ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 जून 2026
जब दोनों पक्ष एक-दूसरे पर ‘नरसंहार’ का आरोप लगाएं, तो दुनिया किस पर विश्वास करे?
मध्य पूर्व की राजनीति अब केवल मिसाइलों और युद्धक्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गई है। यह शब्दों, आरोपों और नैतिक श्रेष्ठता के दावों की भी लड़ाई बन चुकी है। ताजा उदाहरण तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई तीखी बयानबाजी है, जिसमें दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर “नरसंहार” जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।
नेतन्याहू ने एर्दोगन को “यहूदी विरोधी तानाशाह” बताते हुए उन पर कुर्दों के खिलाफ नरसंहार का आरोप लगाया। जवाब में एर्दोगन ने नेतन्याहू पर “हिटलर के रास्ते पर चलने” का आरोप लगा दिया। सवाल यह है कि आखिर दुनिया ऐसे आरोपों को कैसे देखे?
दरअसल, गाजा युद्ध के बाद से नैतिकता की लड़ाई भी शुरू हो गई है। इजराइल खुद को आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाला लोकतांत्रिक राष्ट्र बताता है, जबकि उसके आलोचक गाजा में भारी नागरिक मौतों और तबाही को मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते हैं। दूसरी ओर एर्दोगन खुद को फिलिस्तीनियों की आवाज के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन उनके विरोधी उन्हें प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने, विपक्षी नेताओं को जेल भेजने और कुर्द प्रश्न को बलपूर्वक दबाने के आरोपों से घेरते हैं।
विडंबना यह है कि दोनों पक्ष खुद को पीड़ित और दूसरे को अत्याचारी साबित करने में जुटे हैं।
यह केवल दो नेताओं की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व की लड़ाई भी छिपी हुई है। तुर्किये खुद को मुस्लिम दुनिया की एक प्रमुख आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है, जबकि इजराइल अमेरिका और पश्चिमी गठबंधन के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में बना हुआ है। गाजा, लेबनान, सीरिया और ईरान से जुड़े संघर्षों ने इस प्रतिस्पर्धा को और तीखा कर दिया है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या “नरसंहार” और “हिटलर” जैसे शब्दों का राजनीतिक इस्तेमाल इन शब्दों की गंभीरता को कम नहीं कर रहा? इतिहास में नरसंहार मानवता के सबसे बड़े अपराधों में गिना जाता है। जब हर राजनीतिक विवाद में यह शब्द इस्तेमाल होने लगे तो वास्तविक पीड़ितों की त्रासदी भी राजनीतिक हथियार बनकर रह जाती है।
आज गाजा में लोग मर रहे हैं। लेबनान में लोग विस्थापित हो रहे हैं। सीरिया वर्षों से संघर्ष झेल रहा है। कुर्द प्रश्न अभी भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। ऐसे में दुनिया को शायद नेताओं के आरोपों से अधिक जमीन पर मौजूद मानवीय संकट पर ध्यान देने की जरूरत है।
एर्दोगन और नेतन्याहू की यह जुबानी जंग एक और सच उजागर करती है—आधुनिक भू-राजनीति में नैतिकता भी अब एक रणनीतिक हथियार बन चुकी है। हर पक्ष मानवाधिकारों की भाषा बोलता है, लेकिन केवल तब जब वह उसके राजनीतिक हितों के अनुकूल हो।
इसलिए असली चुनौती यह नहीं है कि एर्दोगन सही हैं या नेतन्याहू। असली चुनौती यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय मानवाधिकारों और मानव जीवन के सवालों को राजनीतिक हितों से ऊपर रख पाएगा? क्योंकि अगर हर पक्ष दूसरे को हिटलर और खुद को न्याय का प्रतीक बताने लगे, तो अंततः सच्चाई सबसे बड़ी हारने वाली बन जाती है।




