राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026
केंद्र सरकार की नई EPF (कर्मचारी भविष्य निधि) योजना 2026 को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। कर्मचारी संगठनों और श्रमिक संगठनों का आरोप है कि नई व्यवस्था से भविष्य में कंपनियों का PF योगदान घट सकता है, जिससे करोड़ों कर्मचारियों की रिटायरमेंट बचत प्रभावित होने की आशंका है। इस विवाद के बीच विपक्ष और सोशल मीडिया पर यह मुद्दा भी उठाया जा रहा है कि 2004 में तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने नई नियुक्तियों के लिए पुरानी पेंशन व्यवस्था समाप्त की थी और अब मोदी सरकार की नई EPF व्यवस्था कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा को और कमजोर कर सकती है।
सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि नई व्यवस्था के तहत कंपनियां कर्मचारियों के भविष्य निधि (PF) में अधिकतम 1,800 रुपये प्रति माह ही योगदान देंगी। पोस्ट में कहा गया है कि पहले कर्मचारी के वास्तविक वेतन के आधार पर कंपनी भी बराबर योगदान देती थी, लेकिन अब नियोक्ता अधिकतम 1,800 रुपये ही जमा करेगा। आलोचकों का कहना है कि इससे निजी क्षेत्र में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों को भविष्य में कम PF मिलेगा और उनकी वृद्धावस्था की आर्थिक सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, सरकार का पक्ष इससे अलग है। सरकार के अनुसार नई EPF व्यवस्था में 15,000 रुपये की वैधानिक वेतन सीमा पर 12 प्रतिशत यानी 1,800 रुपये का न्यूनतम अनिवार्य नियोक्ता योगदान निर्धारित किया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी कंपनियां केवल 1,800 रुपये ही जमा करेंगी। यदि कोई कंपनी अपने कर्मचारियों के वास्तविक वेतन के आधार पर अधिक PF जमा करना चाहती है, तो वह ऐसा कर सकती है।
यही बिंदु विवाद का केंद्र बन गया है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि कई निजी कंपनियां अब कानूनी न्यूनतम सीमा का सहारा लेकर अपना योगदान घटा सकती हैं। यदि ऐसा हुआ तो कर्मचारियों के PF खाते में पहले की तुलना में कम राशि जमा होगी और लंबे समय में उनकी रिटायरमेंट बचत कम हो सकती है।
विपक्षी दल और श्रमिक संगठन इसे कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बता रहे हैं। उनका कहना है कि पहले पुरानी पेंशन व्यवस्था समाप्त हुई और अब यदि कंपनियां न्यूनतम PF योगदान तक सीमित हो जाती हैं, तो नौकरीपेशा वर्ग की आर्थिक सुरक्षा पर दोहरा असर पड़ेगा।
दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था का उद्देश्य EPF प्रणाली को अधिक सरल और व्यवस्थित बनाना है। सरकार के अनुसार कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक भविष्य निधि (VPF) का विकल्प पहले की तरह उपलब्ध रहेगा और कर्मचारियों के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस नीति का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि निजी कंपनियां भविष्य में किस प्रकार की PF नीति अपनाती हैं। यदि वे न्यूनतम वैधानिक योगदान तक सीमित रहती हैं, तो कर्मचारियों की भविष्य निधि पर असर पड़ सकता है। वहीं यदि कंपनियां पहले की तरह वास्तविक वेतन के आधार पर योगदान जारी रखती हैं, तो कर्मचारियों की बचत पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा।
फिलहाल नई EPF व्यवस्था को लेकर बहस जारी है। कर्मचारी संगठन आशंकाएं जता रहे हैं, जबकि सरकार इन आशंकाओं को खारिज कर रही है। आने वाले समय में इसका वास्तविक असर कंपनियों के व्यवहार और लागू होने वाली व्यवस्थाओं से स्पष्ट होगा।



