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न्यायपालिका को डराने की कोशिश — जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के महाभियोग प्रस्ताव की पूर्व जजों ने कड़ी निंदा की

एबीसी डेस्क 12 दिसंबर 2025

देश में न्यायपालिका को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जहां सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई पूर्व न्यायाधीशों ने मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव की खुलकर आलोचना की है। सेवानिवृत्त जजों के इस समूह का कहना है कि महाभियोग जैसे गंभीर संवैधानिक प्रावधान का इस्तेमाल किसी जज के फैसले से असहमति या राजनीतिक मतभेद के आधार पर नहीं किया जा सकता। उनका कहना है कि यह कदम सीधे-सीधे न्यायपालिका पर दबाव बनाने और उसे डराने की कोशिश है, जिससे पूरी न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचेगा। पूर्व जजों के अनुसार, अगर सांसद इस तरह के प्रस्ताव आसानी से लाते रहेंगे, तो यह गलत परंपरा बन जाएगी और भविष्य में कोई भी जज निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से फैसले लेने में झिझक महसूस करेगा।

पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं, वे महाभियोग की आवश्यक कसौटियों पर खरे नहीं उतरते। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि किसी जज के फैसले से असहमति होना बिलकुल अलग बात है, और उसके लिए न्यायिक समीक्षा और अपील की प्रक्रिया मौजूद है। लेकिन महाभियोग का इस्तेमाल केवल उन मामलों में होना चाहिए, जहां जज के खिलाफ बेहद गंभीर, तथ्यात्मक और सिद्ध आरोप हों। इसलिए इस पहल को वे एक खतरनाक मिसाल बता रहे हैं, जो विधायी और न्यायिक संस्थाओं के बीच टकराव पैदा कर सकती है।

इस मामले ने राजनीतिक हलकों में भी बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों के कुछ सांसदों ने दावा किया है कि जस्टिस स्वामीनाथन के कुछ फैसले विवादास्पद और पक्षपाती रहे हैं, इसीलिए महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है। लेकिन पूर्व जजों का कहना है कि यह तर्क कमजोर है और इसमें कानूनी मजबूती की कमी है। उनका कहना है कि महाभियोग नोटिस पेश करना सिर्फ एक तरफा कार्रवाई नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके पीछे ठोस कारण और न्यायिक सिद्धांत होने जरूरी हैं। नहीं तो यह न्यायपालिका के खिलाफ राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल हो सकता है।

पूर्व न्यायाधीशों ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका लोकतंत्र का एक अहम स्तंभ है और उसकी स्वतंत्रता को किसी भी हाल में कमज़ोर नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की पहलें जारी रहीं, तो इससे देश की न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कमजोर होगा और आने वाले समय में न्यायिक संस्थाएं राजनीतिक दबाव का शिकार हो सकती हैं। उनके मुताबिक, यह वक्त है जब सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को यह समझना चाहिए कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

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