ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 मई 2026
भारतीय लोकतंत्र में कुछ न्यायिक टिप्पणियां केवल कानूनी बहस नहीं होतीं, बल्कि वे राज्य और नागरिक के रिश्ते को नए सिरे से परिभाषित करने लगती हैं। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की हालिया टिप्पणियां भी शायद उसी श्रेणी में आती हैं। जिस दौर में आतंकवाद-रोधी कानून UAPA को लेकर लगातार यह आरोप लग रहे हैं कि यह “कानूनी प्रक्रिया के नाम पर लंबी कैद” का माध्यम बनता जा रहा है, उस समय सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद” एक बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक संदेश माना जा रहा है।
इन दोनों न्यायाधीशों ने पहले भी बिल्किस बानो मामले में दोषियों की रिहाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। अब इन्होंने UAPA के तहत वर्षों से जेल में बंद आरोपियों के संदर्भ में जिस तरह अदालतों की भूमिका पर टिप्पणी की है, उसने देश में नागरिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन की बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।
अदालत ने साफ कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता, चाहे मामला UAPA जैसा कठोर कानून ही क्यों न हो। यह टिप्पणी सीधे तौर पर उन मामलों की ओर इशारा करती है, जहां आरोपी वर्षों से बिना ट्रायल जेल में बंद हैं। उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे मामलों का उल्लेख इसी संदर्भ में लगातार हो रहा है, क्योंकि दोनों लंबे समय से कैद में हैं जबकि मुकदमे की प्रक्रिया अब तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने UAPA मामलों में बेहद कम दोषसिद्धि दर का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार 2019 से 2023 के बीच पूरे देश में UAPA मामलों में दोषसिद्धि दर लगभग 1.5 से 4 प्रतिशत के बीच रही, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह 1 प्रतिशत से भी कम रही। यह आंकड़ा अपने आप में कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि हजारों गिरफ्तारियों के बावजूद दोषसिद्धि इतनी कम है, तो क्या कानून का इस्तेमाल केवल जांच और सुरक्षा के लिए हो रहा है या फिर कई मामलों में गिरफ्तारी ही सजा बनती जा रही है?
यहीं से “प्रोसेस इज़ द पनिशमेंट” वाली बहस मजबूत होती है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति को दोषी साबित होने से पहले निर्दोष माना जाता है। लेकिन यदि मुकदमे वर्षों तक न चलें और आरोपी लंबी कैद में रहे, तो संवैधानिक अधिकारों का क्या अर्थ बचता है? यही वह सवाल है जिसे सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
हालांकि यह भी सच है कि UAPA जैसे कानूनों का उद्देश्य आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर खतरों से निपटना है। सरकार और जांच एजेंसियों का तर्क रहता है कि ऐसे मामलों में सामान्य कानूनों की तुलना में अधिक कठोरता जरूरी होती है। लेकिन संविधान की मूल भावना यह भी कहती है कि कठोरतम कानून भी नागरिक स्वतंत्रता के बुनियादी सिद्धांतों को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते। अदालतों की भूमिका इसी संतुलन को बनाए रखने की होती है।
सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों को केवल एक कानूनी अवलोकन मानना शायद पर्याप्त नहीं होगा। यह न्यायपालिका के भीतर उस बढ़ती चिंता का संकेत भी माना जा सकता है, जिसमें यह महसूस किया जा रहा है कि लंबी कैद, धीमे ट्रायल और कठोर धाराओं का संयोजन कहीं लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर न कर दे।
भारतीय न्याय व्यवस्था की ताकत हमेशा इसी बात में रही है कि अंततः अदालतें संविधान की आत्मा की ओर लौटती हैं। जब अदालत यह कहती है कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद”, तो वह केवल एक कानूनी सिद्धांत नहीं दोहरा रही होती, बल्कि यह याद दिला रही होती है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान नागरिक की स्वतंत्रता और कानून के निष्पक्ष शासन में है।
आज बहस केवल UAPA की नहीं है। बहस इस बात की है कि क्या भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं के साथ-साथ नागरिक अधिकारों की संवैधानिक मर्यादा को भी बराबर महत्व देगा। और शायद यही वह सवाल है, जिसका जवाब आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करेगा।




