राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अगस्त 2026
तेजपाल मामले ने फिर खड़ा किया बेहद गंभीर सवाल
बलात्कार और यौन हिंसा के मामलों में न्याय पाने के लिए अदालत पहुंचने वाली महिला को क्या उसके अपने अतीत के लिए कटघरे में खड़ा किया जा सकता है? क्या किसी महिला के पिछले यौन संबंध यह तय कर सकते हैं कि उसके साथ वर्तमान में यौन हिंसा हुई या नहीं? और क्या किसी पीड़िता की निजी जिंदगी को उसकी विश्वसनीयता पर हमला करने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है? तारुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों ने इन सवालों को एक बार फिर देश की न्याय व्यवस्था के सामने खड़ा कर दिया है। हाईकोर्ट ने उस पूछताछ पर गंभीर आपत्ति जताई जिसमें पीड़िता के पिछले यौन जीवन से जुड़े बेहद निजी और ग्राफिक विवरणों को उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया गया था।
हाईकोर्ट ने माना—पूछताछ सिर्फ सवाल नहीं, अपमानजनक अनुभव बन गई
बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूर्व तहलका संपादक तरुण तेजपाल से जुड़े 2013 के बलात्कार और यौन उत्पीड़न मामले में निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए जिस तरह पीड़िता की जिरह पर टिप्पणी की, वह बेहद महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट ने पीड़िता से उसके अतीत के यौन जीवन को लेकर की गई पूछताछ को “invasive” और “humiliating” यानी अत्यधिक दखल देने वाली और अपमानजनक जिरह के रूप में देखा। अदालत ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि निचली अदालत की ओर से ऐसी पूछताछ के दौरान कोई प्रभावी रोक या हस्तक्षेप दिखाई नहीं दिया। यानी जिस व्यक्ति को न्याय पाने के लिए अदालत में अपनी आपबीती बतानी थी, उसी की निजी जिंदगी को उसके खिलाफ इस्तेमाल किए जाने का सवाल सामने आया।
सवाल यह नहीं कि पीड़िता का अतीत क्या था, सवाल यह है कि अपराध के समय क्या हुआ
कानून और न्याय के मूल सिद्धांतों के स्तर पर यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। किसी महिला का पहले किसी के साथ संबंध रहा हो, उसके कई संबंध रहे हों या उसका कोई निजी यौन इतिहास रहा हो—इन बातों से यह अपने आप साबित नहीं होता कि उसने किसी खास घटना के समय सहमति दी थी। हर यौन संबंध के लिए सहमति अलग होती है और किसी पुराने संबंध को वर्तमान घटना की सहमति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी बुनियादी सिद्धांत को मजबूत करने के लिए भारतीय कानून में लंबे समय से सुधार किए गए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि व्यवहार में पीड़िता के अतीत को लेकर सवाल अभी भी न्यायिक प्रक्रिया में प्रवेश कर जाते हैं।
कभी कानून ही देता था पीड़िता के चरित्र पर हमला करने की गुंजाइश
भारत में स्थिति हमेशा ऐसी नहीं थी। पुराने भारतीय साक्ष्य कानून में ऐसी व्यवस्था मौजूद थी जिसके तहत बलात्कार की शिकायत करने वाली महिला के कथित “immoral character” यानी तथाकथित अनैतिक चरित्र को उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने या सहमति का संकेत देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की Section 155(4) इसी तरह की व्यवस्था का हिस्सा थी। इस प्रावधान ने लंबे समय तक यह रास्ता खुला रखा कि आरोपी पक्ष पीड़िता के चरित्र और यौन इतिहास को अदालत में उसके खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकता था।
2003 में प्रावधान हटा, लेकिन सोच पूरी तरह नहीं बदली
कानून में बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम 2003 में उठाया गया, जब Section 155(4) को समाप्त कर दिया गया। यह बदलाव वर्षों की आलोचना और विधि आयोग की सिफारिशों के बाद आया था। इसका मूल उद्देश्य यही था कि बलात्कार के मुकदमे को पीड़िता के चरित्र की जांच में बदलने के बजाय वास्तविक घटना और आरोपी के आचरण पर केंद्रित रखा जाए। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कानून में किसी प्रावधान को हटा देना और अदालतों में उससे जुड़ी पुरानी मानसिकता को पूरी तरह खत्म कर देना दो अलग बातें हैं। यही कारण है कि आज भी कई मामलों में पीड़िता के पिछले संबंधों और यौन इतिहास को लेकर अनावश्यक सवाल उठने की शिकायत सामने आती है।
पीड़िता के कपड़े, रिश्ते और पुराना जीवन—क्या ये अपराध का सबूत हैं?
यही वह सोच है जिस पर कानूनी विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। बलात्कार के मामले में अक्सर बहस को मूल घटना से हटाकर महिला के कपड़ों, उसके व्यवहार, उसके पुराने संबंधों, पुरुष मित्रों, निजी बातचीत या कथित यौन इतिहास की तरफ मोड़ने की कोशिश की जाती है। लेकिन किसी महिला का सामाजिक या निजी जीवन अपने आप में यह प्रमाण नहीं बन सकता कि किसी विशेष समय पर उसने यौन संबंध के लिए सहमति दी थी। एक महिला का अतीत उसके शरीर पर किसी स्थायी ‘सहमति’ की मुहर नहीं लगाता।
‘सहमति’ घटना-विशेष से तय होती है
कानूनी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही होना चाहिए कि संबंधित घटना के समय क्या सहमति मौजूद थी। पहले कभी संबंध होना वर्तमान में सहमति का प्रमाण नहीं है। किसी व्यक्ति के साथ पहले अंतरंग होना यह अधिकार नहीं देता कि भविष्य में उसकी इच्छा के विरुद्ध भी वही व्यवहार किया जाए। इसी तरह किसी महिला का पूर्व यौन इतिहास उसके द्वारा लगाए गए वर्तमान आरोप को स्वतः झूठा नहीं बनाता। अदालत को घटना के उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर निर्णय करना होता है, न कि पीड़िता के निजी जीवन की नैतिकता का मूल्यांकन करके।
तारुण तेजपाल मामले में सामने आया जिरह का दूसरा चेहरा
तेजपाल मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने सिर्फ यह नहीं देखा कि क्या सवाल पूछे गए, बल्कि यह भी देखा कि जिरह किस तरह की थी और उसका पीड़िता की गरिमा पर क्या प्रभाव पड़ा। किसी आरोपी को निष्पक्ष बचाव का अधिकार है और जिरह न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन निष्पक्ष बचाव और पीड़िता का अपमान—इन दोनों को एक ही चीज नहीं माना जा सकता। बचाव पक्ष को आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को चुनौती देने का अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पीड़िता की पूरी निजी जिंदगी को सार्वजनिक जांच के लिए खोल दिया जाए।
निचली अदालत की ‘चुप्पी’ पर भी हाईकोर्ट ने उठाया सवाल
इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा निचली अदालत की भूमिका से जुड़ा है। अदालत ने पीड़िता के अतीत को लेकर की गई “graphic details” वाली पूछताछ के दौरान निचली अदालत की “noticeable silence” यानी उल्लेखनीय चुप्पी को रेखांकित किया। इसका व्यापक संदेश यह है कि न्यायाधीश केवल निष्क्रिय दर्शक नहीं हो सकते, खासकर तब जब जिरह कानूनी सीमा से आगे जाती दिखाई दे। अदालत को यह सुनिश्चित करना होता है कि न्यायिक प्रक्रिया स्वयं किसी पीड़िता के लिए दूसरी बार आघात का कारण न बने।
बलात्कार की सुनवाई ‘चरित्र की अदालत’ नहीं बन सकती
किसी महिला पर बलात्कार का आरोप लगाने के बाद उसके चरित्र की जांच शुरू कर देना न्याय प्रक्रिया को मूल सवाल से भटका सकता है। अदालत में यह तय होना चाहिए कि अभियोजन ने अपने मामले को किस स्तर तक साबित किया, उपलब्ध साक्ष्य क्या कहते हैं और आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप कानून की कसौटी पर कितने टिकते हैं। लेकिन यदि सुनवाई का बड़ा हिस्सा इस बात पर चला जाए कि पीड़िता अपने निजी जीवन में कैसी थी, तो न्याय की दिशा बदलने का खतरा पैदा होता है। बलात्कार के मुकदमे में आरोपी पर लगे आरोपों की जांच होनी चाहिए, पीड़िता की निजी जिंदगी का नैतिक मूल्यांकन नहीं।
कानून बदल गया, अब अदालतों की कार्यप्रणाली भी बदलनी होगी
कानून में सुधार के बाद अगली चुनौती उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। यदि किसी प्रावधान को हटा दिया गया है लेकिन उसी मानसिकता के तहत सवाल किसी दूसरे रास्ते से पूछे जाते रहें, तो सुधार का उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायाधीशों, अभियोजकों और वकीलों को यौन अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशील और कानूनसम्मत जिरह की सीमाओं को लेकर स्पष्ट प्रशिक्षण और दिशा-निर्देश की जरूरत है।
पीड़िता को न्याय चाहिए, अपने अतीत का हिसाब नहीं
बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने वाली महिला पहले ही सामाजिक दबाव, मानसिक तनाव और न्यायिक प्रक्रिया की लंबी लड़ाई से गुजरती है। यदि अदालत में उससे उसके निजी जीवन के ऐसे सवाल पूछे जाएं जिनका कथित अपराध से सीधा संबंध नहीं है, तो यह प्रक्रिया उसके लिए और अधिक कठिन हो सकती है। यही कारण है कि यौन अपराधों की सुनवाई में पीड़िता की गरिमा और निजता की रक्षा केवल संवेदनशीलता का विषय नहीं, बल्कि न्यायिक निष्पक्षता का भी हिस्सा है।
लेकिन आरोपी के निष्पक्ष बचाव का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण
इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही जरूरी है। किसी भी आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और अपने बचाव का पूरा कानूनी अधिकार है। अदालत को अभियोजन के आरोपों की कठोर जांच करनी चाहिए और बचाव पक्ष को प्रभावी जिरह का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि कौन-सी जानकारी वास्तव में मामले के लिए प्रासंगिक है और कौन-सी केवल पीड़िता को शर्मिंदा या बदनाम करने के लिए लाई जा रही है। यही सीमा न्यायालय को तय करनी होती है।
अब असली सवाल—कानून की किताब से अदालत की जिरह तक कब पहुंचेगा बदलाव?
तारुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी ने इसी अंतर को उजागर किया है। एक तरफ कानून ने वर्षों पहले पीड़िता के यौन इतिहास को उसकी विश्वसनीयता पर हमला करने के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की पुरानी व्यवस्था को खत्म कर दिया। दूसरी तरफ, विशेषज्ञों के अनुसार व्यवहार में ऐसी सोच पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। यानी चुनौती अब सिर्फ कानून बदलने की नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया के भीतर उस मानसिकता को बदलने की है जो महिला के वर्तमान आरोप का जवाब उसके अतीत में तलाशती है।
न्याय का पैमाना पीड़िता का अतीत नहीं, उपलब्ध साक्ष्य होना चाहिए
इस पूरे विवाद से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी महिला का पिछला जीवन उसके साथ हुई कथित यौन हिंसा को स्वतः सही या गलत साबित नहीं करता। अपराध की जांच और मुकदमे का फैसला साक्ष्य, गवाही, परिस्थितियों और लागू कानून के आधार पर होना चाहिए। पीड़िता कैसी जिंदगी जीती थी, उसके कितने रिश्ते थे या उसका निजी इतिहास क्या था—इन सवालों को तभी महत्व मिलना चाहिए जब कानून और मामले के वास्तविक तथ्यों में उनकी स्पष्ट और वैध प्रासंगिकता हो।
तारुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी इसलिए महज एक मुकदमे की टिप्पणी नहीं है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल रखती है—क्या बलात्कार के मुकदमे में हम अपराध की सच्चाई तलाश रहे हैं या पीड़िता के चरित्र की? कानून ने अपना रुख काफी हद तक स्पष्ट कर दिया है। अब जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि अदालत की प्रक्रिया भी उसी दिशा में चले।




