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अमित शाह का तीन करोड़ घुसपैठियों वाला दावा, आंकड़ों ने खड़े किए गंभीर सवाल!

छह राज्यों में SIR पूरा होने के बाद करीब 9.86 करोड़ मतदाताओं के बीच मिले लगभग 1,640 संदिग्ध विदेशी नागरिक। निर्वाचन आयोग के पास भी नहीं है विदेशी नागरिकों की पहचान का कोई समेकित आंकड़ा। फिर तीन करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठियों का दावा किस आधार पर? क्या मतदाता सूची से नाम कटना ही किसी को विदेशी घोषित करने का प्रमाण है?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 नवंबर 2026

देश के गृह मंत्री अमित शाह ने SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर ऐसा दावा किया है, जिसने देश की राजनीति में एक बार फिर नागरिकता, घुसपैठ और मतदाता अधिकारों की बहस को तेज कर दिया है। शाह का कहना है कि SIR के दौरान करीब तीन करोड़ ऐसे लोगों की पहचान हुई है, जिनका कोई अता-पता नहीं है और जो कथित तौर पर बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं। लेकिन गृह मंत्री के इस दावे के सामने अब उपलब्ध आंकड़े कई असहज सवाल खड़े कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की 29 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, छह राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद लगभग 9.86 करोड़ मतदाताओं के बीच करीब 1,640 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान हुई। यह आंकड़ा अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि तीन करोड़ घुसपैठियों के दावे के मुकाबले उपलब्ध आधिकारिक जानकारी का पैमाना बिल्कुल अलग दिखाई देता है। सवाल यह नहीं है कि देश में अवैध घुसपैठ की समस्या है या नहीं। सवाल यह है कि जब गृह मंत्री इतनी बड़ी संख्या का दावा कर रहे हैं, तो उसके समर्थन में प्रमाण कहां हैं? तीन करोड़ लोगों को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताने का आधार क्या है और क्या इन सभी की नागरिकता की विधिवत जांच की गई है?

तीन करोड़ का आंकड़ा कहां से आया?

अमित शाह ने अपने बयान में मतदाता सूची से हटाए गए नामों का वर्गीकरण करते हुए कहा कि लगभग 6.15 करोड़ मतदाता दूसरी जगह स्थानांतरित हो चुके हैं, करीब 2.8 से 3 करोड़ लोगों की मृत्यु हो चुकी है, लगभग एक करोड़ नाम दोहरी प्रविष्टियों के हैं और शेष करीब तीन करोड़ ऐसे लोग हैं, जिनका कोई अस्तित्व या पता नहीं है। इसी अंतिम श्रेणी को उन्होंने घुसपैठियों से जोड़ दिया। लेकिन यहां बुनियादी तथ्य को समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति का अपने पते पर नहीं मिलना, उसका दूसरी जगह स्थानांतरित होना, निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाना और उसका विदेशी नागरिक होना बिल्कुल अलग-अलग स्थितियां हैं। किसी मतदाता का पता नहीं मिलना अपने आप में उसकी विदेशी नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकता। मतदाता सूची के पुनरीक्षण में नाम हटाने की प्रशासनिक प्रक्रिया और किसी व्यक्ति को विदेशी नागरिक घोषित करने की कानूनी प्रक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर है। अगर तीन करोड़ लोगों को वास्तव में बांग्लादेशी घुसपैठिया पाया गया है, तो उनकी पहचान, नागरिकता की जांच और संबंधित अधिकारियों की रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए। केवल मतदाता सूची में नाम नहीं मिलने को विदेशी नागरिकता का प्रमाण मान लेना न तो तार्किक है और न ही संवैधानिक रूप से उचित।

छह राज्यों के आंकड़े और गृह मंत्री के दावे के बीच बड़ा अंतर

हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जिन 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के निर्वाचन अधिकारियों से संदिग्ध विदेशी नागरिकों की जानकारी मांगी गई थी, उनमें से 11 ने जवाब दिया और केवल छह राज्यों ने इस श्रेणी से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराए। इन छह राज्यों में कर्नाटक में 716, केरल में लगभग 500, गोवा में 419, झारखंड में तीन और मेघालय में दो संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान की गई, जबकि मिजोरम में ऐसा कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। इन आंकड़ों का कुल योग लगभग 1,640 बैठता है। इन राज्यों में मतदाताओं की कुल संख्या करीब 9.86 करोड़ बताई गई है। यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कर्नाटक में पहचाने गए 716 लोगों में से 545 नेपाली नागरिक बेंगलुरु उत्तर क्षेत्र से थे। यानी इन सभी को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। इसी तरह विदेशी नागरिकों की पहचान और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का दावा दो अलग विषय हैं। उपलब्ध आंकड़े तीन करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान की पुष्टि नहीं करते। हालांकि यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि छह राज्यों के आंकड़ों को पूरे देश की अंतिम तस्वीर नहीं माना जा सकता, क्योंकि सभी राज्यों से समान और समेकित जानकारी उपलब्ध नहीं हुई है। लेकिन जब सरकार की ओर से तीन करोड़ जैसी विशाल संख्या पेश की जा रही है, तो उसका प्रमाणित आधार सामने लाने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही है।

निर्वाचन आयोग के पास ही नहीं है समेकित आंकड़ा!

इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू निर्वाचन आयोग की भूमिका से जुड़ा है। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि आयोग ने राज्यों से संदिग्ध विदेशी नागरिकों का अलग से आंकड़ा जुटाने को नहीं कहा था। आयोग के पास इस संबंध में कोई समेकित राज्यवार आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं था। कुछ राज्यों ने यह भी बताया कि उन्होंने ऐसे मामलों का अलग रिकॉर्ड नहीं रखा है। उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से इस बात पर सवाल उठाया गया कि संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान और उनकी नागरिकता का निर्धारण चुनाव अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र का विषय किस सीमा तक है। दिल्ली के निर्वाचन कार्यालय ने भी ऐसे मामलों का अलग आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने की बात कही। अब यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब निर्वाचन आयोग के पास तीन करोड़ विदेशी नागरिकों की पहचान का कोई प्रमाणित और समेकित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, तब गृह मंत्री किस सरकारी रिपोर्ट, जांच या दस्तावेज के आधार पर यह संख्या बता रहे हैं? क्या गृह मंत्रालय ने अलग से कोई जांच कराई है? क्या राज्यों की पुलिस, खुफिया एजेंसियों या नागरिकता से जुड़े सक्षम अधिकारियों ने इन मामलों का सत्यापन किया है? यदि ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद है तो उसे देश के सामने रखा जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषय पर आंकड़ों की पारदर्शिता कोई राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही की अनिवार्य शर्त है।

SIR मतदाता सूची का पुनरीक्षण है, नागरिकता तय करने की अदालत नहीं

इस विवाद का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू भी है, जिसे राजनीतिक बयानबाजी के बीच नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करना है। इसके तहत मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों, दोहरी प्रविष्टियों और पात्रता से जुड़े मामलों की जांच की जाती है। लेकिन मतदाता सूची से नाम हटाने और किसी व्यक्ति को विदेशी नागरिक घोषित करने के अधिकार एवं प्रक्रिया में बुनियादी अंतर है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को बरकरार रखते हुए नागरिकता निर्धारण के अधिकार को लेकर निर्वाचन आयोग की सीमाओं पर भी स्पष्टता दी थी। नागरिकता का सवाल अलग कानूनी प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं होना या पुनरीक्षण के दौरान उसका पता नहीं चलना अपने आप में उसे विदेशी नागरिक घोषित करने का आधार नहीं बन सकता। यदि कोई व्यक्ति वास्तव में अवैध रूप से भारत में रह रहा है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन उसके लिए भी पहचान, प्रमाण और विधिक प्रक्रिया जरूरी है। लोकतंत्र में किसी नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रखना और अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करना दो अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। एक के नाम पर दूसरे अधिकार को कमजोर नहीं किया जा सकता।

13 करोड़ नामों का विवाद और सरकार की जवाबदेही

SIR को लेकर विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेता निर्वाचन आयोग से जवाब मांग रहे हैं। दूसरी तरफ अमित शाह का कहना है कि हटाए गए नाम मृत, स्थानांतरित, दोहरी प्रविष्टियों वाले और संदिग्ध लोगों के हैं। लेकिन दोनों पक्षों की राजनीतिक बयानबाजी से अलग एक बुनियादी सवाल मौजूद है, जिसका जवाब देश को मिलना चाहिए। कितने नाम मृत मतदाताओं के कारण हटाए गए? कितने लोग वास्तव में दूसरी जगह चले गए थे? कितने नाम दोहरी प्रविष्टियों के कारण हटाए गए? कितने मामलों में विदेशी नागरिकता का संदेह दर्ज किया गया और कितने मामलों में सक्षम प्राधिकार ने जांच के बाद विदेशी नागरिक होने की पुष्टि की? कितने ऐसे मतदाता हैं, जिन्होंने निर्धारित समय पर दस्तावेज जमा किए लेकिन तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से उनके नाम सूची में शामिल नहीं हो सके? इन सभी श्रेणियों का राज्यवार और जिला स्तर पर विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। यदि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो सरकार और निर्वाचन आयोग को आंकड़े सार्वजनिक करने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। मतदाता सूची किसी राजनीतिक दल का दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक की भागीदारी का आधार है। इसमें एक भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना गंभीर मामला है।

अमित शाह से सीधे सवाल : दावे के साथ प्रमाण भी दीजिए

गृह मंत्री अमित शाह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं। अवैध घुसपैठ निश्चित रूप से गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा है। यदि तीन करोड़ विदेशी नागरिकों ने भारतीय मतदाता सूची में जगह बना ली है, तो यह चुनावी व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी असाधारण गंभीर विफलता होगी। लेकिन इतने बड़े दावे के लिए उतने ही मजबूत प्रमाण भी जरूरी हैं। गृह मंत्री को बताना चाहिए कि इन तीन करोड़ लोगों की पहचान किस जांच के आधार पर हुई? इनमें कितने वास्तव में बांग्लादेशी नागरिक हैं और कितनों की नागरिकता की पुष्टि सक्षम अधिकारियों ने की है? क्या इन सभी के खिलाफ अलग-अलग जांच हुई है? निर्वाचन आयोग ने जब राज्यों से विदेशी नागरिकों का अलग आंकड़ा जुटाया ही नहीं, तब तीन करोड़ की संख्या किस सरकारी दस्तावेज से निकली? क्या सरकार हटाए गए मतदाताओं की श्रेणीवार जानकारी सार्वजनिक करेगी? क्या गलत तरीके से नाम हटाए जाने वाले भारतीय नागरिकों की जिम्मेदारी भी तय होगी? इन सवालों का जवाब देना किसी राजनीतिक दल पर आरोप लगाने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा राजनीतिक भाषणों में इस्तेमाल करने के बजाय प्रमाणों और कार्रवाई के आधार पर प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

ABC NATIONAL NEWS का संपादकीय दृष्टिकोण

अमित शाह देश के गृह मंत्री हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह नागरिकता, घुसपैठ और चुनावी व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषयों पर पूरी जिम्मेदारी और प्रमाणिकता के साथ बात करें। तीन करोड़ घुसपैठियों का दावा कोई सामान्य राजनीतिक बयान नहीं है। यह तीन करोड़ लोगों की नागरिकता, पहचान और देश की चुनावी व्यवस्था पर गंभीर आरोप है। यदि सरकार के पास इसके प्रमाण हैं तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए, जांच का विवरण सामने आना चाहिए और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि इस संख्या के समर्थन में प्रमाणित तथ्य उपलब्ध नहीं हैं तो करोड़ों लोगों को घुसपैठिया बताकर राजनीतिक माहौल बनाना भी उतना ही गैर-जिम्मेदाराना है। छह राज्यों में लगभग 9.86 करोड़ मतदाताओं के बीच करीब 1,640 संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान के आंकड़े और गृह मंत्री के तीन करोड़ के दावे के बीच जो भारी अंतर दिखाई देता है, उसका जवाब आंकड़ों से ही मिलना चाहिए, भाषणों से नहीं।

देश को अवैध घुसपैठ के खिलाफ सख्त कार्रवाई चाहिए, लेकिन उतनी ही मजबूती से मतदाताओं के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा भी चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी केवल घुसपैठियों की पहचान करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि किसी भारतीय नागरिक को बिना प्रमाण विदेशी घोषित न कर दिया जाए और किसी पात्र मतदाता को उसका मताधिकार न खोना पड़े। लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना देशविरोधी गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का बुनियादी हिस्सा है। अमित शाह को विपक्ष को जवाब देने से पहले देश को अपने दावे का प्रमाण देना चाहिए। आखिर तीन करोड़ का आंकड़ा केवल एक राजनीतिक भाषण का हिस्सा नहीं हो सकता; उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है।

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