नई दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | 13 अगस्त 2026
रैली के बाद ‘शुद्धिकरण’ से मचा सियासी तूफान
उत्तराखंड के हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद कथित तौर पर हुए ‘शुद्धिकरण’ अनुष्ठान ने देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। 8 अगस्त 2026 को खड़गे ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस की ‘विजय शंखनाद रैली’ को संबोधित किया था। इसमें कांग्रेस प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य भी शामिल थे।
इसके दो दिन बाद 10 अगस्त को उसी स्थान पर स्थानीय संगठन श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास की ओर से हवन-पूजन और ‘शुद्धिकरण’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। संगठन के सचिव राम अवस्थी के नेतृत्व में यह अनुष्ठान हुआ। इसमें संगठन के अध्यक्ष/सदस्य गिरीश चंद्र पांडे, पंडित मोहन शास्त्री समेत कई लोग शामिल थे। आयोजकों ने गंगाजल का छिड़काव भी किया।
संगठन का दावा है कि रामलीला मैदान धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व का स्थान है और इसे राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि रैली के दौरान विवादास्पद नारे (कुछ को इस्लामिक नारे बताया गया) लगाए गए और खड़गे ने हिंदू संगठनों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। गिरीश पांडे ने कहा कि यह यज्ञ पवित्र स्थान की पवित्रता बहाल करने के लिए किया गया और संगठन किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है।
खड़गे ने राज्यसभा में उठाई आवाज
13 अगस्त को (मानसून सत्र के अंतिम दिन) राज्यसभा में खड़गे ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि रैली में लाखों लोग मौजूद थे और उन्होंने किसी धर्म या समुदाय का नाम नहीं लिया, केवल लोगों की समस्याओं की बात की। फिर भी उनके भाषण के बाद कथित तौर पर बीजेपी से जुड़े लोगों ने मंच का ‘शुद्धिकरण’ किया।
खड़गे ने कहा, “मैं बरसों से इस सदन का सदस्य रहा हूं। मैं अनुसूचित जाति से आता हूं और दलित हूं, मैंने कभी किसी से यह गुहार नहीं लगाई कि मेरी मदद करो या मेरी रक्षा करो। मुझमें लड़ने की ताकत है और मैं लड़ता भी हूं। लेकिन आप मेरे साथ अछूत जैसा बर्ताव करते हैं, ‘शुद्धिकरण’ करते हैं और मेरा अपमान करते हैं।” उन्होंने इसे लोकतंत्र और संविधान की भावना के खिलाफ बताया तथा अस्पृश्यता अधिनियम के तहत केस दर्ज करने और दोषियों को गिरफ्तार करने की मांग की।
राज्यसभा अध्यक्ष सी.पी. राधाकृष्णन ने भी अस्पृश्यता की निंदा की और कहा कि खड़गे का अपमान सभी का अपमान है। उन्होंने सरकार से जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करने को कहा।
कांग्रेस का बीजेपी पर सीधा हमला
उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने आरोप लगाया कि कथित ‘शुद्धिकरण’ कराने वाले संगठन श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास से जुड़े लोगों के बीजेपी से संबंध हैं और खड़गे के दलित होने के कारण यह अनुष्ठान कराया गया। उन्होंने इसे दलित समुदाय का अपमान और जातिगत भेदभाव बताया। कांग्रेस ने पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
बीजेपी ने आरोपों से किया इनकार
बीजेपी ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया। उत्तराखंड सरकार में बीजेपी नेता और दलित समुदाय से आने वाले कैबिनेट मंत्री खजान दास ने कहा कि पार्टी का इस कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने आरोपों को आधारहीन बताया और कहा कि रैली के दौरान लगाए गए नारों से सनातन भावनाएं आहत हुईं। संगठन ने भी खुद को गैर-राजनीतिक धार्मिक संस्था बताया है।
नड्डा ने जताया खेद, जांच का भरोसा
राज्यसभा में सदन के नेता जे.पी. नड्डा ने मामले पर खेद जताया। उन्होंने कहा कि खड़गे जी ने जो कहा वह न सिर्फ कांग्रेस बल्कि हम सभी के लिए चिंता का विषय है। नड्डा ने स्पष्ट किया कि बीजेपी इस तरह की गतिविधियों का समर्थन नहीं करती। उन्होंने कहा, “हम इसकी जांच करेंगे। अगर कोई दोषी पाया गया तो कार्रवाई की जाएगी। आपके आहत होने पर हमें अफसोस है।”
संसद में आमने-सामने सत्ता पक्ष और विपक्ष
यह स्थानीय घटना अब संसद में राजनीतिक टकराव का कारण बन गई है। विपक्ष इसे सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का उदाहरण बता रहा है, जबकि बीजेपी का कहना है कि बिना ठोस प्रमाण के पार्टी को जिम्मेदार ठहराना गलत है। 2027 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद जाति, सम्मान और सामाजिक समानता के बड़े सवालों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बना सकता है।
अब जांच पर टिकी पूरे विवाद की दिशा
फिलहाल कांग्रेस के आरोप और बीजेपी का खंडन दोनों सामने हैं। सबसे जरूरी है कि कथित ‘शुद्धिकरण’ कार्यक्रम की पूरी जानकारी सामने आए—किस संगठन ने इसे आयोजित किया, इसमें कौन लोग शामिल थे, आयोजन के पीछे क्या उद्देश्य था और क्या किसी राजनीतिक दल से जुड़े लोगों की भूमिका थी। इन सवालों के जवाब जांच से ही मिल सकते हैं।
ABC NATIONAL NEWS विश्लेषण: हल्द्वानी का यह विवाद अब सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं रह गया है। इसके केंद्र में जाति, सामाजिक सम्मान, बराबरी और सार्वजनिक जीवन में भेदभाव जैसे गंभीर सवाल हैं। सियासत अपनी जगह है, लेकिन सबसे जरूरी है कि तथ्य सामने आएं, जिम्मेदारी तय हो और अगर किसी स्तर पर भेदभाव या कानून का उल्लंघन साबित होता है तो निष्पक्ष कार्रवाई हो।




