राजनीति / अर्थव्यवस्था / ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | रायबरेली / नई दिल्ली | 19 मई 2026
गिरता रुपया, बढ़ती महंगाई और जनता के मन का डर
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक बार फिर मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर बड़ा हमला बोला है। रायबरेली दौरे के दौरान राहुल गांधी ने दावा किया कि देश तेजी से एक बड़े आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है और आने वाले समय में उसकी सबसे बड़ी मार आम जनता, युवाओं, किसानों, मजदूरों और छोटे कारोबारियों पर पड़ेगी। राहुल गांधी ने कहा कि “आर्थिक तूफान” आने वाला है, लेकिन इस संकट से बड़े उद्योगपति बच जाएंगे जबकि आम लोग तबाह हो जाएंगे। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच चुका है, पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं, महंगाई को लेकर चिंता बढ़ रही है और वैश्विक तेल संकट का असर भारतीय बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। राहुल गांधी ने मोदी सरकार के आर्थिक मॉडल पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश की पूरी व्यवस्था कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में खड़ी कर दी गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि “अडानी-अंबानी मॉडल” पर आधारित अर्थव्यवस्था टिकाऊ नहीं है और उसका बोझ अंततः आम जनता पर पड़ेगा। राहुल गांधी ने कहा कि जब संकट आएगा तो बड़े उद्योगपति अपने महलों में सुरक्षित बैठे रहेंगे, लेकिन बेरोजगार युवा, छोटे दुकानदार, किसान और मजदूर इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाएंगे। उन्होंने उत्तर प्रदेश के युवाओं का विशेष रूप से जिक्र करते हुए कहा कि आने वाला झटका पिछले कई वर्षों के किसी भी आर्थिक संकट से बड़ा हो सकता है।
दरअसल, राहुल गांधी का यह हमला केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं माना जा रहा, बल्कि मौजूदा आर्थिक हालात के संदर्भ में देखा जा रहा है। हाल के दिनों में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड स्तर तक गिर चुका है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। ईरान-इजरायल तनाव और होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर संकट ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर बना दिया है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक सप्ताह के भीतर दूसरी बार बढ़ोतरी हो चुकी है। ऐसे में विपक्ष सरकार पर सवाल उठा रहा है कि आखिर आर्थिक संकट की कीमत हमेशा आम आदमी ही क्यों चुकाता है।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि सरकार ठोस आर्थिक कदम उठाने की बजाय लोगों को “विदेश यात्रा कम करने” और “सावधानी बरतने” की सलाह दे रही है, जबकि खुद प्रधानमंत्री लगातार विदेश दौरों पर हैं। यह बयान सीधे उस अपील पर हमला माना जा रहा है जिसमें सरकार ने ऊर्जा बचत, सीमित खर्च और कुछ उपभोग संबंधी संयम की बात कही थी। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार आर्थिक चुनौतियों का समाधान ढूंढने की बजाय जनता पर “त्याग” का बोझ डाल रही है।
कांग्रेस अब इस पूरे आर्थिक मुद्दे को राजनीतिक रूप से बड़े नैरेटिव में बदलने की कोशिश कर रही है। पार्टी लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सरकार की आर्थिक नीतियां “कॉरपोरेट केंद्रीकृत विकास मॉडल” पर आधारित हैं, जिसमें पूंजी और संसाधनों का लाभ कुछ बड़े समूहों तक सीमित हो रहा है जबकि आम जनता महंगाई, बेरोजगारी और असुरक्षा से जूझ रही है। राहुल गांधी पहले भी “क्रोनी कैपिटलिज्म” और “दो उद्योगपतियों की सरकार” जैसे आरोप लगाते रहे हैं। अब उन्होंने “आर्थिक तूफान” शब्द का इस्तेमाल कर इस बहस को और तीखा बना दिया है।
हालांकि बीजेपी और सरकार इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करती रही है। सरकार का दावा है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, विदेशी निवेश लगातार आ रहा है, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास रिकॉर्ड स्तर पर हो रहा है और वैश्विक संकटों के बावजूद भारत अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में खड़ा है। सरकार यह भी कहती है कि विपक्ष देश की आर्थिक उपलब्धियों को नजरअंदाज कर केवल भय का माहौल बनाना चाहता है।
लेकिन जमीनी स्तर पर जनता की चिंता अलग है। रोजमर्रा की जिंदगी में महंगाई सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनती जा रही है। रसोई गैस, ईंधन, परिवहन और जरूरी सामानों की कीमतें सीधे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों को प्रभावित कर रही हैं। बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी घटनाओं ने युवाओं में असुरक्षा और गुस्से को और बढ़ाया है। ऐसे माहौल में राहुल गांधी का बयान केवल विपक्षी हमला नहीं बल्कि उस व्यापक बेचैनी को भी प्रतिबिंबित करता है जो समाज के एक हिस्से में महसूस की जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्था भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकती है। अगर तेल संकट और वैश्विक अस्थिरता बनी रहती है, तो महंगाई और वित्तीय दबाव और बढ़ सकते हैं। ऐसे में विपक्ष सरकार को “कॉरपोरेट समर्थक” और “जनविरोधी आर्थिक मॉडल” के मुद्दे पर घेरने की कोशिश करेगा, जबकि सरकार विकास, निवेश और वैश्विक नेतृत्व की अपनी कहानी को आगे बढ़ाएगी।
फिलहाल राहुल गांधी का “आर्थिक तूफान” वाला बयान राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ चुका है। अब बड़ा सवाल यही है — क्या भारत वास्तव में किसी बड़े आर्थिक दबाव की ओर बढ़ रहा है, या फिर यह विपक्ष का राजनीतिक नैरेटिव है? लेकिन इतना तय है कि अगर महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा बढ़ती रही, तो आने वाले समय में यह मुद्दा सिर्फ अर्थशास्त्र का नहीं बल्कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बन सकता है।




