृति में अंडे और अन्य पशु-आधारित खाद्य पदार्थ शामिल रहे हैं।

उन्होंने केंद्रीकृत रसोई व्यवस्था (Centralised Kitchen) पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर महिलाओं द्वारा स्कूल में ताजा भोजन तैयार करने की व्यवस्था अधिक प्रभावी और सामाजिक रूप से समावेशी थी। बड़े केंद्रीकृत किचनों से आने वाला भोजन कई बार बच्चों तक ठंडा और कम गुणवत्ता वाला पहुंचता है।

डॉ. कार्पगम ने कहा कि मिड-डे मील कोई दान या सेवा नहीं, बल्कि बच्चों का कानूनी अधिकार है। यदि सरकार किसी धार्मिक संस्था को यह जिम्मेदारी देती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भोजन का मेन्यू वैज्ञानिक पोषण मानकों पर आधारित हो और किसी धार्मिक विचारधारा या जातिगत सोच का प्रभाव उस पर न पड़े।

उन्होंने अंत में कहा कि बच्चों के भोजन का फैसला विज्ञान, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के आधार पर होना चाहिए। उनके शब्दों में, “किसी एक छोटे समूह की भोजन संबंधी पसंद को समाज के गरीब और वंचित बच्चों पर थोपना राज्य प्रायोजित भेदभाव है।”

हालांकि, इस्कॉन और अन्य संबंधित संस्थाएं पहले भी यह कहती रही हैं कि वे स्वच्छ, पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराती हैं तथा उनका उद्देश्य केवल बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना है। इस मुद्दे पर अलग-अलग पक्षों के बीच बहस जारी है।

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