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पोलैंड में सत्ता संघर्ष तेज, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आमने-सामने; 2027 चुनाव पर संकट का असर

संवैधानिक न्यायाधिकरण के नेतृत्व और न्यायाधीशों की नियुक्ति पर टस्क सरकार व राष्ट्रपति नवरोत्स्की में टकराव; राष्ट्रपति ने सेनेगल की यात्रा बीच में छोड़ी, वारसॉ में प्रदर्शन और गिरफ्तारियां

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वारसॉ | 1 नवंबर 2026

पोलैंड में प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क और राष्ट्रपति कारोल नवरोत्स्की के बीच संवैधानिक न्यायाधिकरण के नियंत्रण को लेकर गंभीर टकराव पैदा हो गया है। विवाद इतना बढ़ा कि राष्ट्रपति ने सेनेगल की यात्रा बीच में ही रद्द कर दी और स्पेन के हवाई क्षेत्र से अपना विमान वापस पोलैंड लौटाने का आदेश दिया। वारसॉ में न्यायाधिकरण परिसर के बाहर प्रदर्शन हुए और पुलिस को सुरक्षा व्यवस्था संभालनी पड़ी।

यह संघर्ष केवल दो शीर्ष नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद नहीं है। इसके केंद्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायाधीशों की नियुक्ति और राष्ट्रपति तथा संसद के संवैधानिक अधिकारों का सवाल है।

न्यायाधिकरण के नेतृत्व पर विवाद

संवैधानिक न्यायाधिकरण की न्यायाधीश अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने अध्यक्ष बोगदान श्वेंचकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तोमिए सोखांस्की को उनके कर्तव्यों से अलग करने की कार्रवाई की। इस कदम को लेकर न्यायाधिकरण के भीतर ही मतभेद सामने आ गए। श्वेंचकोव्स्की ने कार्रवाई की वैधता को चुनौती दी और अपने पद पर बने रहने का दावा किया।

राष्ट्रपति नवरोत्स्की ने सरकार की कार्रवाई को देश की शीर्ष संवैधानिक संस्था पर जबरन कब्जा करने की कोशिश बताया। इसके विपरीत, टस्क सरकार का कहना है कि न्यायाधिकरण में लंबे समय से चले आ रहे विवाद और नियुक्तियों की अनियमितताओं को ठीक करना जरूरी है।

विवाद की शुरुआत 2015 में हुई

पोलैंड में न्यायपालिका को लेकर मौजूदा संघर्ष की जड़ 2015 में है। उस समय संसद ने संवैधानिक न्यायाधिकरण के पांच न्यायाधीश चुने थे। सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार ने पांच अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति कर दी। न्यायाधिकरण ने पहले चुने गए तीन न्यायाधीशों की नियुक्ति को वैध और दो की नियुक्ति को अवैध माना था। इसके बावजूद तत्कालीन राष्ट्रपति आंद्रेज डूडा ने पहले चुने गए तीन न्यायाधीशों को शपथ नहीं दिलाई और नई नियुक्तियों को स्वीकार कर लिया।

इसके बाद न्यायाधिकरण की संरचना और स्वतंत्रता को लेकर विवाद लगातार बढ़ता गया। यूरोपीय संघ ने भी पोलैंड की न्यायिक व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चिंता जताई।

टस्क सरकार के सुधार और राष्ट्रपति की आपत्ति

2023 में डोनाल्ड टस्क के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सत्ता संभाली। उसने पिछली सरकार के दौरान किए गए न्यायिक बदलावों को पलटने और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बहाल करने का वादा किया।

लेकिन 2025 में कारोल नवरोत्स्की के राष्ट्रपति बनने के बाद टकराव और बढ़ गया। नवरोत्स्की को लॉ एंड जस्टिस पार्टी (PiS) का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने संसद द्वारा चुने गए कई न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पूरी नहीं की। संसद ने 2026 में छह न्यायाधीश चुने, लेकिन राष्ट्रपति की मंजूरी न मिलने से उनकी भूमिका को लेकर विवाद बना रहा।

सितंबर 2026 में संसद ने मैचेय बेरेक को भी न्यायाधिकरण में नियुक्त किया। वह पहले टस्क सरकार में मंत्री रह चुके थे। इस नियुक्ति पर सरकार के गठबंधन के भीतर भी सवाल उठे। आलोचकों ने इसे न्यायपालिका में राजनीतिक प्रभाव की आशंका से जोड़ा।

प्रदर्शन और गिरफ्तारियां

न्यायाधिकरण के बाहर प्रदर्शनकारियों की भीड़ जमा हुई। पुलिस ने परिसर के आसपास सुरक्षा बढ़ाई। कुछ लोगों ने सुरक्षा घेरा पार करने की कोशिश की, जिसके बाद तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया। PiS ने सरकार की कार्रवाई को सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश बताया, जबकि टस्क समर्थक इसे न्यायिक व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया मान रहे हैं।

3 नवंबर की बैठक पर नजर

संवैधानिक न्यायाधिकरण के न्यायाधीशों की अगली आम बैठक 3 नवंबर को प्रस्तावित है। इस बैठक में न्यायाधिकरण के कामकाज और नेतृत्व से जुड़े विवाद पर आगे की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। फिलहाल संस्था के भीतर अधिकारों को लेकर जारी असहमति उसके फैसलों की वैधता और विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर रही है।

2027 के चुनाव में किसे मिलेगा फायदा?

वारसॉ स्थित बॉयम इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और पोलिश विशेषज्ञ क्रिज़िस्तोफ़ मार्सिन ज़ालेव्स्की के मुताबिक, यह संकट प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क के लिए राजनीतिक अवसर भी बन सकता है और उनके खिलाफ भी जा सकता है। राष्ट्रपति नवरोत्स्की की राजनीतिक स्थिति पर भी इसका असर पड़ेगा।

टस्क इसे पिछली सरकार के दौर में न्यायपालिका पर हुए राजनीतिक हस्तक्षेप को समाप्त करने की लड़ाई के रूप में पेश कर सकते हैं। वहीं, राष्ट्रपति और PiS इसे सरकार की ओर से संवैधानिक संस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश बताकर जनता के बीच अपना पक्ष मजबूत कर सकते हैं।

2027 के चुनाव से पहले पोलैंड की राजनीति में यह संघर्ष निर्णायक बन सकता है। इसका नतीजा केवल सत्ता के समीकरण नहीं, बल्कि देश की न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को भी प्रभावित करेगा।

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