एबीसी डेस्क 13 दिसंबर 2025
आरएसएस के बड़े और भव्य दफ्तरों को देखकर अगर कोई चौंकता है, तो उसे शायद आज के हालात को समझने की जरूरत है। आलोचकों का कहना है कि अब यह सिर्फ एक संगठन नहीं रहा, बल्कि देश की कई संस्थाओं, नीतियों और संसाधनों पर इसका असर साफ दिखाई देता है। आज जब आरएसएस के कार्यालय किसी पाँच सितारा इमारत जैसे दिखते हैं, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि इतना बड़ा आर्थिक ढांचा आखिर बना कैसे और किसके सहारे खड़ा है। कहा जाता है कि गांधी की हत्या के बाद से लेकर बाबरी मस्जिद विध्वंस तक, कई मौकों पर आरएसएस को बार-बार राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर “माफ़ी” या राहत मिलती रही, जिससे इसके हौसले और प्रभाव दोनों बढ़ते गए।
आरएसएस से जुड़ी आर्थिक ताकत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी संस्था “कैंपेन टू स्टॉप फंडिंग हेट” की एक रिपोर्ट, जो आज से करीब 23 साल पहले आई थी, उसमें दावा किया गया था कि 1994 से 2000 के बीच भारत में आरएसएस से जुड़े संगठनों को—जिसमें राष्ट्रीय सेवा भारती जैसे संगठन भी शामिल बताए गए—करीब 40 लाख अमेरिकी डॉलर का दान मिला। यह रिपोर्ट उस दौर में चर्चा का विषय बनी थी और इसके जरिए पहली बार विदेशी फंडिंग को लेकर व्यापक बहस शुरू हुई थी। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की फंडिंग ने संघ परिवार के आर्थिक आधार को और मजबूत किया।
एक और बड़ा सवाल विदेशी चंदे और FCRA लाइसेंस को लेकर उठता है। जानकारी के मुताबिक आरएसएस से जुड़े राष्ट्रीय सेवा भारती और भाऊ राव देवरस राष्ट्रीय सेवा न्यास के पास FCRA लाइसेंस है, यानी ये संगठन विदेश से मिलने वाले दान को कानूनी तौर पर स्वीकार कर सकते हैं। यह तथ्य इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि बीते वर्षों में सरकार ने जॉर्ज सोरोस जैसे नामों का हवाला देकर कांग्रेस से जुड़े संगठनों पर सवाल उठाए हैं और मानवाधिकार, स्वास्थ्य तथा सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले कई एनजीओ के FCRA लाइसेंस रद्द कर दिए हैं। ऐसे में यह सवाल पूछा जा रहा है कि एक ही नियम अलग-अलग संगठनों पर अलग तरीके से क्यों लागू होते हैं।
सरकारी खर्च को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आते हैं। दावा किया जाता है कि आरएसएस की सुरक्षा पर सरकार हर महीने करीब 1.5 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। यानी पिछले दस वर्षों में यह खर्च लगभग 150 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह आंकड़ा किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल एक रिट याचिका में सामने आने का दावा किया जाता है। आलोचकों का कहना है कि जब देश में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी क्षेत्रों में संसाधनों की कमी बताई जाती है, तब एक संगठन की सुरक्षा पर इतना बड़ा सरकारी खर्च कई सवाल खड़े करता है।
इसी कड़ी में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की तैनाती को लेकर भी बहस होती रही है। आरोप है कि CISF को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और संघ के मुख्यालयों की सुरक्षा में लगाया गया है, जबकि इस बल का मूल उद्देश्य देश के औद्योगिक प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और रणनीतिक संस्थानों की सुरक्षा करना है। सवाल यह है कि क्या एक वैचारिक संगठन को ऐसी विशेष सुरक्षा मिलनी चाहिए, जब देश के कई संवेदनशील औद्योगिक और सार्वजनिक संस्थान सुरक्षा की कमी की शिकायत करते हैं।
आरएसएस के भव्य दफ्तरों के निर्माण और साज-सज्जा पर भी ध्यान जाता है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में स्थित संघ मुख्यालय “केशव कुंज” की गैलरी और इंटीरियर डिजाइन करने वाली कंपनी टैगबीन सर्विसेज का नाम सामने आता है। आरोप है कि इस काम के लिए कंपनी को करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया। आलोचकों का कहना है कि यह रकम यह दिखाने के लिए काफी है कि संघ परिवार के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं है, जबकि आम जनता से जुड़े कई सामाजिक संगठनों को फंड के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
कुल मिलाकर, आरएसएस के आर्थिक साम्राज्य को लेकर उठ रहे ये सवाल सिर्फ इमारतों या आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं। यह बहस इस बात पर आकर टिक जाती है कि देश में संसाधनों का इस्तेमाल किसके लिए, किस तरह और किस प्राथमिकता के आधार पर हो रहा है। समर्थक इसे संगठन की ताकत और अनुशासन का नतीजा बताते हैं, जबकि आलोचक इसे सत्ता, संसाधन और विचारधारा के खतरनाक गठजोड़ के रूप में देखते हैं। यही वजह है कि आरएसएस की आर्थिक हैसियत आज भी देश की राजनीति और समाज में एक बड़े सवाल के तौर पर मौजूद है।




