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अमेरिका-चीन की दोस्ती, भारत और ग्लोबल साउथ की नई चिंता: ट्रंप-शी की सुलह का असली असर क्या होगा?

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026

दुनिया की 2 सबसे बड़ी आर्थिक ताकतें जब आमने-सामने बैठती हैं तो उसका असर सिर्फ अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहता। उसका असर भारत से लेकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के उन देशों तक जाता है, जो बड़ी ताकतों के बीच अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात भी ऐसी ही घटना है। दोनों नेताओं की मुलाकात ऐसे समय हुई जब दुनिया पहले से ही व्यापार तनाव, युद्ध, ऊर्जा संकट, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और बदलते वैश्विक समीकरणों से गुजर रही है। दोनों देशों ने व्यापार युद्ध को कुछ समय के लिए पीछे रखने की दिशा में कदम बढ़ाया है और व्यापारिक समझौते की अवधि बढ़ाई गई है। लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होने से दुनिया के गरीब और विकासशील देशों को कितना फायदा होगा और भारत के सामने कौन-सी नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं?

ट्रंप और शी की मुलाकात का दृश्य अपने आप में काफी बड़ा था। करीब 6 दशक बाद ऐसा मौका आया जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी विदेशी नेता का एयरबेस पर खुद स्वागत किया। ट्रंप ने शी से मुलाकात के बाद इसे शानदार बैठक बताया। उन्होंने शी के पत्थर और ग्रेनाइट के प्रति लगाव पर भी मजाकिया अंदाज में टिप्पणी की। देखने में यह सब गर्मजोशी और दोस्ती का संकेत लगता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में मुस्कुराहट के पीछे हमेशा अपने-अपने हित मौजूद होते हैं। अमेरिका और चीन अचानक दोस्त नहीं बन गए हैं। दोनों के बीच व्यापार, तकनीक, ताइवान, दुर्लभ खनिज, सुरक्षा और वैश्विक प्रभाव को लेकर गहरी प्रतिस्पर्धा अभी भी मौजूद है। इसलिए इसे पूरी तरह दोस्ती कहना जल्दबाजी होगी। इसे फिलहाल तनाव कम करने और अपने-अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित करने की कोशिश के रूप में देखना ज्यादा सही होगा।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका और चीन की बातचीत के दौरान दुनिया के बाकी देशों की आवाज कितनी सुनाई देती है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के आसपास ही दुनिया की 2 बड़ी ताकतों की यह द्विपक्षीय कूटनीति हुई। इससे एक बड़ा संदेश जरूर जाता है कि आज भी वैश्विक राजनीति में बड़ी ताकतें कई महत्वपूर्ण मुद्दों को बहुपक्षीय संस्थाओं के बजाय सीधे आपस में तय करना पसंद करती हैं। अगर दुनिया की बड़ी समस्याओं का समाधान केवल 2 या 3 शक्तिशाली देशों की बातचीत से तय होने लगे तो छोटे और विकासशील देशों के लिए अपनी बात मजबूती से रखने की जगह कम हो सकती है। भारत जैसे देश के लिए यह सवाल और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की लगातार बात करता रहा है।

लेकिन भारत को इस घटनाक्रम को केवल खतरे के रूप में भी नहीं देखना चाहिए। भारत की स्थिति अमेरिका और चीन दोनों से अलग है। भारत अमेरिका का सहयोगी देश नहीं है और चीन के साथ भी उसका रिश्ता केवल टकराव का नहीं है। भारत एक तरफ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड में काम करता है, तो दूसरी तरफ ब्रिक्स जैसे मंचों पर चीन और दूसरे देशों के साथ भी मौजूद है। रूस के साथ भारत के पुराने संबंध हैं और यूरोप, पश्चिम एशिया तथा ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी भारत अपनी अलग साझेदारी बना रहा है। यही भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की असली ताकत है। इसलिए अमेरिका और चीन के रिश्ते बदलने पर भारत को किसी एक खेमे में खड़े होने के बजाय अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के आधार पर फैसले लेने होंगे।

भारत के लिए सबसे सीधा आर्थिक सवाल निवेश का है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव के कारण कई वैश्विक कंपनियों ने अपनी उत्पादन व्यवस्था में चीन के अलावा दूसरे देशों को शामिल करने की कोशिश की। इसी प्रक्रिया को आम तौर पर ‘चीन प्लस 1’ रणनीति कहा गया। भारत को इससे विनिर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल और दूसरे क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने का अवसर मिला। लेकिन अगर अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव कम होता है तो चीन से बाहर उत्पादन लगाने की कंपनियों की मजबूरी कुछ कम हो सकती है। इसका मतलब यह नहीं कि भारत से निवेश अचानक चला जाएगा, लेकिन भारत को निवेश आकर्षित करने के लिए पहले से ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनना पड़ेगा।

दूसरी बड़ी चुनौती अमेरिका के साथ भारत के व्यापार की है। अमेरिका और चीन अगर अपने बीच व्यापारिक तनाव को कम करते हैं तो वॉशिंगटन का ध्यान दूसरे व्यापारिक साझेदारों पर ज्यादा जा सकता है। भारत पहले से ही अमेरिकी शुल्क और बाजार पहुंच से जुड़े दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में भारत को यह देखना होगा कि उसके निर्यातकों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। कपड़ा, कालीन, समुद्री खाद्य, रत्न और आभूषण तथा इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र अमेरिकी बाजार पर काफी निर्भर हैं। अगर इन क्षेत्रों पर शुल्क बढ़ता है तो इसका असर केवल बड़ी कंपनियों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि छोटे उद्योगों और लाखों कामगारों पर भी पड़ सकता है।

रूस से तेल खरीदना इस पूरी कहानी का एक अलग और बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। अमेरिका में ऐसा कानून आगे बढ़ा है जो रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर बहुत ऊंचे शुल्क लगाने का रास्ता खोल सकता है। भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। ऐसे में अगर चीन और अमेरिका अपने बीच व्यापारिक तनाव कम कर लेते हैं और चीन को किसी तरह की राहत मिलती है, लेकिन भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर दबाव बना रहता है, तो भारत के सामने एक मुश्किल आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अमेरिका भारत के साथ किस स्तर की कार्रवाई करेगा।

भारत के लिए क्वाड का सवाल भी महत्वपूर्ण है। अमेरिका और चीन के बीच संबंधों में अगर लंबे समय तक सुधार आता है तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की प्राथमिकताएं कुछ बदल सकती हैं। भारत के लिए इसका मतलब यह होगा कि उसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए केवल किसी दूसरे देश की रणनीति पर निर्भर रहने के बजाय अपनी समुद्री क्षमता, आर्थिक ताकत और क्षेत्रीय साझेदारियों को और मजबूत करना होगा। दूसरी तरफ अगर अमेरिका और चीन का तनाव फिर बढ़ता है तो भारत पर किसी एक पक्ष के साथ अधिक मजबूती से खड़े होने का दबाव भी बढ़ सकता है। दोनों परिस्थितियों में भारत के लिए संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।

यहीं से ग्लोबल साउथ की बड़ी तस्वीर सामने आती है। अमेरिका और चीन दोनों के पास दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और तकनीकी ताकतों में से एक है। उनके बीच समझौता होता है तो वैश्विक व्यापार को कुछ स्थिरता मिल सकती है, कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव कम हो सकता है और कंपनियों को भविष्य की योजना बनाने में आसानी हो सकती है। यह गरीब देशों के लिए भी अच्छी बात हो सकती है। लेकिन अगर बड़ी ताकतें अपने हितों के लिए वैश्विक नियम तय करने लगें और छोटे देशों को केवल उन नियमों का पालन करना पड़े, तो यह स्थिति कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के लिए नुकसानदेह हो सकती है। इसलिए सवाल अमेरिका-चीन की दोस्ती का विरोध करने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि वैश्विक व्यवस्था में बाकी देशों की आवाज भी बनी रहे।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रंप-शी मुलाकात को फिलहाल स्थायी समझौता मानना ठीक नहीं होगा। दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव के कई मुद्दे अभी भी बाकी हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ताइवान, दुर्लभ खनिज और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे विषयों पर मतभेद खत्म नहीं हुए हैं। हालिया बैठक में भी कई क्षेत्रों में बातचीत हुई, लेकिन बड़े और स्थायी समाधान का दावा करना अभी जल्दबाजी होगी। अमेरिका और चीन ने तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश जरूर की है, लेकिन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बनी हुई है।

मेरी नजर में भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अब केवल यह सोचकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता कि अमेरिका और चीन की लड़ाई से भारत को अपने आप फायदा मिलता रहेगा। अगर चीन से कंपनियां बाहर निकलेंगी तो भारत को उन्हें आकर्षित करने के लिए बेहतर सड़क, बंदरगाह, बिजली, कौशल, जमीन, आसान नियम और तेज मंजूरी देनी होगी। अगर अमेरिका शुल्क का दबाव बढ़ाएगा तो भारत को अपने निर्यात बाजारों का विस्तार करना होगा। अगर वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था बदलती है तो भारत को अपने महत्वपूर्ण खनिज, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और तकनीकी जरूरतों के लिए कई स्रोत तैयार करने होंगे। और अगर दुनिया फिर से 2 बड़े खेमों में बंटती है तो भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और मजबूत करनी होगी।

सबसे बड़ी सीख शायद यही है कि दुनिया अब उस दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां बड़ी ताकतों के बीच समझौते और टकराव दोनों अचानक पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकते हैं। अमेरिका और चीन अगर कुछ समय के लिए साथ चलने का रास्ता चुनते हैं तो दुनिया को इसका स्वागत करना चाहिए, लेकिन आंखें बंद करके नहीं। भारत और ग्लोबल साउथ के देशों के लिए जरूरी है कि वे अपनी अर्थव्यवस्थाओं को इतना मजबूत बनाएं कि किसी भी बड़े देश के फैसले का असर उनकी पूरी अर्थव्यवस्था को हिला न सके। ट्रंप और शी की मुलाकात अमेरिका और चीन के लिए एक विराम हो सकती है, लेकिन भारत के लिए यह आत्मनिर्भर रणनीति, मजबूत निर्यात और स्वतंत्र कूटनीति की जरूरत का नया संकेत है।

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