ओपिनियन | पार्थ सिंह और श्रीमार्थ जी (क्राइस्ट यूनिवर्सिटी, दिल्ली एनसीआर) | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
सीमा विवाद सिर्फ जमीन का सवाल नहीं
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को हम अक्सर नक्शे, जमीन और सैनिकों की तैनाती के सवाल तक सीमित कर देते हैं। लेकिन असल में यह विवाद इससे कहीं बड़ा है। इसके पीछे इतिहास है, औपनिवेशिक दौर की विरासत है, सुरक्षा की चिंता है, कूटनीति है, व्यापार है, सैन्य शक्ति है और सबसे बढ़कर एशिया में बदलती हुई ताकतों की कहानी है। 2020 के गलवान संकट ने दोनों देशों के रिश्तों को जिस गहराई से प्रभावित किया, उसने एक बात साफ कर दी कि चीन के साथ भारत अब पुराने तरीके से संबंध नहीं चला सकता। लेकिन दूसरी तरफ 2024 में पूर्वी लद्दाख में सैनिकों की पेट्रोलिंग और तनाव कम करने को लेकर हुआ समझौता यह भी बताता है कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता। भारत के लिए असली चुनौती यही है—चीन के सामने मजबूती से खड़ा भी रहना है और चीन से बातचीत भी करते रहना है। दोनों में से किसी एक को चुनना भारत के हित में नहीं होगा।
2024 का समझौता राहत है, अंतिम समाधान नहीं
पूर्वी लद्दाख में अक्टूबर 2024 का समझौता कई वर्षों से चले आ रहे तनाव के बाद एक महत्वपूर्ण राहत लेकर आया। इससे उन इलाकों में पेट्रोलिंग को फिर से शुरू करने का रास्ता खुला, जहां लंबे समय से दोनों देशों की सेनाओं के बीच गतिरोध बना हुआ था। उसी समय कज़ान में हुए BRICS सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने भी यह संकेत दिया कि दोनों देश अपने रिश्तों में तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यहां उत्साह से ज्यादा सावधानी की जरूरत है। सीमा पर तनाव कम होना और सीमा विवाद का समाधान होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। सैनिकों के पीछे हटने या पेट्रोलिंग की व्यवस्था बनने का मतलब यह नहीं कि सीमा का मूल विवाद समाप्त हो गया। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि दोनों देशों ने टकराव के बीच संवाद के लिए थोड़ी जगह बनाई है। भारत को इस जगह का इस्तेमाल अपनी सुरक्षा कमजोर करके नहीं, बल्कि अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करते हुए करना चाहिए।
क्या हमारी सीमा की कहानी अंग्रेजों के बनाए नक्शों से शुरू होती है?
भारत-चीन सीमा विवाद को समझने के लिए इतिहास में पीछे जाना जरूरी है, लेकिन इतिहास को समझने का मतलब यह नहीं कि आज की हर रणनीति को सौ साल पुराने नक्शों का गुलाम बना दिया जाए। ब्रिटिश भारत ने अपनी उत्तरी सीमाओं को एक दिन में तय नहीं किया था। अलग-अलग समय पर अलग-अलग नक्शे बने, अलग-अलग प्रस्ताव सामने आए और ब्रिटिश सरकार ने अपने साम्राज्यवादी हितों के अनुसार सीमाओं को लेकर अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं। कई मामलों में ब्रिटिश अधिकारियों के बीच भी इस बात पर सहमति नहीं थी कि सीमा को किस तरह तय किया जाए और किस हद तक लागू किया जाए। यानी जिस सीमा को आज कई बार एक बिल्कुल स्पष्ट और अंतिम ऐतिहासिक सच्चाई के रूप में पेश किया जाता है, उसके पीछे खुद औपनिवेशिक दौर की काफी जटिल कहानी है।
इतिहासकार ए.जी. नूरानी के शोध में ब्रिटिश दस्तावेजों और उस समय के प्रशासनिक फैसलों के आधार पर इस जटिलता की ओर ध्यान दिलाया गया है। इतिहासकार श्रीनाथ राघवन के अध्ययन में भी सीमा को केवल एक तैयार नक्शे के रूप में नहीं, बल्कि बदलती रणनीति और बातचीत की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि भारत को अपने मौजूदा सीमा दावों से पीछे हट जाना चाहिए। इसका अर्थ केवल इतना है कि भारत को अपने इतिहास की पूरी तस्वीर समझनी चाहिए। क्योंकि जो देश अपने इतिहास को समझता है, वही वर्तमान में बेहतर रणनीति बना सकता है। लेकिन जो देश इतिहास को ही अपनी रणनीति का अंतिम आधार बना लेता है, वह बदलती दुनिया में पीछे भी रह सकता है।
मैकमोहन लाइन की कहानी भी इतनी सीधी नहीं
मैकमोहन लाइन भारत-चीन सीमा विवाद के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है। 1914 की शिमला प्रक्रिया और उससे जुड़ी सीमा व्यवस्था ने आगे चलकर भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को गहरा राजनीतिक और कूटनीतिक मुद्दा बना दिया। भारत इसे अपनी सीमा व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखता है, जबकि चीन ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए उस समय की औपनिवेशिक राजनीति, तिब्बत की स्थिति और ब्रिटिश साम्राज्य की रणनीतिक सोच को भी समझना पड़ता है।
यहीं से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक निकलता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल कानून की किताबों और पुराने दस्तावेजों से नहीं चलती। कानून महत्वपूर्ण है, इतिहास महत्वपूर्ण है, लेकिन ताकत, कूटनीति, रणनीतिक स्थिति और बदलती परिस्थितियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भारत को अपने सीमा दावों की मजबूती बनाए रखते हुए यह भी समझना होगा कि चीन इस विवाद को किस नजर से देखता है और वह आने वाले वर्षों में किस तरह की रणनीति अपना सकता है। इतिहास को समझना आत्मसमर्पण नहीं है। बल्कि इतिहास की जटिलता को समझना अपनी रणनीति को और मजबूत करना है।
चीन से बात करना कमजोरी नहीं, समझदारी है
भारत में कई बार यह धारणा दिखाई देती है कि चीन से बातचीत करना कमजोरी का संकेत है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अनुभव इसके उलट कहानी बताता है। मजबूत देश अपने विरोधी से बातचीत करने से डरता नहीं। वास्तव में जब दो देशों के बीच भरोसा कम हो और तनाव ज्यादा हो, तब बातचीत और भी जरूरी हो जाती है। 2020 के बाद भारत और चीन के बीच सैन्य तथा कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के कई दौर जारी रहे। यही संवाद दोनों पक्षों को एक-दूसरे के इरादों को समझने और गलतफहमी को खतरनाक स्तर तक पहुंचने से रोकने में मदद करता रहा।
दोनों देश परमाणु शक्ति हैं। दोनों बड़ी सेनाएं रखते हैं। दोनों एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं और दोनों की सीमा दुनिया के सबसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में से एक में मिलती है। ऐसी स्थिति में बातचीत का रास्ता बंद करना कोई बहादुरी नहीं होगी। बातचीत का अर्थ यह नहीं कि भारत चीन की हर बात मान ले। बातचीत का अर्थ है—अपने हितों की रक्षा करते हुए दूसरे पक्ष की सोच को समझना, अपनी स्थिति स्पष्ट करना और टकराव को नियंत्रण से बाहर जाने से रोकना। किसी प्रतिद्वंद्वी से बात करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का संकेत हो सकता है।
लेकिन सिर्फ बातचीत से चीन नहीं बदलेगा
यहां दूसरी सच्चाई को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। केवल बातचीत के भरोसे चीन की चुनौती का सामना नहीं किया जा सकता। चीन सैन्य, आर्थिक, तकनीकी और औद्योगिक ताकत के मामले में दुनिया की बड़ी शक्तियों में शामिल है। उसने अपनी सीमाओं और रणनीतिक क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे पर भारी निवेश किया है। इसलिए भारत के लिए सीमा पर मजबूत सड़कें, पुल, सुरंगें, हवाई पट्टियां, संचार व्यवस्था, निगरानी तकनीक और सैन्य सुविधाएं केवल विकास परियोजनाएं नहीं हैं। ये राष्ट्रीय सुरक्षा की बुनियादी जरूरत हैं।
लेकिन हमें यह गलती भी नहीं करनी चाहिए कि सड़क और सुरंग को ही पूरी रणनीति मान लिया जाए। असली ताकत तब पैदा होती है जब सेना, खुफिया एजेंसियां, विदेश मंत्रालय, रणनीतिक विशेषज्ञ और राजनीतिक नेतृत्व एक ही दिशा में काम करें। अगर सीमा पर सेना की तैयारी कुछ और हो, राजनयिक संदेश कुछ और जाए और राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकता कुछ और हो, तो देश के पास संसाधन होने के बावजूद रणनीतिक स्पष्टता कमजोर हो सकती है। चीन जैसी शक्ति से मुकाबले के लिए हथियारों के साथ-साथ संस्थागत तालमेल भी उतना ही जरूरी है।
सीमा की सुरक्षा सिर्फ सैनिकों से नहीं होगी
भारत को सीमा पर अपनी सैन्य क्षमता लगातार बढ़ानी होगी, लेकिन सीमा सुरक्षा को केवल सैनिकों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। आधुनिक युद्ध में निगरानी, ड्रोन, सैटेलाइट, साइबर क्षमता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, संचार प्रणाली और तेज सूचना-साझाकरण की भूमिका लगातार बढ़ रही है। भारत को इस बदलती सैन्य तकनीक के साथ कदम मिलाना होगा।
इसके साथ स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचा भी मजबूत करना होगा। सीमा के गांव खाली नहीं होने चाहिए। स्थानीय लोगों की आर्थिक गतिविधियां मजबूत होनी चाहिए। सीमा के पास रहने वाली आबादी भी राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिस सीमा पर लोग रहते हैं, वहां राज्य की मौजूदगी मजबूत होती है। इसलिए सीमा सुरक्षा को सिर्फ रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय रोजगार भी शामिल हैं।
संस्थाओं को मजबूत करना होगा
भारत और चीन के बीच बातचीत के लिए पहले से कई संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं। Working Mechanism for Consultation and Coordination यानी WMCC जैसे तंत्र सीमा से जुड़े मुद्दों पर बातचीत और समन्वय के लिए बनाए गए हैं। इसके अलावा सैन्य स्तर पर Corps Commander बातचीत और दूसरे चैनल भी मौजूद हैं। इन व्यवस्थाओं से सीमा विवाद का अंतिम समाधान शायद तुरंत न निकले, लेकिन उनका महत्व कम नहीं है। वे दोनों देशों के बीच गलतफहमी कम करने, जानकारी साझा करने और संकट के समय संपर्क बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
भारत को अब इन संस्थाओं को और मजबूत करने की जरूरत है। संकट आने के बाद बातचीत शुरू करने के बजाय संकट से पहले संवाद होना चाहिए। अगर दोनों देशों के अधिकारी नियमित रूप से संपर्क में रहें, तो छोटी घटनाओं के बड़े संकट में बदलने की संभावना कम हो सकती है। सीमा पर हर तनाव युद्ध की शुरुआत नहीं होता, लेकिन गलत सूचना, गलत अनुमान और गलत संदेश किसी छोटे तनाव को गंभीर संकट में बदल सकते हैं। इसलिए संवाद की संस्थागत व्यवस्था जितनी मजबूत होगी, भारत की सुरक्षा उतनी ही मजबूत होगी।
चीन को सिर्फ लद्दाख से देखना बड़ी भूल होगी
भारत की चीन नीति को केवल लद्दाख की सीमा तक सीमित करना आज के दौर में बड़ी रणनीतिक भूल होगी। चीन अब केवल भारत की उत्तरी सीमा पर मौजूद देश नहीं है। वह हिंद महासागर क्षेत्र, दक्षिण एशिया, वैश्विक व्यापार, तकनीक, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में बड़ी भूमिका निभा रहा है। चीन की ताकत का असर भारत की सुरक्षा पर केवल सीमा पर नहीं, समुद्र में, बाजार में, तकनीक में और पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों में भी दिखाई दे सकता है।
इसलिए भारत को चीन को एक व्यापक वैश्विक शक्ति के रूप में समझना होगा। हमें यह देखना होगा कि चीन की अर्थव्यवस्था किस दिशा में जा रही है, उसकी तकनीकी क्षमता कितनी तेजी से बढ़ रही है, उसकी समुद्री गतिविधियां क्या हैं, वह पड़ोसी देशों में किस तरह प्रभाव बढ़ा रहा है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उसकी भूमिका कैसे बदल रही है। भारत की चीन नीति जितनी सीमा की होगी, उतनी ही अर्थव्यवस्था, तकनीक, समुद्री सुरक्षा और कूटनीति की भी होनी चाहिए।
भारत को किसी एक ताकत के भरोसे नहीं रहना चाहिए
चीन से मुकाबले के लिए भारत का अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के साथ सहयोग बढ़ना स्वाभाविक है। Quad जैसे मंच भारत को रणनीतिक सहयोग के नए अवसर देते हैं। रक्षा तकनीक, समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग और महत्वपूर्ण तकनीकों में साझेदारी भारत के लिए उपयोगी हो सकती है।
लेकिन भारत को अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता भी बचाए रखनी होगी। चीन का मुकाबला किसी दूसरे देश के सहारे पूरी तरह नहीं किया जा सकता। आखिरकार भारत की सुरक्षा की पहली जिम्मेदारी भारत की ही है। इसके लिए मजबूत अर्थव्यवस्था, आधुनिक सेना, तकनीकी आत्मनिर्भरता, समुद्री क्षमता और प्रभावी कूटनीति जरूरी है। भारत को दुनिया के साथ साझेदारी करनी चाहिए, लेकिन अपनी रणनीतिक दिशा किसी दूसरे देश के हाथ में नहीं देनी चाहिए।
भारत को अगले पांच साल नहीं, अगले पचास साल देखना होगा
चीन के मामले में सबसे बड़ी जरूरत दीर्घकालीन सोच की है। कई बार हमारी रणनीति तत्काल घटनाओं के हिसाब से बदलती दिखाई देती है। आज सीमा पर तनाव है तो पूरा ध्यान सीमा पर, कल कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है तो पूरा ध्यान वहां और अगले दिन कोई नया संकट सामने आता है तो रणनीति फिर बदल जाती है। चीन जैसी शक्ति के साथ संबंध इस तरह नहीं चलाए जा सकते।
भारत और चीन के बीच संबंध अगले कुछ वर्षों में पूरी तरह सामान्य हो जाएंगे या पूरी तरह खराब हो जाएंगे—ऐसा कोई सरल जवाब नहीं है। दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा भी होगी, बातचीत भी होगी, व्यापार भी होगा और सुरक्षा को लेकर तनाव भी पैदा हो सकता है। इसलिए भारत को ऐसी दीर्घकालीन चीन नीति चाहिए जो सरकारों के बदलने के साथ बार-बार न बदले। यह किसी एक प्रधानमंत्री या किसी एक राजनीतिक दल की नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति होनी चाहिए।
इतिहास को भूलना नहीं, लेकिन इतिहास में फंसना भी नहीं
इतिहास से भागना किसी देश के लिए सही नहीं है। भारत को यह समझना होगा कि औपनिवेशिक दौर में सीमाएं किस तरह तय हुईं, कौन से समझौते हुए, किन परिस्थितियों में फैसले लिए गए और किन कारणों से आज विवाद मौजूद है। लेकिन इतिहास को समझने और इतिहास में फंस जाने के बीच बड़ा अंतर है।
अगर भारत हर रणनीतिक फैसला केवल 1914 या 1962 के अनुभवों के आधार पर करेगा, तो वह 2026 और उसके बाद की दुनिया को पूरी तरह नहीं समझ पाएगा। चीन बदल चुका है। भारत भी बदल चुका है। दुनिया की अर्थव्यवस्था बदल चुकी है। युद्ध का तरीका बदल चुका है। तकनीक बदल चुकी है। वैश्विक ताकतों का संतुलन बदल रहा है। इसलिए रणनीति भी बदलनी होगी।
इतिहास हमें रास्ता दिखाए, लेकिन भविष्य का फैसला इतिहास के हाथ में न हो।
असली ताकत संतुलन में है
भारत को चीन के साथ तीन चीजें एक साथ करनी होंगी—सतर्कता, तैयारी और बातचीत। सतर्कता इसलिए क्योंकि चीन की रणनीतिक गतिविधियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तैयारी इसलिए क्योंकि किसी भी चुनौती का जवाब देने की क्षमता भारत के पास होनी चाहिए। और बातचीत इसलिए क्योंकि दो बड़े पड़ोसी हमेशा युद्ध की स्थिति में नहीं रह सकते।
भारत को चीन से डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन चीन को हल्के में लेने की भी कोई गुंजाइश नहीं है। आंखें बंद करके दोस्ती का भ्रम खतरनाक होगा और हर समय युद्ध की भाषा बोलना भी समझदारी नहीं होगी। भारत को न तो अति-आशावादी होना है और न अति-आक्रामक। उसे अपनी ताकत बढ़ाते हुए शांत दिमाग से आगे बढ़ना है।
2024 का समझौता शुरुआत है, मंजिल नहीं
पूर्वी लद्दाख में 2024 का समझौता एक सकारात्मक कदम था, लेकिन इसे अंतिम समाधान मान लेना जल्दबाजी होगी। आने वाले वर्षों में असली सवाल यह होगा कि क्या दोनों देश सीमा पर भरोसा बढ़ा सकते हैं? क्या पेट्रोलिंग को लेकर स्थायी व्यवस्था बन सकती है? क्या सैनिकों की तैनाती को लेकर तनाव कम किया जा सकता है? क्या राजनीतिक संवाद लगातार चलता रह सकता है? और क्या आर्थिक संबंधों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाया जा सकता है?
इन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं। इसलिए भारत को 2024 के समझौते को उपलब्धि के रूप में जरूर देखना चाहिए, लेकिन उसे मंजिल नहीं समझना चाहिए। सीमा पर शांति बनी रहे, यही सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन शांति की कीमत पर सुरक्षा कमजोर नहीं होनी चाहिए।
भारत की नई चीन नीति कैसी हो?
भारत की नई चीन नीति का मूल मंत्र बहुत सरल होना चाहिए—सीमा की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं, लेकिन बातचीत के दरवाजे भी बंद नहीं। अपनी सैन्य तैयारी में कोई ढिलाई नहीं, लेकिन अनावश्यक टकराव भी नहीं। आर्थिक ताकत बढ़ानी है, तकनीकी क्षमता मजबूत करनी है, सेना को आधुनिक बनाना है, सीमा का बुनियादी ढांचा विकसित करना है और साथ ही कूटनीति के रास्ते खुले रखने हैं।
चीन के साथ प्रतिस्पर्धा छोटी दौड़ नहीं है। यह लंबी रणनीतिक दौड़ है। इसमें किसी एक बैठक, किसी एक समझौते या किसी एक सीमा घटना को पूरी सफलता या पूरी विफलता मानना गलत होगा। भारत की असली सफलता इस बात में होगी कि अगले दस, बीस और पचास वर्षों में वह आर्थिक, सैन्य, तकनीकी और कूटनीतिक रूप से कितना मजबूत होता है।
नक्शों से आगे देखना ही असली रणनीति है
भारत को अब चीन को केवल पुराने नक्शों और सीमा विवाद के जरिए देखने से आगे बढ़ना होगा। औपनिवेशिक इतिहास हमारी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन पूरी कहानी नहीं। हमें इतिहास को पढ़ना होगा, उससे सीखना होगा और यह समझना होगा कि अतीत ने आज की स्थिति को कैसे बनाया। लेकिन भविष्य की रणनीति आज की दुनिया और आने वाले कल की चुनौतियों को देखकर बनानी होगी।
चीन के साथ भारत का रिश्ता आने वाले दशकों में प्रतिस्पर्धा, सहयोग, तनाव और संवाद—इन सभी का मिश्रण हो सकता है। इसलिए भारत को किसी एक चरम पर जाने के बजाय अपनी रणनीतिक क्षमता बढ़ानी होगी।
भारत को चीन से मुकाबला करने के लिए केवल मजबूत सीमा नहीं, मजबूत अर्थव्यवस्था, मजबूत तकनीक, मजबूत सेना, मजबूत संस्थाएं और मजबूत कूटनीति चाहिए।
आखिरकार सबसे बड़ी बात यही है—इतिहास को पढ़िए, उससे सीखिए, लेकिन भविष्य का फैसला इतिहास के हाथ में मत छोड़िए।



