एबीसी डेस्क 20 दिसंबर 2025
दिल्ली के IGI एयरपोर्ट पर जो हुआ, वह किसी नियम या लाइन तोड़ने का मामला नहीं था, बल्कि इंसानियत की परीक्षा थी—और वह परीक्षा बुरी तरह फेल हो गई। एक यात्री, उसके साथ उसका परिवार और उसकी सात साल की बेटी… और सामने एक ऐसा दृश्य, जिसे कोई भी बच्चा कभी नहीं देखना चाहिए।
पीड़ित यात्री के मुताबिक, वह अपने परिवार के साथ टर्मिनल-1 पर सुरक्षा जांच के लिए खड़ा था। लाइन सामान्य तरीके से आगे बढ़ रही थी, तभी कुछ एयरलाइन स्टाफ अपनी अलग लाइन बनाकर आगे बढ़ने लगे। जब यात्री ने बस इतना कहा कि “सब लोग लाइन में हैं”, तो बात बिगड़ गई।
यात्री का कहना है कि एयर इंडिया के एक ऑफ-ड्यूटी पायलट ने उनसे ऊंची आवाज़ में बात शुरू कर दी। शब्द ऐसे थे, जो चुभते हैं। अपमान ऐसे, जो अंदर तक तोड़ देते हैं। सवाल पूछा गया—“क्या आप पढ़े-लिखे नहीं हैं?” बात बहस से आगे बढ़ी और फिर अचानक हाथ उठ गया।
कुछ ही पलों में वह यात्री जमीन पर था, खून बह रहा था। सबसे डरावनी बात यह थी कि यह सब उसकी सात साल की बेटी के सामने हुआ। वही बच्ची, जो थोड़ी देर पहले तक एयरपोर्ट की चमक-दमक देख रही थी, अब सहमी हुई थी, रो रही थी। पिता खून से सना था और बेटी बार-बार पूछ रही थी—“पापा, आपको दर्द तो नहीं हो रहा?”
यात्री बताता है कि घटना के बाद उसकी बेटी सदमे में है। डर इतनी गहराई तक बैठ गया है कि उसे मेडिकल मदद लेनी पड़ी। एक पिता के लिए इससे बड़ा दर्द क्या हो सकता है कि वह अपने बच्चे को यह कहते हुए दिलासा दे—“पापा ठीक हैं बेटा”, जबकि खुद अंदर से टूट चुका हो।
एयर इंडिया ने इस घटना पर खेद जताया है और आरोपी पायलट को ड्यूटी से हटा दिया है। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होते। क्या ड्यूटी से हटाना उस डर का जवाब है, जो एक बच्ची की आंखों में उतर गया? क्या यह उस अपमान का इलाज है, जो एक आम आदमी ने झेला?
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है। एयरपोर्ट जैसे सुरक्षित माने जाने वाले स्थान पर अगर एक परिवार सुरक्षित नहीं है, तो फिर आम आदमी कहां जाए? नियम सबके लिए होते हैं, और इंसानियत उससे भी ऊपर होती है।
यह खबर गुस्से से ज्यादा एक टीस है—उस पिता की, उस बेटी की और हर उस आदमी की, जो बस शांति से सफर करना चाहता है, बिना डर के, बिना अपमान के।




