बिहार | ABC NATIONAL NEWS | पटना | 1 नवंबर 2026
बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीते राहुल राज ने 31 अक्टूबर को पटना स्थित बीजेपी कार्यालय में पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने की घोषणा की। दोनों नेताओं ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में विश्वास जताया। अब राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने संविधान की दसवीं अनुसूची का हवाला देते हुए दोनों की विधान परिषद सदस्यता समाप्त करने की मांग की है।
तेजस्वी यादव का कहना है कि दोनों नेता स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर विधान परिषद पहुंचे और उसके बाद बीजेपी में शामिल हो गए। संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) में स्पष्ट प्रावधान है कि राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव न लड़कर निर्वाचित हुआ कोई सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है।
संविधान की दसवीं अनुसूची क्या कहती है?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची का पैरा 2(2) निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों के दल में शामिल होने के मामले को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। इसमें कहा गया है कि किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित नहीं हुआ सदस्य यदि चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्यता का पात्र होगा।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। दसवीं अनुसूची के पैरा 2(3) में छह महीने का प्रावधान नामित सदस्यों के लिए है, जबकि पैरा 2(2) निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों पर लागू होता है। इसलिए निर्दलीय सदस्यों को चुनाव के बाद 15 दिन के भीतर पार्टी में शामिल होने की कोई सामान्य संवैधानिक छूट इस प्रावधान में नहीं दी गई है।
राहुल राज ने मीडिया से बातचीत में दावा किया था कि चुनाव के 15 दिनों के भीतर पार्टी की सदस्यता लेने पर निर्दलीय विधान पार्षद को पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार माना जा सकता है। लेकिन संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) में ऐसी कोई 15 दिन की छूट दर्ज नहीं है।
अयोग्यता पर फैसला कौन करेगा?
संविधान के अनुच्छेद 191(2) के अनुसार, दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित व्यक्ति राज्य विधानमंडल का सदस्य बने रहने का पात्र नहीं होता। वहीं, दसवीं अनुसूची के पैरा 6(1) के तहत दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के सवाल पर संबंधित सदन के सभापति को निर्णय लेना होता है।
इसलिए दोनों नेताओं की सदस्यता समाप्त होने का अंतिम निर्णय विधान परिषद के सभापति को करना होगा। तेजस्वी यादव की मांग है कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार बिना अनावश्यक विलंब के अयोग्यता की कार्यवाही पूरी की जाए।
राजू सिंह का मामला उठाकर बीजेपी पर दोहरे मापदंड का आरोप
तेजस्वी यादव ने बीजेपी पर संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने साहेबगंज से बीजेपी विधायक राजू कुमार सिंह का मामला उठाया, जिन्हें 2018 में दिल्ली में हुई जश्न के दौरान गोली चलने से एक महिला की मौत के मामले में चार साल की सजा सुनाई गई थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाई, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद बिहार विधानसभा में उनकी सदस्यता समाप्त होने और सीट रिक्त घोषित होने को लेकर देरी पर सवाल उठ रहे हैं। CPI(ML) Liberation ने भी इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष और मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को पत्र लिखकर सदस्यता समाप्त करने की मांग की है।
तेजस्वी का सवाल है कि जब सत्ता पक्ष के नेताओं के मामलों में संवैधानिक कार्रवाई लंबित रहती है, तब विपक्षी दलों के नेताओं और विधायकों के मामले में अलग-अलग रवैया क्यों अपनाया जाता है? उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी जब विपक्षी विधायकों को अपने पाले में लाती है, तब दल-बदल कानून की याद नहीं आती, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए कानून की व्याख्या बदल दी जाती है।
संविधान पर सियासी घमासान
तेजस्वी यादव ने बीजेपी और आरएसएस पर संविधान तथा लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कहा कि कानून का इस्तेमाल राजनीतिक सुविधा के हिसाब से नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि यदि निर्दलीय निर्वाचित सदस्य पार्टी में शामिल होते हैं तो संविधान में लिखे प्रावधानों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
इस पूरे मामले में अब बिहार विधान परिषद के सभापति की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। दोनों नेताओं की सदस्यता को लेकर औपचारिक अयोग्यता याचिका और उस पर सभापति का निर्णय आगे की संवैधानिक स्थिति तय करेगा।
बिहार की राजनीति में अब सवाल केवल दो विधान पार्षदों के बीजेपी में शामिल होने का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या दल-बदल विरोधी कानून सत्ता और विपक्ष, दोनों पर समान रूप से लागू होगा? संविधान की दसवीं अनुसूची में प्रावधान स्पष्ट है; अब निगाहें इस बात पर हैं कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग उसे किस तरह लागू करते हैं। सत्ता बदल सकती है, बहुमत बदल सकता है, लेकिन संविधान के नियम सत्ता की सुविधा से नहीं बदल सकते।


