साइंस एंड टेक्नोलॉजी/ अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/ तेहरान | 13 जून 2026
प्रस्तावना: युद्ध के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़
मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ तकनीकी परिवर्तन ऐसे हुए हैं जिन्होंने केवल युद्ध की रणनीति नहीं बदली, बल्कि पूरी विश्व व्यवस्था को प्रभावित किया। बारूद ने साम्राज्यों की सीमाएं बदलीं, टैंकों ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद सैन्य सोच को बदल दिया, परमाणु हथियारों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शक्ति संतुलन को परिभाषित किया और इंटरनेट ने आधुनिक युद्ध को डिजिटल बना दिया। अब 21वीं सदी के तीसरे दशक में दुनिया एक और क्रांतिकारी बदलाव की गवाह बन रही है—ड्रोन क्रांति। यह परिवर्तन इतना गहरा है कि कई रक्षा विशेषज्ञ इसे परमाणु युग के बाद सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव मान रहे हैं। यूक्रेन की खाइयों, रूस की तेल रिफाइनरियों, लाल सागर के समुद्री मार्गों, ईरान-इजरायल संघर्ष और एशिया की सामरिक प्रतिस्पर्धा को देखें तो स्पष्ट होता है कि अब युद्ध केवल बड़ी सेनाओं, विशाल टैंकों और महंगे लड़ाकू विमानों का खेल नहीं रह गया है। एक छोटा सा ड्रोन, जिसकी कीमत कई बार एक मोटरसाइकिल से भी कम होती है, करोड़ों डॉलर के सैन्य संसाधनों को नष्ट कर सकता है। यह बदलाव केवल सैन्य तकनीक का नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का भी है।
खाड़ी युद्ध से यूक्रेन युद्ध तक: कैसे बदली युद्ध की परिभाषा
1991 के खाड़ी युद्ध ने दुनिया को अमेरिकी सैन्य शक्ति का ऐसा प्रदर्शन दिखाया था जिसने यह विश्वास पैदा कर दिया था कि भविष्य के युद्ध केवल तकनीकी महाशक्तियां ही जीत सकती हैं। अमेरिका के स्टेल्थ विमान, सैटेलाइट नेटवर्क, क्रूज मिसाइलें और विमानवाहक पोत युद्ध के मैदान में लगभग अजेय दिखाई दिए। उस दौर में यह धारणा बनी कि जिस देश के पास अधिक उन्नत तकनीक और अधिक महंगे हथियार होंगे, वही विश्व राजनीति को नियंत्रित करेगा। लेकिन यूक्रेन युद्ध ने इस पूरी सोच को चुनौती दे दी। रूस के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है, हजारों टैंक हैं, परमाणु हथियार हैं और विशाल सैन्य बजट है। इसके बावजूद यूक्रेन ने ड्रोन तकनीक, सटीक खुफिया जानकारी और कम लागत वाले हमलावर सिस्टम के सहारे रूस को अपेक्षा से कहीं अधिक नुकसान पहुंचाया। आज युद्ध के मैदान में कई बार एक ड्रोन ऑपरेटर की भूमिका एक टैंक कमांडर से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि सैन्य शक्ति का पारंपरिक मॉडल तेजी से अप्रासंगिक होता जा रहा है।
यूक्रेन: भविष्य के युद्धों की जीवित प्रयोगशाला
यूक्रेन युद्ध को सैन्य विशेषज्ञ भविष्य के युद्धों की प्रयोगशाला कह रहे हैं। यहां पहली बार बड़े पैमाने पर एफपीवी (First Person View) ड्रोन, आत्मघाती ड्रोन, समुद्री ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणालियों का उपयोग हो रहा है। यूक्रेन हर वर्ष लाखों ड्रोन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इन ड्रोन की कीमत अक्सर 500 से 2000 डॉलर के बीच होती है, जबकि जिन टैंकों, रडार सिस्टमों या बख्तरबंद वाहनों को वे नष्ट करते हैं उनकी कीमत लाखों डॉलर होती है। कई मोर्चों पर स्थिति यह है कि सैनिकों के लिए दिन के समय खुले क्षेत्र में चलना लगभग आत्मघाती कदम बन चुका है क्योंकि ऊपर लगातार निगरानी करने वाले ड्रोन मौजूद रहते हैं। घायल सैनिकों को निकालने के लिए भी अब रोबोटिक वाहन और ड्रोन का सहारा लिया जा रहा है। यह पहली बार है जब युद्धक्षेत्र में इंसानों की जगह मशीनें बड़ी संख्या में ले रही हैं।
ईरान और हूती मॉडल: कैसे सस्ते हथियारों ने महाशक्तियों को चुनौती दी
यदि यूक्रेन ने ड्रोन युद्ध की तकनीकी क्षमता दिखाई है, तो ईरान ने उसकी सामरिक शक्ति को दुनिया के सामने रखा है। ईरान ने वर्षों पहले यह समझ लिया था कि वह अमेरिका जैसे विमानवाहक पोत या अत्याधुनिक लड़ाकू विमान नहीं बना सकता। इसलिए उसने अपनी रणनीति को सस्ते लेकिन प्रभावी ड्रोन और मिसाइलों पर केंद्रित किया। आज ईरान के शाहेद ड्रोन रूस-यूक्रेन युद्ध में व्यापक रूप से उपयोग हो रहे हैं। वहीं यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में ड्रोन और मिसाइल हमलों के जरिए वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर दिया। दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेनाओं के सामने एक ऐसा समूह खड़ा हो गया जिसके पास न तो आधुनिक वायुसेना है और न ही विशाल नौसेना। यह उदाहरण दिखाता है कि भविष्य में केवल राष्ट्र ही नहीं, बल्कि गैर-राज्य संगठन भी वैश्विक राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं।
अमेरिका की सबसे बड़ी चुनौती: लागत का असंतुलन
ड्रोन युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने युद्ध की अर्थव्यवस्था को उलट दिया है। यदि 500 डॉलर का ड्रोन किसी सैन्य ठिकाने की ओर बढ़ रहा है और उसे रोकने के लिए 30 लाख डॉलर की इंटरसेप्टर मिसाइल दागनी पड़ रही है, तो दीर्घकालिक युद्ध में आर्थिक लाभ किसके पास होगा? यही सवाल आज अमेरिकी रक्षा रणनीतिकारों को परेशान कर रहा है। पैट्रियट और थाड जैसी अत्याधुनिक प्रणालियां प्रभावी हैं, लेकिन वे महंगी भी हैं। इसके विपरीत ड्रोन तेजी से, सस्ते में और बड़े पैमाने पर बनाए जा सकते हैं। युद्ध का यह नया समीकरण महाशक्तियों को मजबूर कर रहा है कि वे अपने पूरे रक्षा ढांचे पर पुनर्विचार करें।
चीन: ड्रोन युग की वैश्विक फैक्ट्री
दुनिया में ड्रोन क्रांति का सबसे बड़ा औद्योगिक आधार चीन है। अधिकांश ड्रोन मोटर, बैटरी, कैमरे, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रणाली चीन में बनती हैं। दिलचस्प बात यह है कि यूक्रेन और रूस दोनों की ड्रोन आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीनी पुर्जों की महत्वपूर्ण भूमिका है। चीन केवल निर्माता ही नहीं, बल्कि स्वयं भी सैन्य ड्रोन तकनीक में तेजी से निवेश कर रहा है। हालांकि इस प्रक्रिया का एक दूसरा पहलू भी है। जिस तकनीक का निर्माण चीन कर रहा है, वही तकनीक भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम और ताइवान जैसे देशों को भी अपेक्षाकृत कम लागत में सैन्य शक्ति प्रदान कर रही है। इसका अर्थ यह है कि सैन्य शक्ति अब कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित नहीं रहेगी।
भारत के लिए अवसर और चुनौती
भारत के लिए यह परिवर्तन एक बड़ी चुनौती होने के साथ-साथ एक ऐतिहासिक अवसर भी है। हाल के वर्षों में भारत ने ड्रोन निर्माण, एंटी-ड्रोन सिस्टम और मिसाइल रक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। डीआरडीओ के सफल परीक्षण और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन यदि भारत को भविष्य की सैन्य शक्ति बनना है तो केवल आयातक नहीं, बल्कि ड्रोन तकनीक का वैश्विक निर्माता और निर्यातक बनना होगा। यूक्रेन युद्ध ने दिखा दिया है कि भविष्य के संघर्षों में लाखों ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर युद्ध और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली निर्णायक भूमिका निभाएंगी। भारत को इसी दिशा में अपनी रणनीति विकसित करनी होगी।
परमाणु युग के बाद की नई शक्ति राजनीति
ड्रोन क्रांति का एक चिंताजनक पहलू भी है। जब छोटे देश और क्षेत्रीय शक्तियां भी बड़े देशों को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हो जाएंगी, तब परमाणु हथियारों का महत्व और बढ़ सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह संदेश दिया है कि परमाणु शक्ति अभी भी प्रत्यक्ष विदेशी हस्तक्षेप को रोकने का सबसे बड़ा साधन है। परिणामस्वरूप कई देश अपनी सुरक्षा रणनीति में ड्रोन और मिसाइल क्षमता के साथ-साथ परमाणु विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं। यह वैश्विक सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती होगी।
निष्कर्ष: महाशक्तियों का अंत नहीं, लेकिन उनका रूपांतरण निश्चित
यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका, चीन या रूस जैसी महाशक्तियों का युग समाप्त हो रहा है। लेकिन यह निश्चित है कि उनकी शक्ति का स्वरूप बदल रहा है। 20वीं सदी की सैन्य शक्ति टैंक, विमान और युद्धपोतों पर आधारित थी। 21वीं सदी की शक्ति डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, साइबर नेटवर्क और औद्योगिक नवाचार पर आधारित होगी। भविष्य का विजेता वह नहीं होगा जिसके पास सबसे बड़ा विमानवाहक पोत होगा, बल्कि वह होगा जो सबसे तेजी से तकनीक विकसित कर सकेगा, सबसे कम लागत में सबसे अधिक प्रभाव पैदा कर सकेगा और युद्धक्षेत्र में मशीनों तथा मानव बुद्धिमत्ता का सर्वोत्तम संयोजन कर सकेगा। यूक्रेन के आसमान, ईरान की रणनीति, चीन की फैक्ट्रियां और भारत की उभरती क्षमताएं हमें एक ही संदेश दे रही हैं—दुनिया एक नए सैन्य युग में प्रवेश कर चुकी है, जहां शक्ति का अर्थ बदल रहा है और ड्रोन उस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुके हैं।




