राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 11 अगस्त 2026
रजिस्ट्रार की नियुक्ति पर अब पुलिस जांच की मांग
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के Registrar प्रो. एम.डी. महताब आलम रिजवी की नियुक्ति को लेकर विवाद अब पुलिस जांच की मांग तक पहुंच गया है। दिल्ली पुलिस के समक्ष दायर एक आपराधिक शिकायत में रिजवी तथा उनकी नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया से जुड़े अन्य अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर जांच की मांग की गई है। शिकायत में cheating, forgery, forged documents के इस्तेमाल, रिकॉर्ड में कथित हेरफेर, criminal conspiracy और पद के कथित दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने दावा किया है कि आरोप RTI के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों, जामिया के आधिकारिक रिकॉर्ड और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री के आधार पर उठाए गए हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पुलिस के सामने दी गई शिकायत अपने आप में अपराध सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है और आरोपों की सच्चाई मूल रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच के बाद ही तय हो सकती है।
सिर्फ Registrar पद नहीं, पूरी नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल
शिकायत का दायरा केवल रिजवी की वर्तमान Registrar नियुक्ति तक सीमित नहीं है। शिकायतकर्ता ने उनकी जामिया में Associate Professor के रूप में शुरुआती नियुक्ति, बाद में Professor के रूप में पदोन्नति और अंततः Registrar के पद पर नियुक्ति तक की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है। शिकायत का मूल तर्क यह है कि यदि शुरुआती नियुक्ति के समय निर्धारित पात्रता को पूरा करने के लिए किसी अनुभव या योग्यता को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था, तो उसके आधार पर हुई बाद की पदोन्नति और नियुक्ति की भी समीक्षा आवश्यक हो सकती है। इसी कारण शिकायत में Screening Committee, Selection Committee, Executive Council और उन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच करने को कहा गया है, जिन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया या मंजूरी दी।
UGC नियमों के तहत अनुभव को लेकर सबसे बड़ा विवाद
मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा Associate Professor पद के लिए आवश्यक अनुभव से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने 2010 के UGC Regulations का हवाला देते हुए दावा किया है कि Associate Professor पद के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता के साथ विश्वविद्यालय, कॉलेज या मान्यता प्राप्त शोध संस्थान/उद्योग में न्यूनतम निर्धारित teaching और/or research experience जरूरी था। शिकायत में सवाल उठाया गया है कि रिजवी ने अपने पूर्व रोजगार से जो अनुभव प्रस्तुत किया, क्या वह वास्तव में UGC के निर्धारित मानकों के तहत गिना जा सकता था या नहीं। यानी विवाद केवल इस बात का नहीं है कि रिजवी के पास काम का अनुभव था या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह अनुभव उस विशेष शैक्षणिक पद के लिए लागू वैधानिक पात्रता की श्रेणी में आता था?
MP-IDSA के अनुभव पर मांगी गई विस्तृत जांच
शिकायत में Manohar Parrikar Institute for Defence Studies and Analyses यानी MP-IDSA, जिसे पहले Institute for Defence Studies and Analyses के नाम से जाना जाता था, में रिजवी के कथित अनुभव को विशेष रूप से जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने RTI के माध्यम से रक्षा मंत्रालय और संबंधित संस्थान से यह जानकारी मांगने का उल्लेख किया है कि रिजवी वहां किस पद पर कार्यरत थे, उनके काम की वास्तविक प्रकृति क्या थी, क्या उनके कार्य में classroom teaching शामिल थी, क्या उन्हें नियमित रूप से कक्षाएं दी गई थीं और उनका पद teaching था अथवा मुख्य रूप से research से संबंधित था। शिकायत में यह भी पूछा गया है कि उनकी नियुक्ति के समय और सेवा समाप्त होने के समय उनका pay level क्या था। इन सवालों का उद्देश्य यही निर्धारित करना बताया गया है कि MP-IDSA में किया गया कार्य UGC की उस पात्रता शर्त के तहत माना जा सकता था या नहीं, जिसके आधार पर जामिया में Associate Professor पद के लिए चयन किया गया।
RTI रिकॉर्ड से लेकर सेवा विवरण तक खंगालने की मांग
शिकायत में केवल MP-IDSA के पदनाम पर सवाल नहीं उठाया गया है, बल्कि वहां की सेवा अवधि और सेवा संबंधी दस्तावेजों की भी जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर 2007 में Research Assistant के रूप में नियुक्ति, बाद की सेवा अवधि तथा 2016-17 के दौरान सेवा स्थिति, leave, NOC और Jamia में शामिल होने से पहले की प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े सवाल RTI के जरिए उठाए। शिकायत के अनुसार MP-IDSA से संबंधित RTI आवेदन का जवाब 9 अक्टूबर 2025 को दिया गया था। शिकायतकर्ता का कहना है कि इन दस्तावेजों और मूल सेवा रिकॉर्ड की तुलना करने से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि प्रस्तुत अनुभव और आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड में कोई महत्वपूर्ण अंतर था या नहीं।
इथियोपिया के अनुभव पर भी उठाए गए सवाल
शिकायत में रिजवी द्वारा Ethiopia स्थित State Civil Services University में कथित रूप से हासिल किए गए अनुभव को भी जांच का विषय बनाया गया है। शिकायतकर्ता ने उस रोजगार की अवधि, उसकी निरंतरता और उसकी प्रकृति पर सवाल उठाए हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि उक्त अनुभव को Associate Professor की पात्रता के लिए इस्तेमाल किया गया था, तो क्या वह UGC के लागू नियमों के तहत वैध रूप से countable experience था। यहां भी अंतिम निष्कर्ष किसी शिकायत के आधार पर नहीं बल्कि मूल नियुक्ति रिकॉर्ड, experience certificates और संबंधित संस्थान से प्राप्त सत्यापन के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
अलग-अलग CV में कथित अंतर ने बढ़ाया विवाद
शिकायत में जामिया की वेबसाइट पर उपलब्ध रिजवी के अलग-अलग Curriculum Vitae यानी CV में कथित असंगतियों का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि विभिन्न संस्करणों में qualification, professional experience और service particulars से संबंधित विवरणों में अंतर दिखाई देता है। शिकायत के अनुसार यह जांचना जरूरी है कि ये अंतर प्रशासनिक अपडेट या रिकॉर्ड संशोधन के सामान्य कारणों से उत्पन्न हुए या किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने, बदलने अथवा अलग तरीके से प्रस्तुत करने की वजह से। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया में उम्मीदवारों से अपनी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव के समर्थन में दस्तावेज उपलब्ध कराने की अपेक्षा की जाती है।
जामिया की भर्ती प्रक्रिया भी जांच के केंद्र में
शिकायत के साथ कथित तौर पर जामिया की भर्ती से संबंधित दस्तावेज भी लगाए गए हैं। इनमें उम्मीदवारों से degrees, marksheets, experience certificates और अन्य supporting documents जमा करने की आवश्यकताओं का उल्लेख होने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता ने यह भी इंगित किया है कि Academic Performance Indicator यानी API से संबंधित दस्तावेजों की जरूरत भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित थी। यदि किसी उम्मीदवार की पात्रता इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर तय की गई थी, तो अब सवाल यह है कि रिजवी के मामले में प्रस्तुत सभी दस्तावेजों की उस समय किस स्तर पर जांच हुई और क्या Screening Committee तथा Selection Committee ने पात्रता की स्वतंत्र पुष्टि की थी।
2017 में Associate Professor के रूप में चयन
शिकायत में जामिया के Executive Council के कथित रिकॉर्ड का भी उल्लेख है। 10 मार्च 2017 की बैठक के minutes में Selection Committee की बैठकों की सिफारिशों पर विचार और उन्हें मंजूरी दिए जाने का उल्लेख बताया गया है। इसी प्रक्रिया में Nelson Mandela Centre for Peace and Conflict Resolution से संबंधित Associate Professor पद के लिए Md. Mahtab Alam Rizvi के चयन का रिकॉर्ड होने का दावा शिकायत में किया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि इसलिए जांच केवल बाद की पदोन्नति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि 2017 में जिस आधार पर नियुक्ति हुई, उस समय सभी अनिवार्य पात्रता शर्तें पूरी थीं या नहीं।
अगर शुरुआती नियुक्ति पर सवाल है तो पदोन्नति भी जांच के दायरे में
शिकायतकर्ता ने इसी आधार पर रिजवी की बाद की Professor पदोन्नति को भी जांच के दायरे में लाने की मांग की है। तर्क यह है कि यदि किसी व्यक्ति की शुरुआती नियुक्ति ही कथित रूप से गलत जानकारी या अपूर्ण पात्रता के आधार पर हुई हो, तो बाद में Career Advancement Scheme के तहत हुई पदोन्नति की वैधता की भी समीक्षा की जानी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि केवल शुरुआती नियुक्ति पर शिकायत किए जाने से बाद की पदोन्नति स्वतः अवैध नहीं हो जाती। प्रत्येक चरण में लागू नियम, दस्तावेज और चयन प्रक्रिया की अलग-अलग जांच जरूरी होगी।
2025 में Registrar बने रिजवी
विवाद इसलिए और गंभीर दिखाई देता है क्योंकि रिजवी बाद में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के Registrar बने। शिकायत में जामिया की 12 मार्च 2025 की notification का उल्लेख किया गया है, जिसमें उनके Registrar पद का कार्यभार संभालने की जानकारी दर्ज होने का दावा है। Registrar विश्वविद्यालय का एक महत्वपूर्ण statutory administrative office है, जिससे प्रशासनिक, वित्तीय और संस्थागत जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं। इसलिए शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि उनके academic appointment की बुनियाद पर गंभीर सवाल हैं तो उनकी वर्तमान नियुक्ति तक की पूरी प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए।
शिकायत में विश्वविद्यालय के अधिकारियों की भूमिका भी जांचने की मांग
मामले का एक अहम पहलू यह है कि शिकायत केवल उम्मीदवार के कथित आचरण की जांच नहीं मांगती। इसमें उन अधिकारियों और समितियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं जिन्होंने नियुक्ति प्रक्रिया में भाग लिया था। शिकायतकर्ता चाहता है कि यह पता लगाया जाए कि Screening Committee, Selection Committee और Executive Council के सामने कौन-कौन से दस्तावेज रखे गए थे, उनका सत्यापन किस स्तर पर हुआ और क्या किसी अधिकारी को कथित पात्रता संबंधी समस्या की जानकारी थी। यदि किसी अधिकारी ने जानबूझकर गलत जानकारी के बावजूद नियुक्ति को आगे बढ़ाया हो तो उसकी जिम्मेदारी अलग प्रश्न होगी; लेकिन यदि समितियों ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर सामान्य प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया था, तो स्थिति अलग होगी। यही तथ्य जांच का विषय होना चाहिए।
मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग
शिकायतकर्ता ने पुलिस से उन मूल दस्तावेजों को सुरक्षित रखने और जांच में लेने की मांग की है जो कथित तौर पर जामिया तथा अन्य सरकारी संस्थानों के पास हैं। इनमें original application forms, experience certificates, recruitment correspondence, Selection Committee records, Executive Council proceedings, service books, electronic communications और वेबसाइट के पुराने डिजिटल रिकॉर्ड शामिल बताए गए हैं। शिकायत में इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों में कथित बदलाव या छेड़छाड़ की आशंका जताते हुए रिकॉर्ड को preserve करने की जरूरत पर जोर दिया गया है। हालांकि, इस तरह की आशंका को भी जांच के दौरान ठोस साक्ष्य से ही स्थापित किया जा सकता है।
FIR की मांग हुई है, लेकिन FIR अभी दोष सिद्धि नहीं
इस पूरे मामले में सबसे जरूरी कानूनी सावधानी यही है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों को अपराध का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। शिकायतकर्ता ने FIR की मांग की है, लेकिन आरोपों की वास्तविकता पुलिस जांच के बाद ही सामने आएगी। यह जांचना होगा कि क्या रिजवी वास्तव में UGC की लागू पात्रता शर्तों को पूरा करते थे, क्या उनके अनुभव को नियमों के अनुरूप count किया गया, क्या CV में मौजूद कथित अंतर का कोई वैध प्रशासनिक कारण था और क्या किसी दस्तावेज में जानबूझकर गलत जानकारी दी गई।
मामला सिर्फ पात्रता का है या आपराधिक साजिश का?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न है। यदि दस्तावेजों की जांच के बाद केवल यह सामने आता है कि किसी पूर्व अनुभव की UGC नियमों के तहत व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जा सकती थी, तो मामला मुख्यतः eligibility या administrative dispute हो सकता है। लेकिन यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी ने जानबूझकर फर्जी दस्तावेज बनाए, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए, गलत जानकारी दी या अधिकारियों के साथ मिलकर नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित किया, तो मामला आपराधिक कानून के दायरे में जा सकता है। दोनों परिस्थितियों के बीच बहुत बड़ा कानूनी अंतर है।
अब नजर दिल्ली पुलिस की अगली कार्रवाई पर
शिकायत ने दिल्ली पुलिस के सामने दस्तावेजों और आरोपों का एक विस्तृत सेट रखा है। अब महत्वपूर्ण यह होगा कि पुलिस शिकायत की प्रारंभिक जांच किस तरह करती है और क्या उसे FIR दर्ज करने लायक प्रथमदृष्टया सामग्री मिलती है। यदि जांच शुरू होती है तो जामिया और संबंधित संस्थानों से मूल रिकॉर्ड मांगे जा सकते हैं तथा नियुक्ति से जुड़े अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ भी हो सकती है। लेकिन किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और कानूनी अधिकारों को देखते हुए जांच को निष्पक्ष, दस्तावेज-आधारित और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाना जरूरी होगा।
असली सवाल—नियुक्ति प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?
इस विवाद का व्यापक महत्व केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। विश्वविद्यालयों में शिक्षक और प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति के लिए निर्धारित योग्यता, अनुभव और चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पूरे उच्च शिक्षा तंत्र की साख से जुड़ी होती है। यदि किसी उम्मीदवार की पात्रता पर सवाल उठते हैं तो संस्थान के लिए सबसे उचित रास्ता पारदर्शी दस्तावेजी सत्यापन और स्वतंत्र जांच है। इससे उम्मीदवार को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और संस्थान की चयन प्रक्रिया पर भी अनावश्यक संदेह नहीं रहेगा।
अब फैसला दस्तावेज और जांच करेंगे
फिलहाल उपलब्ध सामग्री यह बताती है कि एक शिकायतकर्ता ने रिजवी की नियुक्ति से जुड़े कई दस्तावेजों के आधार पर गंभीर आरोप लगाते हुए दिल्ली पुलिस से FIR और जांच की मांग की है। लेकिन अभी यह कहना उचित नहीं होगा कि नियुक्ति अवैध थी, दस्तावेज फर्जी थे या किसी आपराधिक साजिश के तहत पूरी प्रक्रिया चलाई गई। इन सभी सवालों का जवाब मूल रिकॉर्ड, संबंधित अधिकारियों के बयान और स्वतंत्र जांच से ही मिलेगा।
इस मामले की असली परीक्षा यही होगी कि शिकायत में उठाए गए सवाल केवल पात्रता और प्रशासनिक व्याख्या तक सीमित निकलते हैं या जांच में वास्तव में जानबूझकर फर्जीवाड़े और आपराधिक कृत्य के प्रमाण सामने आते हैं। फिलहाल मामला आरोपों और दस्तावेजों की जांच के चरण में है—और अंतिम निष्कर्ष कानून की प्रक्रिया ही तय करेगी।




