[the_ad id="179"]
Home » National » ‘भारत में वोट देना मानवाधिकार नहीं!’ NHRC अध्यक्ष के बयान से छिड़ी बहस, SIR और मतदाताओं के अधिकारों पर उठे सवाल

‘भारत में वोट देना मानवाधिकार नहीं!’ NHRC अध्यक्ष के बयान से छिड़ी बहस, SIR और मतदाताओं के अधिकारों पर उठे सवाल

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 10 अक्टूबर 2026

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन के एक बयान ने मतदान के अधिकार की कानूनी स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा है कि भारत में मतदान के अधिकार को वैधानिक अधिकार माना जाता रहा है, जबकि संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR) और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध (ICCPR) शासन में भागीदारी और मतदान के अधिकार को मान्यता देते हैं। उनका यह बयान ऐसे समय आया है, जब चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी SIR को लेकर दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मतदान के अधिकार को केवल वैधानिक अधिकार के रूप में देखने और उसे व्यापक मानवाधिकार के रूप में समझने के बीच कानूनी अंतर क्या है और इसका मतदाताओं के अधिकारों पर क्या असर पड़ सकता है।

ETV भारत की 8 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन ने पटना में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1954 से मतदान के अधिकार को वैधानिक अधिकार माना है, लेकिन इस विषय पर बहस जारी है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की सार्वभौम घोषणा और ICCPR का उल्लेख करते हुए कहा कि शासन में भागीदारी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदान इसी भागीदारी का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि मानवाधिकार का अर्थ ऐसा अधिकार है जो सभी व्यक्तियों को समान रूप से उपलब्ध होना चाहिए, तो मतदान के लिए निर्धारित आयु और अन्य कानूनी पात्रता की शर्तों के संदर्भ में इसकी व्याख्या कैसे की जाए। उनका तर्क था कि मतदान का अधिकार निर्धारित कानूनी शर्तों के अधीन होने के कारण उसकी प्रकृति को लेकर बहस पैदा होती है।

संयुक्त राष्ट्र की घोषणा और अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहते हैं?

मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 21 में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश के शासन में प्रत्यक्ष रूप से या स्वतंत्र रूप से चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से भाग लेने का अधिकार है। इसमें यह भी उल्लेख है कि सरकार के अधिकार का आधार जनता की इच्छा होनी चाहिए और यह इच्छा समय-समय पर होने वाले वास्तविक चुनावों में समान मताधिकार तथा गुप्त मतदान के जरिए व्यक्त की जानी चाहिए। इसी तरह, नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध के अनुच्छेद 25 में प्रत्येक नागरिक को सार्वजनिक मामलों में भाग लेने, मतदान करने और चुनाव लड़ने का अधिकार तथा अवसर देने की बात कही गई है।

भारत ने 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा अपनाए जाने के पक्ष में मतदान किया था। बाद में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सिद्धांतों ने दुनिया भर में नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से संबंधित संवैधानिक बहसों को प्रभावित किया। इसलिए मतदान के अधिकार को लेकर चर्चा केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि भारतीय कानून में उसे किस श्रेणी में रखा गया है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में नागरिक की भागीदारी और समान राजनीतिक अधिकारों को किस तरह सुरक्षित किया जाए।

भारत में मतदान का अधिकार: वैधानिक या मौलिक?

भारत में मतदान का अधिकार संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों के तहत संचालित होता है। संविधान का अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए वयस्क मताधिकार का आधार प्रदान करता है। वहीं, जनप्रतिनिधित्व कानून और संबंधित चुनावी नियम मतदाता पंजीकरण, पात्रता और मतदान की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में मतदान के अधिकार को वैधानिक अधिकार के रूप में समझाया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मतदान के अधिकार का लोकतांत्रिक या संवैधानिक महत्व नहीं है।

न्यायिक व्याख्या में इस विषय पर अलग-अलग संदर्भों में चर्चा हुई है। मतदान का अधिकार, चुनाव में उम्मीदवार बनने का अधिकार और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक व्यवस्था आपस में संबंधित होने के बावजूद कानूनी रूप से अलग प्रश्न हैं। इसलिए यह कहना कि मतदान का अधिकार वैधानिक है, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसका मानवाधिकारों से कोई संबंध नहीं है। इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों में मतदान और शासन में भागीदारी को मान्यता मिलने का अर्थ यह नहीं है कि हर देश में मतदान की पात्रता संबंधी सभी कानूनी शर्तें समाप्त हो जाती हैं।

SIR विवाद के बीच बयान का महत्व

न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन का बयान उस समय सामने आया है, जब चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद तेज है। इस प्रक्रिया का घोषित उद्देश्य मतदाता सूची का सत्यापन और उसे अधिक सटीक बनाना है। दूसरी ओर, विपक्ष और कुछ विरोध प्रदर्शन कर रहे समूहों का आरोप है कि पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं या उनके पंजीकरण में बाधाएं पैदा हो रही हैं। ETV भारत की रिपोर्ट में पांच करोड़ से अधिक लोगों के मताधिकार से वंचित होने की आशंका से जुड़े आरोपों का उल्लेख किया गया है। यह आरोपों के संदर्भ में दी गई संख्या है; इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित अंतिम आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।

इस विवाद में मूल सवाल यह है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के साथ प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की रक्षा कैसे की जाए। चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी हो, नागरिकों को अपनी पात्रता साबित करने और गलतियों को सुधारने का उचित अवसर मिले तथा किसी पात्र मतदाता का नाम अनुचित तरीके से सूची से बाहर न हो। वहीं, मतदाता सूची में मौजूद वास्तविक त्रुटियों को सुधारना भी चुनावी प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है। इसलिए SIR के प्रभाव का आकलन आरोपों के बजाय आधिकारिक आंकड़ों, हटाए गए नामों के कारणों, दावों-आपत्तियों और अपीलों के नतीजों के आधार पर होना चाहिए।

मानवाधिकार आयोग की भूमिका पर भी चर्चा

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का काम मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों पर कार्रवाई करना और अधिकारों की सुरक्षा को मजबूत करना है। ऐसे में आयोग के अध्यक्ष की ओर से मतदान के अधिकार की कानूनी प्रकृति पर दिया गया बयान सार्वजनिक चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है। हालांकि, अध्यक्ष का यह बयान आयोग की ओर से मतदाताओं के अधिकारों को नकारने वाला कोई औपचारिक निर्णय नहीं है। यह उनके द्वारा व्यक्त किया गया कानूनी दृष्टिकोण है, जिसे संविधान, अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के संदर्भ में समझना आवश्यक है।

इसी कार्यक्रम में न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन ने निजी क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि बड़ी कंपनियों और अन्य गैर-सरकारी संस्थाओं के स्तर पर भी मानवाधिकारों का उल्लंघन गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के 2023 के कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले का उल्लेख करते हुए बताया कि कुछ परिस्थितियों में मौलिक अधिकारों का प्रभाव गैर-सरकारी पक्षों के खिलाफ भी लागू हो सकता है। उनके अनुसार, मानवाधिकारों के संरक्षण की चर्चा केवल राज्य और नागरिक के संबंध तक सीमित नहीं रह सकती।

बिहार में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर भी सुनवाई

ETV भारत की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति रामासुब्रमणियन और NHRC के अन्य सदस्यों ने 7 और 8 अक्टूबर को पटना में मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों की खुली सुनवाई की। इस दौरान आयोग ने लगभग 73 मामलों की सुनवाई की, जिनमें से 29 मामलों को सुनवाई के बाद बंद किया गया। बिहार सरकार ने इनमें से 20 मामलों में कुल 1.40 करोड़ रुपये के मुआवजे के भुगतान का प्रमाण प्रस्तुत किया।

आयोग के अध्यक्ष ने बाल श्रम से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी में एक मामले में लगभग 400 बच्चों और दूसरे मामले में करीब 200 बच्चों के बाल श्रम में लगे होने की बात सामने आई थी। उन्होंने कहा कि बच्चों की सहमति का हवाला देकर उनसे काम कराने को वैध नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने यह भी बताया कि हिरासत में 23 वर्षीय सचिन कुमार की मौत के मामले में आयोग ने चिकित्सकीय राय प्राप्त की थी और परिवार को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। आयोग के अनुसार, युवक को समय पर उचित चिकित्सा नहीं मिलने की आशंका सामने आई थी; हालांकि, मौत के लिए अंतिम जिम्मेदारी किसकी थी, यह अलग जांच का विषय था।

निष्कर्ष: बहस कानूनी शब्दों से आगे, नागरिक के अधिकार तक

NHRC अध्यक्ष के बयान ने मतदान के अधिकार की कानूनी प्रकृति पर बहस को फिर सामने ला दिया है। भारत में मतदान का अधिकार वैधानिक प्रावधानों से संचालित होता है, लेकिन लोकतंत्र में इसकी भूमिका शासन में नागरिकों की भागीदारी और सरकार की जवाबदेही से जुड़ी है। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा और ICCPR भी मतदान तथा सार्वजनिक मामलों में भागीदारी को मान्यता देते हैं। इसलिए इस विषय पर किसी एक कानूनी श्रेणी के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय संवैधानिक व्यवस्था, न्यायिक व्याख्या और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को साथ रखकर चर्चा जरूरी है।

SIR के मौजूदा विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में किसी पात्र नागरिक का अधिकार प्रभावित न हो। चुनाव आयोग को पारदर्शी प्रक्रिया, स्पष्ट आंकड़ों और प्रभावी शिकायत निवारण के जरिए यह भरोसा कायम करना होगा कि मतदाता सूची में शामिल होने और मतदान करने का अवसर कानून के अनुरूप सभी पात्र नागरिकों को उपलब्ध है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि मतदाता के अधिकार की रक्षा हो और उससे जुड़े हर विवाद का समाधान तथ्यों, कानून और जवाबदेही के आधार पर किया जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *